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"महर्षि मेंहीं पदावली- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी" एक परिचय व विक्री

महर्षि मेंहीं पदावली- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी

       प्रभु प्रेमियों ! भारतीय साहित्य में वेद, उपनिषद, उत्तर गीता, भागवत गीता, रामायण आदि सदग्रंथों का बड़ा महत्व है। इन्हीं सदग्रंथों जैसा परम पूजनीय ग्रंथ 'महर्षि मेंहीं पदावली' हम  संतमतानुयायियों के लिए है। जिसका शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी पूज्य पाद लाल दास जी महाराज द्वारा एवं अन्य महापुरुषों के द्वारा किया गया है । आइए इस पुस्तक के बारे में कुछ मुख्य-मुख्य जानकारियां प्राप्त करें-

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महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ भावार्थ और टिप्पणी मुख्य कबर

महर्षि मेंहीं पदावली की भजन-सूची

जय गुरु महाराज, प्रभु प्रेमियों ! इस भजन  सूची में आपको जिस भी भजन के बारे में जानना है, उस भजन पर दबाने से आप उस पेज पर चले जाएंगे, जहां पर उस भजन के बारे में विस्तार से चर्चा किया गया है।

अ     5 अव्यक्त अनादि अनन्त अजय अज । 27 अपनि भगतिया सतगुरु साहब। ४८ अधर डगर को सद्गुरु भेद बतावै। ६० अधः ऊर्ध्व अरु दायें बायें । ९७ अति पावन गुरु मंत्र ११७ अन्तर के अन्तिम तह में गुरु हैं । १३३ अद्भुत अन्तर की डगरिया १४२ अज अद्वैत पूरन ब्रह्मपर की ।
आ     ४९ आहो भाई होऊ गुरु आश्रित हो ७२ आओ वीरो मर्द बनो अब ११३ आगे माई सतगुरु खोज करहु 127, आहो भक्त सार भगति करु हो १२८ आहो प्रेमी करु प्रेम प्रभु सए हो १२९ आहो ज्ञानी ज्ञान गुनी प्रभु भजु हो १३९ आरति तन - मंदिर में कीजै . १४० आरति परम पुरुष की कीजै । आरति अगम अपार पुरुष की 00 आरति संग सतगुरु के कीजै ( संत तुलसी साहब )
 ए+ऐ     ७१ ऐन महल पट बन्द के ११६ एकबिन्दुता दुर्बान हो,
 क     ११२ करिये भाई सतगुरू गुरू पद सेवा, १२० क्या सोवत गफलत के मारे
ख     ५१ ( क ) खोंजो पंथी पंथ , तेरे घट भीतरे ५२ ( ख ) खोजो पंथी पंथ , तेरे घट भीतरे ६१ खोज करो अन्तर उजियारी १०१ खोजत खोजत सतगुरु भेटि गेला
ग     १८ गुरू गुरू मैं करौं पुकारा १९ गुरुदेव दानि तारण । २० गुरु मम सुरत को गगन पर चढ़ाना  २१ गुरु खोलिये वज़ कपाट । २२ गुरु कीजै भवनिधि पार। ५० गुरु के शरण गहु , धन धन गुरु कहु । ६५ गंग जमुन युग धार ६६ गंग जमुन सरस्वती संगम पर ९१ गुरु गुरु त्राहि गुरु । ९४ गरु नाम गुरु नाम गुरु नाम ९५ गुरु धन्य हैं गुरु धन्य हैं । ९६ गुरु दीनदयाला नजर निहाला १०६ गुरु सतगुरु सम हित नहिं कोऊ १०८ गुरु को सुमिरो मीत । १३६ गुरु हरि चरण में प्रीति हो १४४ गुरु जुगती लय घट पट टारौं ।
घ     ५५ घट पट तिहू के पार में ५६ घट बिच अजब तमाशा ५७ घट बीच अजब तमाशा ११९ घटवा घोर रे अंधारी
च     १०७ चलु लु चलु भाई
छ     १२६ छन छन पल पल समय सिरावे
ज     ४ जय जय परम प्रचण्ड तेज तम मोह विनाशन । १६ जय जयति सद्गुरु जयति जय जय। ७५ जहाँ सूक्ष्म नाद् ध्वनि आज्ञा । ७९ जय जय राम जय जय राम । ८० जय जय राम जय जय रामा कहु राम । १०३ जीव उद्धार का द्वार पुकार कहीं । १२१ जनि लिपटो रे प्यारे जग परदेसवा। १३२ जौं निज घट रस चाहो। १३५ जीवो ! परम पिता निज चीन्हो १३८ जेठ मन को हेठ करिये ।
 त     ११ तुम साहब रहमान हो
 द     २४ दया प्रेम सरूप सतगुरु १२५ दिन बीतत जावे , आयु खुटावेे
 ध     ३३ ध्यानाभ्यास करो सद सदही। १३० ध्यान - भजन - हीन लहिहौ न प्रभु धन
 न      १४ नमामी अमित ज्ञान रूपं कृपालं ३४ नैनों के तारे चश्म रोशन ४० नैन सों नैनहिं देखिय जैसे ४२ नहीं थल नहीं जल ५४ निज तन में खोज सज्जन ६७ नोकते सफेद सन्मुख १२२ नाहिंन करिये जगत सों प्रीती १३४ नित प्रति सत्संग कर ले प्यारा।
 प     ९ प्रेम - भक्ति गुरु दीजिये १२ प्रभु अटल अकाम अनाम । ३५ प्रभु अकथ अनामी सब पर स्वामी ३६ प्रभु वरणन में आवें नाहीं । ३७ प्रभु अकथ अनाम अनामय। ३९ प्रभु तोहि कैसे देखन पाऊँ ४५ पाँच नौबत बिरतन्त कहौं। ५८ प्रथमहिं धारो गुरु को ध्यान १३१ प्रभु मिलने जो पथ धरि जाते १४३ प्रेम प्रीति चित चौक लगाये
ब   २६ बार - बार करुं बनती। १११ बिना गुरु की कृपा पाये
भ     ३० भजु मन सतगुरु सतगुरु। ७० भाई योगह्रदयवृत्तकेन्द्रविन्दु जो चमचम । ७७ भजो सतनाम सतनाम सतनाम ए ८३ भजो हो गुरु चरण कमल ८४ भजु मन सतगुरु दयाल , काटें जम जाला ८५ भजु मन सतगुरु दयाल , गुरु दयाल प्यारे। ८६ भजो हो मन गुरु उदार । ८७ भजो भजो गुरु नाम हो प्यारे ८८ भजो गुरु नामा , लहु विश्रामा । ८९ भजो साध गुरु साध गुरु साध गुरु ए । ९० भजो सत्यगुरु सत्यगुरु सत्यगुरु ए ९२ भजो भजो गुरुदेव हो भाई
म      ३ मंगल मूरति सतगुरू २३ मोहि दे दो भगती दान ४१ मेधा मन संग जेते । ७४ मन तुम बसो तीसरो नैना १३७ मास आसिन जगत वासिन
 य      ५३ योगहृदयकेन्द्रविन्दु में युग दृष्टियों को जोड़कर। ६८ यहि विधि जैबै भव पार । ७६ योगहृदयवृत्तकेन्द्रविन्दु सुख - सिन्धु की ११५ योगहृदय में वास ना १२४ यहि मानुष देह समैया में ।
र     ८१ रामनाम अमर नाम भजो भाई सोई
श    ७ श्री सद्गुरु की सार शिक्षा ।
स     १ सब क्षेत्र क्षर अपरा परा पर। २ सब सन्तन्ह की बडि बलिहारी ३ सन्तमत - सिद्धान्त ( गद्य ) ८ सन्तमत की परिभाषा ( गद्य ) १० सत्यपुरुष की आरति कीजै १३ सर्वेश्वरं सत्य शान्तिं स्वरूप १५ सद्गुरु नमो सत्य ज्ञानं स्वरूपं १७ सतगुरु सुख के सागर २८ सतगुरु दाता सतगुरु दाता २९ सतगुरु दरस देन हित आए ३१ सतगुरु जी से अरज हमारी ३२ सतगुरु साहब की बलिहारी। ४४ सन्तमते को बात , कहूँ साधक हित लागी ४६ सृष्टि के पाँच हैं केन्द्रन ४६ सुनिये सकल जगत के वासी ५९ सुखमन झलझल विन्दु झलके ६२ सुषमनियाँ में मोरी नजर लागी ६३ सुष्मनियाँ में नजरिया थिर होइ ६४ सुखमन के झीना नाल से ६९ सुरति दरस करन को जाती ७३ साँझ भये गुरु सुमिरो भाई। ७८ सतनाम सतनाम सतनाम भज ८२ सब भव भय भंजन सतगुरू गुरुदेव गुरु । ९९ सत्य ज्ञान दायक गुरु पूरा १०० सतगुरु संत परमारथ रूपा १०२ सन्तन मत भेद प्रचार किया १०४ सतगुरु सतगुरु नितहि पुकारत १०५ सतगुरु चरण टहल नित करिये । १०९ सतगुरु सेवत गुरु को सेवत । ११० सतगुरु पद बिनु गुरु भेटत नाहीं ११४ सम दम और नियम यम । ११८ सुरत सम्हारो अधर चढाओ १२३ समय गया फिरता नहीं
 ह     २५ हे प्रेमरूपी सतगुरु ३८ है जिसका नहीं रंग नहिं रूप
 क्ष     ४३ क्षेत्र क्षर अक्षर के पार में ।
 त्र     ९३ त्राहि गुरु त्राहि गुरु त्राहि गुरु कहुं हो, *


पुस्तक परिचय व ऑनलाइन बिक्री

     इस पुस्तक की जितनी भी बड़ाई की जाए कम है; क्योंकि संत वाणियों एवं गुरु महाराज के पुस्तकों का पूरी तरह से अध्ययन किए बिना इस पुस्तक को अच्छी तरह से कोई नहीं लिख सकता। गुरु महाराज के प्रत्येक पद की व्याख्या भावार्थ और टिप्पणी करते समय उद्धरण का ठोस  नमूना  दिया गया है। जो अपने आप में अनूठी है। इस पुस्तक के विषय में अन्य महापुरुषों एवं स्वयं लेखक के क्या विचार हैं वह निम्नलिखित चित्र से ज्ञात होता है-

"महर्षि मेंहीं पदावली- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी" प्रकाशकीय
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"महर्षि मेंहीं पदावली- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी" /प्रकाशकीय पृष्ठ दो
"महर्षि मेंहीं पदावली- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी" एक परिचय व विक्री/प्रकाशकीय पृष्ठ दो

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"महर्षि मेंहीं पदावली- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी" एक परिचय व विक्री "महर्षि मेंहीं पदावली- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी" एक परिचय व विक्री Reviewed by सत्संग ध्यान on फ़रवरी 04, 2019 Rating: 5

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