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शब्दकोश-6 अपरम्पार - अलख तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष

संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष / अ

     प्रभु प्रेमियों ! ' संतमत+ मोक्ष - दर्शन का शब्दकोश ' नाम्नी प्रस्तुत लेख में ' मोक्ष - दर्शन ' + 'महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ भावार्थ और टिप्पणी सहित' + 'गीता-सार' + 'संतवाणी सटीक' आदि धर्म ग्रंथों में गद्यात्मक एवं पद्यात्मक वचनों में आये शब्दों के अर्थ लिखे गये हैं . कोष्ठकों में शब्दों के व्याकरणिक परिचय भी देने का प्रयास किया गया है और शब्दों से संबंधित कुछ सूक्तियों का संकलन किया गया है. जो पूज्यपाद लालदास जी महाराज द्वारा लिखित व संग्रहित  है । धर्मप्रेमियों के लिए यह कोष बड़ी ही उपयोगी है । आईए इस कोष के बनाने वाले महापुरुष का दर्शन करें.

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सद्गुरु महर्षि मेंही और बाबा लाल दास जी
बाबा लालदास जी और गुरुदेव

अपरम्पार - अलख    ||   संतमत + मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष


अपरम्पार - अलख


अपरा ( सं ० वि ० स्त्री ० ) = जो श्रेष्ठ नहीं है । ( स्त्री ० ) अपरा ( जड़ ) प्रकृति जो चेतन प्रकृति से श्रेष्ठ नहीं है । 

अपरिमित ( सं ० वि ० ) = जो परिमित ( सीमित ) नहीं है , असीम , सीमा रहित । 

अपरोक्ष ( सं ० वि ० ) = जो परोक्ष नहीं हो , प्रत्यक्ष , जिसका अनुभव हुआ हो , जो आँखों के सामने हो । 

अपरोक्ष ज्ञान ( सं ० , पुं ० ) = प्रत्यक्ष ज्ञान , अनुभव - ज्ञान ।

अपान ( सं ० , पँ ० ) = नाक से बाहर फेंकी गयी वायु , गुदा मार्ग से बाहर निकलनेवाली वायु । 

अपार ( सं ० , वि ० ) = पार - रहित , जिसका दूसरा किनारा दिखायी न पड़े , आदि - अन्त तथा मध्य - रहित , बहुत अधिक ।

अपुनपौ ( हिं ० , पुं ० ) = अपनापा , अपनी आत्मा । 

अप्रतिहत ( सं ० , वि ० ) = बेरोक टोक , निर्विघ्न , बाधा - रहित , बिना किसी बाधा के । 

अभिन्न ( सं ० वि ० ) = जो भिन्न नहीं हो , जो अलग नहीं हो , एक ही एक अभिमान ( सं ० , पुं ० ) अहंकार । 

अभोगी ( सं ० , वि ० पुं ० ) = भोग = घमंड , नहीं भोगनेवाला , विरक्त , निर्लिप्त । 

अभ्यास ( सं ० , पुं ० ) = कोई काम पूरा करने के लिए या कोई काम करने की कला सीखने के लिए कोई क्रिया बारंबार करना ।

अभ्यासी ( सं ० , वि ० पुं ० ) = अभ्यास करनेवाला , साधक 

अमर पद = अविनाशी पद , परमात्मा ।  (श्रीचंद वाणी

अमीर खुशरो- आरंभिक खड़ी बोली हिंन्दी के एक मुसलमान कवि जो ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे । 

अमोघ ( सं ० , वि ० ) = अचूक , अव्यर्थ , निष्फल नहीं होनेवाला , बेकार नहीं होनेवाला । 

अमोघशक्ति ( सं ० , वि ० ) जिसकी शक्ति कभी घटे - बढ़े नहीं और नष्ट नहीं हो । 

अयुक्त ( सं ० , वि ० ) = युक्ति संगत नहीं , तर्क - संगत नहीं , विचार के अनुकूल नहीं , उपयुक्त नहीं , युक्त नहीं , ठीक नहीं , अनुचित । 

अयोग्य ( सं ० , वि ० ) योग्य नहीं , लायक नहीं , जो किसी काम के योग्य नहीं हो । 

अरूप ( सं ० , पुं ० ) = रूप - रहित ; वह जो न स्थूल दृष्टि से दिखायी पड़े , न सूक्ष्म दृष्टि से । 

अलख ( सं ० वि ० ) नहीं , दिखायी पड़नेयोग्य , जो स्थूल या सूक्ष्म किसी भी दृष्टि से देखने में नहीं आए । ( पु० ) परमात्मा 


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     प्रभु प्रेमियों ! संतमत की बातें बड़ी गंभीर हैं । सामान्य लोग इसके विचारों को पूरी तरह समझ नहीं पाते । इन पोस्टों  में संत , संतमत , संतमत की उपयोगिता , जड़ प्रकृति , चेतन प्रकृति , आदिनाद , सृष्टि - क्रम , सृष्टि के मंडल , जीव , ब्रह्म , ईश्वर , परमेश्वर , ईश्वर की भक्ति , परम मुक्ति , संतमत की साधना - पद्धतियों ( मानस जप , मानस ध्यान , दृष्टियोग तथा शब्द - साधना ) , साधना - पद्धतियों के अभ्यास से उत्पन्न अनुभूतियों , सद्गुरु की महत्ता , यम - नियम , साधकों के आहार - विहार , सत्संग आदि से संबंधित बातों पर चर्चा की गई हैं । '



मोक्ष दर्शन का शब्दकोश
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शब्दकोश-6 अपरम्पार - अलख तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष शब्दकोश-6   अपरम्पार - अलख   तक के शब्दों के शब्दार्थादि  ||  संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष Reviewed by सत्संग ध्यान on 12/07/2021 Rating: 5

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