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शब्दकोश-5 अनुकूल - अपरम्पार तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष

 संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष / अ

     प्रभु प्रेमियों ! ' संतमत+ मोक्ष - दर्शन का शब्दकोश ' नाम्नी प्रस्तुत लेख में ' मोक्ष - दर्शन ' + 'महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ भावार्थ और टिप्पणी सहित' + 'गीता-सार' + 'संतवाणी सटीक' आदि धर्म ग्रंथों में गद्यात्मक एवं पद्यात्मक वचनों में आये शब्दों के अर्थ लिखे गये हैं . कोष्ठकों में शब्दों के व्याकरणिक परिचय भी देने का प्रयास किया गया है और शब्दों से संबंधित कुछ सूक्तियों का संकलन किया गया है. जो पूज्यपाद लालदास जी महाराज द्वारा लिखित व संग्रहित  है । धर्मप्रेमियों के लिए यह कोष बड़ी ही उपयोगी है । आईए इस कोष के बनाने वाले महापुरुष का दर्शन करें.

अनादि - अनुकूल   तक के शब्दों का अर्थ पढ़ने के लिए   👉  यहां दवाएं

सद्गुरु महर्षि मेंही और बाबा लाल दास जी
बाबा लालदास जी और गुरुदेव

अनुकूल -  अपरम्पार   तक के शब्दों के शब्दार्थादि


अनुकूल - अपरम्पार


अनुकूल (सं 0, वि 0) = अनुरूप, किसी पक्ष का समर्थन करने वाला ।

अनुचित ( सं ० , वि ० ) जो उचित नहीं हो , जो ठीक नहीं हो , गलत । 

अनुपम ( सं ० , वि ० ) = उपमा रहित , तुलना - रहित , अद्वितीय , बेजोड़ , एक - ही - एक , जिसके समान दूसरा कोई या कुछ नहीं हो । 

अनुयायी ( सं ० , वि ० ) = पीछे - पीछे अन्तर्मार्गी चलनेवाला , किसी के उपदेश या विचारधारा पर चलनेवाला । ( पुं ० ) सेवक , शिष्य । 

अनुरूप ( सं ० , वि ० ) = जो किसी के रूप के समान हो , जो किसी के जैसा हो , समान रूपवाला , एक जैसे रूपवाला ।

अंचल - अँचला , कटिवस्त्र , कपड़े का एक टुकड़ा जिसे साधु लोग धोती के स्थान पर लपेटे रहते हैं । (श्रीचंद वाणी

अनेकानेक ( सं ० , वि ० ) = अनेक अनेक , अनेक प्रकार के ।

अन्डरस्टैण्ड ( अँ ० स ० क्रि ० ) = समझना । 

अन्त ( सं ० , पुं ० ) = समाप्ति , छोर , नाश । 

अन्तःकरण ( सं ० , पुं ० ) = भीतर की इन्द्रिय ; जैसे मन , बुद्धि , चित्त और अहंकार । 

अन्तर ( सं ० , पुं ० ) = अन्दर , भीतर , भिन्नता , भेद , अलगाव ।

अन्तर - पट ( सं ० , पुं ० ) - अन्दर का आवरण , हृदय का परदा , आत्मा पर पड़ा हुआ आवरण ; अंधकार , प्रकाश तथा शब्द के आवरण ।

अन्तर - यात्रा ( सं ० , स्त्री ० ) अन्दर में चलना , आध्यात्मिक साधना के द्वारा शरीर के अन्दर ही अन्दर चलना । 

अन्तर - साधन ( सं ० , पुं ० ) = शरीर के अन्दर की जानेवाली आध्यात्मिक साधना ( ध्यानाभ्यास ) | 

अन्तर्मार्गी ( सं ० , वि ० ) = शरीर = के अन्दर ज्योति और नाद के मार्ग पर सुरत से चलनेवाला । 

अन्तर्मुख ( सं ० , वि ० पुं ० ) अन्दर की ओर सिमटी हुई वृत्तिवाला , जिसकी वृत्ति शरीर के अन्दर सिमट गयी हो ।

अन्तर्मुखी ( सं ० , वि ० स्त्री ० ) = अन्दर की ओर सिमटी हुई वृत्तिवाली । 

अन्तस्तल ( सं ० , पुं ० ) = भीतरी तल , भीतरी भाग । 

अन्तिम ( सं ० , वि ० ) = अन्त का , सबसे अन्त का , अन्त से संबंध रखनेवाला । 

अन्तिम पद ( सं ० , पुं ० ) = सबसे अन्त का स्थान- दर्जा या स्तर , परमात्म - पद । 

अन्य ( सं ० , वि ० ) = दूसरा । 

अन्यथा ( सं ० ) = नहीं तो । ( वि ० ) उलटा , मिथ्या , झूठा ।

अपरम्पार ( सं ० अपरंपर , वि ० ) = वार - पार - रहित , अपार , सीमा रहित , अत्यन्त ।


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     प्रभु प्रेमियों ! संतमत की बातें बड़ी गंभीर हैं । सामान्य लोग इसके विचारों को पूरी तरह समझ नहीं पाते । इन पोस्टों  में संत , संतमत , संतमत की उपयोगिता , जड़ प्रकृति , चेतन प्रकृति , आदिनाद , सृष्टि - क्रम , सृष्टि के मंडल , जीव , ब्रह्म , ईश्वर , परमेश्वर , ईश्वर की भक्ति , परम मुक्ति , संतमत की साधना - पद्धतियों ( मानस जप , मानस ध्यान , दृष्टियोग तथा शब्द - साधना ) , साधना - पद्धतियों के अभ्यास से उत्पन्न अनुभूतियों , सद्गुरु की महत्ता , यम - नियम , साधकों के आहार - विहार , सत्संग आदि से संबंधित बातों पर चर्चा की गई हैं । '



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शब्दकोश-5 अनुकूल - अपरम्पार तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष शब्दकोश-5  अनुकूल - अपरम्पार    तक के शब्दों के शब्दार्थादि  ||  संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष Reviewed by सत्संग ध्यान on 12/07/2021 Rating: 5

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