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सत्संग योग (चारों भाग) एक परिचय और ब्रिक्री / Literature in Sadhguru Maharishi

त्संग योग (चारों भाग) एक परिचय

      सत्संग-योग (चारो भाग)- सद्गुरु महर्षि मेंहीं की यह पाँचवीं रचना है। इसमें सूक्ष्म भक्ति का निरूपण वेद, शास्त्र, उपनिषद्, उत्तर- गीता, गीता, अध्यात्म-रामायण, महाभारत, संतवाणी और आधुनिक विचारकों के विचारों द्वारा किया गया है। इसके स्वाध्याय और चिन्तन-मनन से अध्यात्म-पथ के पथिकों को सत्पथ मिल जाता है। इसका प्रकाशन सर्वप्रथम 1940 ई0 में हुआ था। वर्तमान में यह 21 वें संस्करण का पुस्तक प्रस्तुत है जिससे मूल रूप में ही छापा गया है। 

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सत्संग योग एक परिचय



सत्संग योग (चारों भाग) एक परिचय और  ब्रिक्री / Literature in Sadhguru Maharishi, सत्संग योग मूल कबर
सत्संग योग मूल कबर


सत्संग योग की विशेषता


      सत्संग योग क्या है? यह एक अध्यात्म ज्ञान का खजाना है। स्वयं गुरुदेव कहते थे कि सत्संग योग भानुमती का पिटारा है। (भानुमति एक जादूगरनी थी। जो लोगों की मनोवांछित वस्तुएं अपने पिटारा से निकाल कर दे दिया करती थी।) मोक्ष प्राप्ति के लिए जितनी ज्ञान की आवश्यकता है, वह सत्संग योग के इस पिटारे से प्राप्त किया जा सकता है। इसे समझने के लिए इसकी भूमिका को अवश्य पढ़ें जो निम्नांकित चित्र में है।

सत्संग योग पुस्तक के प्रकाशक, संस्करण आदि के विवरण
सत्संग योग पुस्तक के संस्करण, प्रकाशक आदि के विवरण

सत्संग योग की भूमिका पृष्ठ एक
सत्संग योग की भूमिका पृष्ठ 1

सत्संग योग की भूमिका पृष्ठ दो
सत्संग योग की भूमिका पृष्ठ दो

सत्संग योग की भूमिका पृष्ठ 3
सत्संग योग की भूमिका पृष्ठ 3


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      प्रभु प्रेमियों ! गुरु महाराज के भारती पुस्तक "सत्संग योग" के इस चित्रलेख का पाठ करके आपलोगों ने जाना कि  सत्संग योग क्या है? इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले हर पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी।




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सत्संग योग (चारों भाग) एक परिचय और ब्रिक्री / Literature in Sadhguru Maharishi सत्संग योग (चारों भाग) एक परिचय और  ब्रिक्री / Literature in Sadhguru Maharishi Reviewed by सत्संग ध्यान on जनवरी 31, 2019 Rating: 5

1 टिप्पणी:

  1. दूसरों से आदर पाने की इच्छा मत रखिए; क्योंकि प्राय: लोग स्वयं आदर चाहते हैं; परंतु दूसरों को आदर देना नहीं चाहते।

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