प्रभु प्रेमियों ! महर्षि मेँहीँ साहित्य सूची की पहली पुस्तक "सत्संग योग (चारो भाग)" है । इस पुस्तक में सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज बताते हैं कि- 'इसमें सूक्ष्म भक्ति का निरूपण वेद, शास्त्र, उपनिषद्, उत्तर- गीता, गीता, अध्यात्म-रामायण, महाभारत, संतवाणी और आधुनिक विचारकों के विचारों द्वारा किया गया है। इसके स्वाध्याय और चिन्तन-मनन से अध्यात्म-पथ के पथिकों को सत्पथ मिल जाता है। " आइये इस धर्म ग्रंथ का सिंहावलोकन करें-
सत्संग-योग चारो भाग
सत्संग-योग चारो भाग की विशेषता
"सत्संग-योग" एक अध्यात्म ज्ञान का खजाना है। इसके बारे मै स्वयं गुरुदेव कहते थे कि "सत्संग-योग" भानुमती का पिटारा है। (भानुमति एक जादूगरनी थी। जो लोगों की मनोवांछित वस्तुएं अपने पिटारा से निकाल कर दे दिया करती थी।) मोक्ष प्राप्ति के लिए जितनी ज्ञान की आवश्यकता है, वह सभी ज्ञान "सत्संग-योग" के इस पिटारे से प्राप्त किया जा सकता है।
उपरोक्त कथन पूज्यपाद लालदास जी महाराज के शब्दों में सुनने के लिए निम्न विडियो देंखे-
संतमत और वेदमत में भिन्नता नहीं है, इस बात को प्रमाणित करने वाली यह ग्रंथ सदगुरु महर्षि मेंहीं की प्रमुख पुस्तक है। जो संतमत का प्रतिनिधि ग्रंथ है। इसमें 52 संत-महात्माओं के उपदेशों का संकलन किया गया है।
इस ग्रंथ की एक झलक निम्नांकित चित्रों में देखें. यह दो संस्करणों में उपलब्ध है- एक साधारण संस्करण और दूसरा हार्ड कवर संस्करण. इसके साथ ही इसका पीडीएफ फाइल भी उपलब्ध है.
सत्संग-योग चारो भाग
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इस ग्रंथ का हार्डकवर संस्करण का झलक निम्न चित्र में देखें-
सत्संग-योग चारो भाग हार्डकवर
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प्रभु प्रेमियों ! सत्संग-योग योग के चौथे भाग का प्रकाशन मोक्ष-दर्शन नाम से अलग से भी प्रकाशित किया गया है और उसका अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित है और इसका पीडीएफ और मूल संस्करण दोनों उपलब्ध है। उसके बारे में इसी साइट पर महर्षि मेँहीँ साहित्य सूची में देखें। इस ग्रंथ के बारे इतनी जानकारी पर्याप्त है। सत्संग-योग ग्रंथ का अंग्रेजी संस्करण भी है। उसके बारे में ज्यादा जानकारी पाने के लिए 👉 यहाँ दवाएँ।
इतना जान लेने के बाद कि यह ग्रंथ योग का खजाना है और इसमें योग से संबंधित हर तरह की जानकारी है, जिसके कारण गुरु महाराज इसे भानुमती का पिटारा कहा करते थे। आप इसे अपने पास अवश्य रखना चाहेंगे। तो देर किस बात की इसे अभी ऑनलाइन खरीदने के लिए निम्नलिखित लिंक में से किसी भी इच्छित प्लेटफार्म का चयन करके अभी ऑर्डर करें।
इस पुस्तक में कई वेराइटी है जैसे कि हार्डकवर युक्त संस्करण, बिशिष्ट संस्करण, पीडीएफ संस्करण इत्यादि इसके साथ ही यह कई वेबसाइटों पर भी उपलब्ध है जैसे कि @amazon, @instamojo, @satsangdhyanstoreइत्यादि वेबसाइटों पर । इन सभी बातों की जानकारी के लिए अभी खरीदे पर दवाएँ। और इसे हमारे स्टोर पर भुगतान कर खरीदने के लिए पुस्तक के चित्र पर दवाएँ। तथा शिपिंग चार्ज सहित तुरंत एक प्रति औडर का भुगतान करने के लिए निम्न कोड को स्कैन कर पेमेंट करें। यहाँ के पेमेंट से केवल भारत में शिपिंग शामिल है। विदेशी शिपिंग चार्ज के लिए हमारे वाट्सऐप नंबर 7547006282 पर मैसेज करें। कौल नहीं करेंगे। इससे ध्यान में विध्न होता है।
सत्संग-योग को अच्छी तरह से समझने के लिए निम्नलिखित ग्रंथ भी प्रकाशित है-
सत्संग-योग चारो भाग
प्रभु प्रेमियों ! 'सत्संग योग' के प्रथम भाग को अच्छी तरह से और साधारण भाषा में समझने के लिए पूज्यपाद स्वामी लालदास जी महाराज ने "उपनिषद् - सार" ( 'सत्संग-योग' के प्रथम भाग में संकलित उपनिषदों के पद्यात्मक मंत्रों की सरल भाषा में व्याख्या ) नामक पुस्तक लिखी है। सत्संग योग के पहले भाग के अधिकांश श्लोक गीता-सार में भी है। इन दोनों पुस्तकों के साथ सत्संग योग के दूसरे भाग को समझने में मदद के लिए सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज द्वारा संपादित "संतवाणी सटीक" और स्वामी लालदास जी महाराज द्वारा संपादित "संतवाणी-सुधा सटीक" अत्यंत महत्वपूर्ण है। सत्संग-योग के चौथे भाग को समझने के लिए "पिंड माहीं ब्रह्मांड", "मोक्ष दर्शन का शब्दकोश", "संतमत- दर्शन" तथा "महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित" नामक पुस्तकों का भी पाठ करना चाहिए.
सुरत शब्द योग ही सन्तमत की विशेषता है । नाम - भजन तथा ध्वन्यात्मक सारशब्द का भजन एक ही है ......
सारे सान्तों के पार में एक अनन्त अवश्य ही है । यह एक और अनादि है , यह जड़ातीत , चैतन्यातीत अचिन्त्यस्वरूप है , मायिक विस्तृतत्व - विहीन है , यही सन्तमत का परम अध्यात्म पद है । अपरा और परा प्रकृतियाँ .....
अंशी और अंश , आत्म - अनात्म तथा क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का विचार....
कारण महाकारण के विचार , परम प्रभु की प्राप्ति के बिना कल्याण नहीं ...
क्षर अक्षर का विचार , परम प्रभु में मौज हुए बिना सृष्टि नहीं होती । मौज कम्पमय है आदिशब्द सृष्टि का साराधार है ....
अनादिनाद का ही नाम रामनाम , सत्यनाम , ॐकार है , शब्द का गुण , सृष्टि के दो बड़े मंडल , अपरा प्रकृति के चार मण्डल , पिण्ड और ब्रह्माण्ड के मण्डलों का सम्बन्ध , भिन्न भिन्न मण्डलों के केन्द्र , अनन्त , अनाम , पिण्ड - ब्रह्माण्ड का सांकेतिक चित्र ...
केन्द्रीय शब्दों का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर है , सूक्ष्म शब्द स्थूल में व्यापक तथा विशेष शक्तिशाली होता है , केन्द्रीय शब्दों को पकड़कर सर्वेश्वर तक पहुँच सकते हैं ...
प्रकृति अनाद्या कैसे है ? कैवल्य शरीर चेतन अनन्त से बढ़कर कोई सूक्ष्म और विस्तृत नहीं हो सकता , अपरिमित परिमित पर शासन करता है ...
अनंत से बढ़कर कोई सूक्ष्म और विस्तृत नहीं हो सकता, अपरिमित परमित पर शासन करता है....
अन्तर में चलना परम प्रभु सर्वेश्वर की भक्ति है - यही आन्तरिक सत्संग है , मन की एकाग्रताएकविन्दुता है- .......
दूध में घी की तरह मन में सुरत है , सृष्टि के जिस मण्डल में जो रहता है , वह वहीं का अवलम्ब लेता है ...
शब्द - साधन का मन पर प्रभाव , पंच महापाप , निम्न देशों के शब्द पकड़कर ऊँचे लोकों के शब्द पकड़ सकते हैं ......
सगुण - निर्गुण - उपासना के भेद , उपनिषदों के शब्दातीत पद और श्रीमद्भगवद्गीता के क्षेत्रज्ञ तत्त्व के परे कोई अन्य तत्त्व नहीं है .......
सारशब्द के अतिरिक्त मायिक शब्दों का भी ध्यान आवश्यक है । दृष्टियोग से शब्दयोग आसान है ......
जड़ात्मक प्रकृति मण्डल में सारशब्द की प्राप्ति युक्ति - युक्त नहीं , शब्द ध्यान भी ज्योति मण्डल में पहुँचा देता है ...
सारशब्द अलौकिक है । इसकी नकल लौकिक शब्दों में नहीं हो सकती किसी वर्णात्मक शब्द को सारशब्द की नकल कहना अयुक्त .......
जो सब मायिक शब्द नीचे के दर्जे में भी सुने जा सकते हैं , वे ही ऊपर दर्जे में भी सुनाई पड़ सकते हैं ; इनका अभ्यास भी उचित ही है ...
सूक्ष्म मण्डल के शब्द स्थूल मण्डल के शब्द से विशेष सुरीले और मधुर होते हैं , कैवल्य पद में शब्द की विविधता नहीं है , गुरु - भक्ति बिना परम कल्याण नहीं ...
सद्गुरु की पहचान , उनकी श्रेष्ठता , गुरु के आचरण का शिष्य के ऊपर प्रभाव ......
गुरु की आवश्यकता , गुरु का सहारा ......
गुरु की कृपा का वर्णन , गुरु भक्ति .......
सन्तमत की उपयोगिता , भिन्न - भिन्न इष्टों की आत्मा अभिन्न है .......
नादानुसन्धान की विधि , यम - नियम के भेद ........
तीन बन्द , ध्यानाभ्यास से प्राण स्पन्दन का बंद होना .....
मन पर दृष्टि का प्रभाव श्वास के प्रभाव से अधिक है , साधक का स्वावलम्बी होना आवश्यक है
मांस - मछली और मादक द्रव्यों का परित्याग आवश्यक है ....
शुद्ध आत्म - स्वरूप अनन्त है , इसका कहीं से आना - जाना नहीं माना जा सकता.....
जीवता का उदय और अन्त , मोक्ष - साधन में लगे हुए अभ्यासी की गति , परम प्रभु की सृष्टि मौज का केन्द्र में लौटना असम्भव ......
ईश्वर की भक्ति का साधन और मुक्ति का साधन एक ही है.....
परम प्रभु सर्वेश्वर के अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त करने का साधन....
ॐकार वर्णन ....
सगुण - निर्गुण और सगुण - अगुण पर अनाम की उपासनाओं का विवेचन ......
प्रभु प्रेमियों ! गुरु महाराज के भारती पुस्तक "सत्संग योग" के परिचय में आपलोगों ने जाना कि मोक्ष प्राप्ति के विषय में वेद-उपनिषद एवं अन्य संत-महात्माओं के क्या विचार हैं?इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले हर पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी।निम्नलिखित वीडियो मेंें सत्संग योग चारों भाग की झांकी दिखाई गई है।
MS02 . रामचरितमानस-सार सटीक- सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी द्वारा रचित एक अनोखा ग्रंथ है, जो रामचरितमानस के गूढ़ रहस्यों, खासकर भक्ति योग और ध्यान (दृष्टियोग) पर केंद्रित है, जिसमें नवधा भक्ति और कागभुशुंडि जी के भजन-साधन की व्याख्या की गई है, ताकि पाठक राम-कथा के साथ-साथ आंतरिक आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर सकें, काम, क्रोध, लोभ जैसे विकारों को छोड़कर ईश्वर-भक्ति के मार्ग पर चल सकें और आंतरिक साधना (जैसे दृष्टियोग) के माध्यम से मोक्ष पा सकें। संत कवि मेँहीँ की यह दूसरी रचना है। यह 1930 ई0 में भागलपुर, बिहार प्रेस से प्रकाशित हुई थी। इसमें गोस्वामी तुलसीदासजी के रामचरितमानस के 152 दोहों और 951 चौपाइयों की व्याख्या की गयी है। इसका मुख्य लक्ष्य है-स्थूल भक्ति और सूक्ष्म भक्ति के साधनों को प्रकाश में लाना । यह केवल कथा-वाचन नहीं, बल्कि रामचरितमानस के सूक्ष्म आध्यात्मिक अर्थों को स्पष्ट करती है। ( और जाने )
सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की पुस्तकें मुफ्त में पाने के लिए शर्तों के बारे में जानने के लिए 👉यहां दवाएं।
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MS01 सत्संग-योग चारो भाग || संतमत सत्संग का प्रतिनिधि ग्रंथ || भारतीय योगविद्या का खजाना
Reviewed by सत्संग ध्यान
on
6/19/2020
Rating: 5
दूसरों से आदर पाने की इच्छा मत रखिए; क्योंकि प्राय: लोग स्वयं आदर चाहते हैं; परंतु दूसरों को आदर देना नहीं चाहते।
जवाब देंहटाएंAmit pandit
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