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मोक्ष दर्शन (77-83) सच्चे सद्गुरु की आवश्यकता और उनके मिलने का लाभ ।। सद्गुरु महर्षि मेंहीं

सत्संग योग भाग 4 (मोक्ष दर्शन) / 09

प्रभु प्रेमियों ! भारतीय साहित्य में वेद, उपनिषद, उत्तर गीता, भागवत गीता, रामायण आदि सदग्रंथों का बड़ा महत्व है। इन्हीं सदग्रंथों, प्राचीन और आधुनिक संतो के विचारों को संग्रहित करकेे 'सत्संग योग' नामक पुस्तक की रचना हुई है। इसमें सभी पहुंचे हुए संत-महात्माओं के विचारों में एकता है, इसे प्रमाणित किया है और चौथे भाग में इन विचारों के आधार पर और सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की अपनी साधनात्मक अनुभूतियों से जो अनुभव ज्ञान हुआ है, उसके आधार पर मनुष्यों के सभी दुखों से छूटने के उपायों का वर्णन किया गया है। इसे मोक्ष दर्शन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें ध्यान योग से संबंधित बातों को अभिव्यक्त् करने के लिए पाराग्राफ नंंबर दिया गया हैैैै । इन्हीं पैराग्राफों में से  कुुछ पैराग्राफों  के बारे  में  जानेंगेेेे ।

इसमें पूरे और सच्चे गुरु की क्या आवश्यकता है, सच्चे सद्गुरु के मिलने का लाभ, सद्गुरु कौन हो सकता है, ईश्वर प्राप्ति विद्या का महत्व, सच्चे सद्गुरु की पहचान, गुरु भक्ति की महिमा, गुरु सेवा आवश्यक क्यों है, गुरु कृपा का महत्व, गुरु महिमा, गुरु भक्ति भजन,गुरु वंदना, गुरु संगीत, गुरु का भक्ति गाना, गुरु कृपा ही केवलम, गुरु कृपा भजन,सद्गुरु कौन, सद्गुरु कौन है, वर्तमान में सतगुरु कौन है, सच्चे सद्गुरु कौन है, सद्गुरु भगवान कौन है इत्यादि बातों के बारे में बताया गया है। इन बातों को समझने के पहले आइए गुरु महाराज का दर्शन करें।


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पूरे एवं सच्चे सद्गुरु की प्राप्ति पर प्रसन्न मुद्रा में सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

सच्चे सद्गुरु की आवश्यकता और उनके मिलने का लाभ

संतमत के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज poore aur sachche guru kee kya aavashyakata hai, sachche sadguru ke milane ka laabh, sadguru kaun ho sakata hai, eeshvar praapti vidya ka mahatv, sachche sadguru kee pahachaan, guru bhakti kee mahima, guru seva aavashyak kyon hai, guru krpa ka mahatv, guru mahima, guru bhakti bhajan,guru vandana, guru sangeet, guru ka bhakti gaana, guru krpa hee kevalam, guru krpa bhajan,sadguru kaun, sadguru kaun hai, vartamaan mein sataguru kaun hai, sachche sadguru kaun hai, sadguru bhagavaan kaun hai,. आदि बातों के बारे में बताते हुए 'सत्संग योग' के चौथे भाग में लिखते हैं-


मोक्ष दर्शन (77-83) 



( ७७ )..... सर्वेश्वर की भक्ति में पूर्ण होकर अपना परम कल्याण बना लेना असम्भव है । कबीर पूरे गुरु बिना , पूरा शिष्य न होय । गुरु लोभी शिष लालची , दूनी दाझन होय ॥ ( कबीर साहब ) 

( ७८ ) जब कभी पूरे और सच्चे सद्गुरु मिलेंगे , तभी उनके सहारे अपना परम कल्याण बनाने का काम समाप्त होगा । 

( ७९ ) पूरे और सच्चे सद्गुरु का मिलना परम प्रभु सर्वेश्वर के मिलने के तुल्य ही है । 

( ८० ) जीवन - काल में जिनकी सुरत सारे आवरणों को पार कर शब्दातीत पद में समाधि - समय लीन होती है और पिंड में बरतने के समय उन्मुनी रहनी में रहकर सारशब्द में लगी रहती है , ऐसे जीवन - मुक्त परम सन्त पुरुष पूरे और सच्चे सद्गुरु कहे जाते हैं । 

जीव के पीव से मिलने का सांकेतिक रास्ता

( ८१ ) परम प्रभु सर्वेश्वर को पाने की विद्या के अतिरिक्त जितनी विद्याएँ हैं , उन सबसे उतना लाभ नहीं , जितना की परम प्रभु के मिलने से । परम प्रभु से मिलने की शिक्षा की थोड़ी - सी बात के तुल्य लाभदायक दूसरी - दूसरी शिक्षाओं की अनेकानेक बातें ( लाभदायक ) नहीं हो सकती हैं । इसलिए इस विद्या के सिखलानेवाले से बढ़कर उपकारी दूसरे कोई गुरु नहीं हो सकते और इसीलिए किसी दूसरे गुरु का दर्जा , इनके दर्जे के तुल्य नहीं हो सकता है । केवल आधिभौतिक विद्या के प्रकाण्ड से भी प्रकाण्ड वा अत्यन्त धुरन्धर विद्वान के अन्तर के आवरण टूट गये हों , यह कोई आवश्यक बात नहीं है और न इनके पास कोई ऐसा यंत्र है , जिससे अन्तर का आवरण टूटे वा कटे ; परन्तु सच्चे और पूरे सद्गुरु में ये बातें आवश्यक हैं । सच्चे और पूरे सद्गुरु का अंतर - पट टूटने की सयुक्ति का किंचित् मात्र भी संकेत संसार की सब विद्याओं से विशेष लाभदायक है । 

( ८२ ) पूरे और सच्चे सद्गुरु की पहचान अत्यन्त दुर्लभ है । फिर भी जो शुद्धाचरण रखते हैं , जो नित्य नियमित रूप से नादानुसंधान का अभ्यास करते हैं और जो सन्तमत को अच्छी तरह समझा सकते हैं , उनमें श्रद्धा रखनी और उनको गुरु धारण करना अनुचित नहीं । दूसरे - दूसरे गुण कितने भी अधिक हों ; परन्तु यदि आचरण में शुद्धता नहीं पायी जाय , तो वह गुरु मानने योग्य नहीं । यदि ऐसे को पहले गुरु माना भी हो , तो उसका दुराचरण जान लेने पर उससे अलग रहना ही अच्छा है । उसकी जानकारी अच्छी होने पर भी आचरणहीनता के कारण उसका संग करना योग्य नहीं और गुणों की अपेक्षा गुरु के आचरण का प्रभाव शिष्यों पर अधिक पड़ता है और गुणों के सहित शुद्धाचरण का गुरु में रहना ही उसकी गरुता तथा गुरुता है , नहीं तो वह गरु ( गाय , बैल ) है । क्या शुद्धाचरण और क्या गुरु होने योग्य दूसरे - दूसरे गुण , किसी में भी कमी होने से वह झूठा गुरु है । 

गुरु से ज्ञान जो लीजिये , शीश दीजिये दान । बहुतक भोंदू बहि गये , राखि जीव अभिमान ॥१ ॥ तन मन ताको दीजिये , जाके विषया नाहिं । आपा सबही डारिके , राखै साहब माहिं ॥२ ॥ झूठे गुरु के पक्ष को , तजत न कीजै बार । द्वार न पावै शब्द का , भटकै बारम्बार ॥३ ॥ ( कबीर साहब ) 

पूरे और सच्चे सद्गुरु को गुरु धारण करने का फल तो अपार है ही ; परन्तु ऐसे गुरु का मिलना अति दुर्लभ है । ज्ञानवान , शुद्धाचारी तथा सुरत - शब्द के अभ्यासी पुरुष को गुरु धारण करने से शिष्य उस गुरु के संग से धीरे - धीरे गुरु के गुणों को लाभ करे , यह सम्भव है ; क्योंकि संग से रंग लगता है और शिष्य के लिए वैसे गुरु की शुभकामना भी शिष्य को कुछ - न - कुछ लाभ अवश्य पहुँचाएगी ; क्योंकि एक का मनोबल दूसरे पर कुछ प्रभाव डाले , यह भी संभव ही है । ज्ञात होता है कि उपर्युक्त संख्या २ की साखी और पारा ७७ में लिखित साखी , जो यह निर्णय कर देती है कि कैसे का शिष्य बनो और कैसे के हाथों में अपने को सौंपो , इसका रहस्य ऊपर कथित शिष्य के पक्ष में दोनों ही बातें लाभदायक हैं । जो केवल सुरत - शब्द का अभ्यास करे ; किन्तु ज्ञान और शुद्धाचरण की परवाह नहीं करे , ऐसे को गुरु धारण करना किसी तरह भला नहीं है । यदि कोई इस बात की परवाह नहीं करके किसी दुराचारी जानकार को ही गुरु धारण कर ले , तो ऊपर कथित गुरु से प्राप्त होने योग्य लाभों से वह वंचित रहेगा और केवल अपने से अपनी सँभाल करना उसके लिए अत्यन्त भीषण काम होगा । इस भीषण काम को कोई विशेष थिर बुद्धिवाला विद्वान कर भी ले , पर सर्वसाधारण के हेतु असम्भव - सा है । ये बातें प्रत्यक्ष हैं कि एक की गरमी दूसरे में समाती है तथा कोई अपने शरीर - बल से दूसरे के शरीर - बल को सहायता देकर और अपने बुद्धि - बल से दूसरे के बुद्धि - बल को सहायता देकर बढ़ा देते हैं , तब यदि कोई अपना पवित्रतापूर्ण तेज दूसरे के अन्दर देकर उसको पवित्र करे और अपने बढ़े हुए ध्यान - बल से किसी दूसरे के ध्यान - बल को जगावे और बढ़ावे , तो इसमें संशय करने का स्थान नहीं है । कल्याण - साधनांक , प्रथम - खण्ड , पृ ० ४ ९९ में अमीर खुसरो का वचन है कि 

' सुनिये , मैंने भी उन महापुरुष जगद्गुरु भगवान श्री स्वामी रामानन्द का दर्शन किया है । अपने गुरु ख्वाजा साहब की तरफ से मैं तोहफए बेनजीर ( अनुपम भेंट ) लेकर पंचगंगा - घाट पर गया था । स्वामीजी ने दाद दी थी और मुझ पर जो मेह्र ( कृपा ) हुई थी , उससे फौरन मेरे दिल की सफाई हो गई थी और खुदा का नूर झलक गया था । '

 मण्डल- ब्राह्मणोपनिषद् , तृतीय ब्राह्मण में के , 

' इत्युच्चरन्त्समालिंग्य शिष्यं ज्ञप्तिमनीनयत् ' ॥२ ॥

 का अंग्रेजी अनुवाद K. Narayan SwamiAiyar ( के ० नारायण स्वामी अय्यर ) ने इस प्रकार किया है- 

" Saying this , he the purusha of the sun ] embraced his pupil and made himunderstand it . " 
अर्थात्- ' इस प्रकार कहकर उसने ( सूर्यमण्डल के पुरुष ने ) अपने शिष्य को छाती से लगा लिया और उसको उस विषय का ज्ञान करा दिया । ' और उसपर उन्होंने ( उपर्युक्त अय्यरजी ने ) पृष्ठ के नीचे में यह टिप्पणी भी लिख दी है कि 

" This is a reference to the secret way of emparting higher truth

अर्थात् ' उच्चतर सत्य ( ब्रह्म का अपरोक्ष ज्ञान ) प्रदान करने की गुप्त विधि का यह ( अर्थात् छाती से लगाना ) एक संकेत है । ' [ Thirty minor upanishads , Page 252 थर्टी ( ३० ) माइनर उपनिषद्स , पृष्ठ २५२ ] 

ज्ञात होता है कि पूरे गुरु के पवित्र तेज से , उनके उत्तम ज्ञान से तथा उनके ध्यान - बल से शिष्यों को लाभ होता है । इसी बात की सत्यता के कारण बाबा देवी साहब की छपाई हुई घटरामायण में निम्नलिखित दोनों पद्यों को स्थान प्राप्त है । वे पद्य ये हैं 

मुर्शिदे कामिल से मिल सिद्क और सबूरी से तकी । जो तुझे देगा फहम शहरग के पाने के लिये ॥ 
अर्थात् - ऐ तकी ! सच्चाई और ( संसारी चीजों का लालच त्यागकर ) सन्तोष धारण कर कामिल ( पूरे ) मुर्शिद ( गुरु ) से मिलो , जो तुझको शहरग ( सुषुम्ना नाड़ी ) पाने की समझ देगा । 

यह पद्य विदित करता है कि भजन - भेद कैसे पुरुष से लेना चाहिये और दूसरा 

तुलसी बिना करम किसी मुर्शिद रसीदा के । राहे नजात दूर है उस पार देखना ॥ 
अर्थात् - तुलसी साहब कहते हैं कि किसी मुर्शिद रसीदा ( पहुँचे हुए गुरु ) के करम - बखिशश ( दया - दान ) के बिना राहे नजात ( मुक्ति का रास्ता ) और उस पार का देखना दूर है । 

यह पद्य तो साफ ही कह रहा है कि पूरे गुरु के दया - दान से ही उस पार का देखना होता है , अन्यथा नहीं । और वराहोपनिषद् , अ ० २ , श्लोक ७६ में है 

दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् । दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥ 
अर्थात् सद्गुरु की कृपा के बिना विषय का त्याग दुर्लभ है । तत्त्वदर्शन ( ब्रह्म - दर्शन ) दुर्लभ है और सहजावस्था दुर्लभ है ।

इस प्रकार की दया का दान गुरु से प्राप्त करने के लिए उन्हें अपनी ओर आकृष्ट किया जाय , इसी में गुरु - सेवा की विशेष उपयोगिता ज्ञात होती है । भगवान बुद्ध की ' धम्मपद ' नाम की पुस्तिका में गुरु - सेवा के लिए उनकी यह आज्ञा है ; यथा - 

' मनुष्य जिससे बुद्ध का बताया हुआ धर्म सीखे , तो उसे उनकी परिश्रम से सेवा करनी चाहिये ; जैसे ब्राह्मण यज्ञ - अग्नि की पूजा करता है । ' ( २६ वाँ वचन ; सं ० २ ९ २ ) 

सन्त चरणदासजी ने भी कहा है 

मेरा यह उपदेश हिये में धारियो । गुरु चरनन मन राखि सेव तन गारियो ॥ जो गुरु झिड़क लाख तो मुख नहिं मोड़ियो । गुरु से नेह लगाय सबन सों तोडियो । ( चरणदासजी की वाणी , भाग १ , पृ ० १० , अष्टपदी ४५ , वेलवेडियर प्रेस , प्रयाग ) 

और बाबा देवी साहब ने भी घटरामायण में छपाया है 

यह राह मंजिल इश्क है , पर पहुँचना मुश्किल नहीं । मुश्किल कुशा है रोबरू , जिसने तुझे पंजा दिया । 
अर्थात् - यह राह ( मार्ग ) और मंजिल ( गन्तव्य स्थान ) इश्क ( प्रेम ) है , पर पहुँचना कठिन नहीं है , मुश्किल कुशा ( कठिनाई को मारनेवाला वा दूर करनेवाला ) रोबरू ( सामने ) वह है , जिसने तुझे पंजा ( भेद वा आज्ञा ) दिया है । 

यद्यपि संत - महात्मागण समदर्शी कहे जाते हैं , तथापि जैसे वर्षा का जल सब स्थानों पर एक तरह बरस जाने पर भी गहिरे गड़हे में ही विशेष जमा होकर टिका रहता है , वैसे ही संत - महात्मागण की कृपावृष्टि भी सब पर एक तरह की होती है । परन्तु उनके विशेष सेवक - रूप गहिरे गड़हे की ओर वह वेग से प्रवाहित होकर उसी में अधिक ठहरती है । संत - महात्मागण तो स्वयं सब पर सम रूप से अपनी कृपा - वृष्टि करते ही हैं , पर उनके सेवक अपनी सेवा से अपने को उनका कृपापात्र बना उनकी विशेष कृपा अपनी ओर खींच लेंगे , इसमें आश्चर्य ही क्या ? एक तो देनेवाले के दान की न परवाह करता है और न वह उसे लेने का पात्र ही ठीक है , दूसरा इसकी बहुत परवाह करता है और अत्यन्त यत्न से अपने को उस दान के लेने का पात्र बनाता है , तब पहले से दूसरे को विशेष लाभ क्यों न होगा ? सन्त - महात्माओं की वाणियों में गुरु - सेवा की विधि का यही रहस्य है , ऐसा जानने में आता है । 

( ८३ ) किसी से कोई विद्या सिखनेवाले को सिखलानेवाले से नम्रता से रहने का तथा उनकी प्रेम - सहित कुछ सेवा करने का  ख्याल हृदय में स्वाभाविक ही उदय होता है , इसलिए गुरु - भक्ति स्वाभाविक है । गुरु - भक्ति के विरोध में कुछ कहना फजूल है । निःसन्देह अयोग्य गुरु की भक्ति को बुद्धिमान आप त्यागेंगे और दूसरे से भी इसका त्याग कराने की कोशिश करेंगे , यह भी स्वाभाविक ही है ।। इति।।


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प्रभु प्रेमियों ! मोक्ष दर्शन के उपर्युक्त पैराग्राफों से हमलोगों ने जाना कि What is the need for a complete and true Guru, who can be a true Sadhguru, who can be a Sadhguru, the importance of God attainment, the identity of a true Sadhguru, the glory of Guru Bhakti, why Guru Seva is necessary, the importance of Guru Kripa, the Guru  Glory, Guru Bhakti Bhajan, Guru Vandana, Guru Sangeet, Guru's Devotional Song, Guru Kripa Hi Kevalam, Guru Kripa Bhajan, Who is Sadguru, Who is Sadguru, Who is Satguru at present, Who is the true Sadguru, Who is Sadguru, इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस पोस्ट के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। निम्न वीडियो में उपर्युक्त वचनों का पाठ किया गया है। इसे भी अवश्य देखें, सुनें।


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मोक्ष दर्शन (77-83) सच्चे सद्गुरु की आवश्यकता और उनके मिलने का लाभ ।। सद्गुरु महर्षि मेंहीं मोक्ष दर्शन (77-83)  सच्चे सद्गुरु की आवश्यकता और उनके मिलने का लाभ  ।।  सद्गुरु महर्षि मेंहीं Reviewed by सत्संग ध्यान on 1/23/2019 Rating: 5

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