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मोक्ष दर्शन (44-54) नादानुसंधान किसे कहते हैं और प्रकृति के अनादि होने का राज क्या है ।। महर्षि मेंहीं

सत्संग योग भाग 4 (मोक्ष दर्शन) / 05

प्रभु प्रेमियों ! भारतीय साहित्य में वेद, उपनिषद, उत्तर गीता, भागवत गीता, रामायण आदि सदग्रंथों का बड़ा महत्व है। इन्हीं सदग्रंथों और प्राचीन-आधुनिक पहुंचे हुए संत-महात्माओं के विचारों को संग्रहित करकेे प्रमाणित किया गया है कि सभी पहुंचे हुए संत-महात्माओं के विचारों में एकता है। 'सत्संग योग' नामक इस पुस्तक के चौथे भाग में इन्हीं विचारों के आधार पर और सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की अपनी साधनात्मक अनुभूतियों के आधार पर, मनुष्यों के सभी दुखों से छूटने के उपायों का वर्णन किया गया है। इसे 'मोक्ष दर्शन' के नाम से भी जाना जाता है। इसमें मोक्ष से संबंधित बातों को अभिव्यक्त् करने के लिए पाराग्राफ नंंबर दिया गया हैैैै ।  इन्हीं पैराग्राफों में से  कुुछ पैराग्राफों  के बारे  में  जानेंगेेेे ।   

इसमें Nadanusandhana meaning, नादानुसंधान, नादानुसंधान का परिचय, Nadanusandhana meditation hindi, नाद के प्रकार, naadyog in hindi, नादयोग, अनाहत नाद कैसे सुने, उपनिषदों में और भारती सन्तवाणी में नादानुसंधान वा सुरत - शब्द - योग करने की विधि, बाहर की और भीतर की सब इन्द्रियाँ क्या है? इत्यादि बातों के बारे में बताया गया है। इन बातों को समझने के पहले आइए गुरु महाराज का दर्शन करें।

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नादानुसंधान पर चिंतन करते हुए गुरुदेव

नादानुसंधान किसे कहते हैं और प्रकृति के अनादि होने का राज क्या है ?

संतमत के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज nadanusandhan maianing, naadaanusandhaan, naadaanusandhaan ka parichay, nadanusandhan maiditation hindi, naad ke prakaar, naadyog in hindi, naadayog, anaahat naad kaise sune, upanishadon mein aur bhaaratee santavaanee mein naadaanusandhaan va surat - shabd - yog karane kee vidhi, baahar kee aur bheetar kee sab indriyaan kya hai?  आदि बातों के बारे में बताते हुए 'सत्संग योग' के चौथे भाग में लिखते हैं-


मोक्ष दर्शन (44 से 54)


( ४४ ) केन्द्र से जब सृष्टि के लिए कम्प की धार प्रवाहित होती है , तभी सृष्टि होती है और प्रवाह का सहचर शब्द अवश्य होता है । अतएव संख्या ३९ में कथित पाँचो मण्डलों के केन्द्रों से उत्थित केन्द्रीय शब्द अवश्य हैं । कथित पाँचो मण्डलों के केन्द्रीय ध्वन्यात्मक सब शब्दों के मुंह वा प्रवाह - ओर ऊपर से नीचे को है । इनमें से प्रत्येक , सुरत को अपने - अपने उद्गम - स्थान पर आकर्षण करने का गुण रखता है । सार - शब्द वा निर्मायिक शब्द परम प्रभु सर्वेश्वर तक आकर्षण करने का गुण रखता है और वर्णित दूसरे - दूसरे शब्द , जिन्हें मायावी कह सकते हैं , अपने से ऊँचे दर्जे के शब्दों से , ध्यान लगानेवाले को मिलाते हैं । इनका सहारा लिए बिना सारशब्द का पाना असम्भव है । यदि कहा जाय कि सारशब्द मालिक के बुलाने का पैगाम देता है , तो उसके साथ ही यही कहना उचित है कि इसके अतिरिक्त दूसरे सभी केन्द्रीय शब्दों में से प्रत्येक शब्द अपने से ऊँचे दर्जे के शब्दों को पकड़ा देता है।     

( ४५ ) ऊपर का शब्द नीचे दूर तक पहुँचता है और सूक्ष्म अपने से स्थूल में स्वाभाविक ही व्यापक होता है तथा सूक्ष्म धार , स्थूल धार से लम्बी होती है । इन कारणों से प्रत्येक निचले मण्डल के केन्द्र पर से उसके ऊपर के मण्डल के केन्द्रीय शब्द का ग्रहण होना अंकगणित के हिसाब के सदृश ध्रुव निश्चित है । ऊपर कथित शब्दों के अभ्यास से सुरत का नीचे गिरना नहीं हो सकता है । 

( ४६ ) उपनिषदों में और भारती सन्तवाणी में नादानुसंधान वा सुरत - शब्द - योग करने की विधि इसी हेतु से है कि संख्या ४५ में वर्णित केन्द्रीय शब्दों को ग्रहण करते हुए और शब्द के आकर्षण से खिंचते हुए सृष्टि के सब मण्डलों को पार कर सर्वेश्वर को प्रत्यक्ष पाया जाए । 

( ४७ ) प्रकृति को भी अनाद्या कहा गया है , सो इसलिए नहीं कि परम प्रभु सर्वेश्वर की तरह यह भी उत्पत्तिहीन है ; परन्तु इसलिए कि इसकी उत्पत्ति के काल और स्थान नहीं हैं , क्योंकि इसके प्रथम नहीं ; परन्तु इसके होने पर ही काल और स्थान वा देश बन सकते हैं । यह परम प्रभु के मौज से परम प्रभु में ही प्रकट हुई , अतएव परम प्रभु में ही इसका आदि है और परम प्रभु देश - कालातीत हैं और वे अनादि के भी आदि कहलाते हैं । प्रकृति को अनादि सान्त भी कहते हैं । 

( ४८ ) पिण्ड अर्थात् शरीर को क्षेत्र और आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं । 

( ४९ ) स्थूल , सूक्ष्म , कारण और महाकारण ; ये चारो क्षेत्र वा शरीर जड़ हैं । इनसे आवरणित रहने पर परम प्रभु सर्वेश्वर का वा निज आत्मस्वरूप का अपरोक्ष ज्ञान नहीं हो सकता है । 

( ५० ) कैवल्य शरीर वा क्षेत्र चेतन है । यह परम प्रभु सर्वेश्वर का अत्यन्त निकटवर्ती है अर्थात् इसके परे सर्वेश्वर के अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है । इसके सहित रहने पर परम प्रभु सर्वेश्वर के तथा निज आत्मस्वरूप के अपरोक्ष ज्ञान का होना परम सम्भव है ; और आत्मा को अपना और परम प्रभु सर्वेश्वर का अपरोक्ष ज्ञान हो , इसमें संशय करने का कारण ही नहीं है । 

( ५१ ) स्थूल के फैलाव से सूक्ष्म का फैलाव अधिक होता है । अनादि - अनन्तस्वरूपी से बढ़कर अधिक फैलाव और किसी का होना असम्भव है । इसलिए यह सबसे अधिक सूक्ष्म है । स्थूल यन्त्र से सूक्ष्म तत्त्व का ग्रहण नहीं हो सकता है । बाहर की और भीतर की सब इन्द्रियाँ ( हाथ , पैर , मुँह , लिंग , गुदा ; ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं और आँख , कान , नाक , चमड़ा , जीभ ; ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ बाहर की इन्द्रियाँ हैं । मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार ; ये चार भीतर की इन्द्रियाँ हैं । ) , जिनके द्वारा बाहर वा भीतर में कुछ किया जा सकता है , उस अनादि - अनन्तस्वरूपी परम प्रभु सर्वेश्वर से स्थूल और अत्यन्त स्थूल हैं ; इनसे वे ग्रहण होने योग्य कदापि नहीं । इन्द्रिय - मण्डल तथा जड़ प्रकृति - मण्डल में रहते हुए उनको प्रत्यक्ष रूप से जानना सम्भव नहीं है । अतएव अपने को इनसे आगे पहुँचाकर उनको प्रत्यक्ष पाना होगा । इस कारण परम प्रभु सर्वेश्वर को प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त करने के लिए अपने शरीर के बाहर का कोई साधन करना व्यर्थ है । बाहरी साधन से जड़ात्मक आवरणों वा शरीरों को पार कर कैवल्य दशा को प्राप्त करना अत्यन्त असम्भव है और शरीर के अंतर - ही - अंतर चलने से आवरणों का पार करना पूर्ण सम्भव है । इसके लिए जाग्रत और स्वप्न - अवस्थाओं की स्थितियाँ प्रत्यक्ष प्रमाण हैं । यह कहना कि परम प्रभु सर्वेश्वर सर्वव्यापक हैं , अतः वे सदा प्राप्त ही हैं , उनको प्राप्त करने के लिए बाहर वा अंतर यात्रा करनी अयुक्त है , और यह भी कहना कि परम प्रभु सर्वेश्वर अपनी किरणों से सर्वव्यापक हैं , पर अपने निज स्वरूप से एकदेशीय ही हैं , इसलिए उन तक यात्रा करनी है । ये दोनों ही कथन ऊपर वर्णित कारणों से अयुक्त और व्यर्थ हैं । एक को तो प्रत्यक्ष प्राप्त नहीं है , वह मन - मोदक से भूख बुझाता है और दूसरा यह नहीं ख्याल करता कि एकदेशीय वा परिमित स्वरूपवाले की किरणों का मण्डल भी परिमित ही होगा । वह किसी भी तरह अनादि - अनन्तस्वरूपी नहीं हो सकता । एक अनादि - अनन्तस्वरूपी की स्थिति अवश्य है , यह बुद्धि में अत्यन्त थिर है । अपरिमित पर परिमित शासन करे , यह सम्भव नहीं । परम प्रभु सर्वेश्वर को अनादि - अनन्तस्वरूपी वा अपरिमित ही अवश्य मानना पड़ेगा । उनको अपरोक्षरूप से प्राप्त करने के लिए क्यों अंतर में यात्रा करनी है , इसका वर्णन ऊपर हो चुका है ।

( ५२ ) अंतर में आवरणों से छूटते हुए चलना परम प्रभु सर्वेश्वर से मिलने के लिए चलना है । यह काम परम प्रभु सर्वेश्वर की निज भक्ति है या यह पूर्ण आत्मज्ञान प्राप्त करने का अव्यर्थ साधन है । इस अन्तर के साधन को आन्तरिक सत्संग भी कहते हैं । 

( ५३ ) ऊपर कही गई बातों के साथ भक्ति के विषय की अन्य बातों के श्रवण और मनन की अत्यन्त आवश्यकता है , अतएव इसके लिए बाहर में सत्संग करना परम आवश्यक है । 

( ५४ ) अन्तर साधन की युक्ति और साधन में सहायता सद्गुरु की सेवा करके प्राप्त करनी चाहिये और उनकी बतायी हुई युक्ति से नित्य एवं नियमित रूप से अभ्यास करना परम आवश्यक है ।

( ५५ ) जाग्रत से स्वप्न - अवस्था में जाने में अन्तर - ही - अन्तर स्वाभाविक चाल होती है और इस चाल के समय मन की चिन्ताएँ छूटती हैं तथा विचित्र चैन - सा मालूम होता है । अतएव चिन्ता को त्यागने से अर्थात् मन को एकाग्र करने से वा मन को एकविन्दुता प्राप्त होने से अन्तर - ही - अन्तर चलना तथा विचित्र चैन का मिलना पूर्ण सम्भव है । है कुछ रहनि गहनि की बाता । बैठा रहे चला पुनि जाता ॥ ( कबीर साहब ) बैठे ने रास्ता काटा । चलते ने बाट न पाई ॥ ( राधास्वामी साहब )। इति।।


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प्रभु प्रेमियों ! मोक्ष दर्शन के उपर्युक्त पैराग्राफों से हमलोगों ने जाना कि Nadanusandhana meaning, nadanusandhana, introduction of nadanusandhan, nadanusandhana meditation hindi, types of nad, naadyog in hindi, nadayoga, anahat nad how to listen, nadanusandhan va surat in Upanishads and in Bharati santwani - word - method of yoga, outward and inward  What is all the senses? इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस पोस्ट के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। निम्न वीडियो में उपर्युक्त वचनों का पाठ किया गया है। इसे भी अवश्य देखें, सुनें। जय गुरु महाराज।





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मोक्ष दर्शन (44-54) नादानुसंधान किसे कहते हैं और प्रकृति के अनादि होने का राज क्या है ।। महर्षि मेंहीं मोक्ष दर्शन (44-54)  नादानुसंधान किसे कहते हैं और प्रकृति के अनादि होने का राज क्या है ।। महर्षि मेंहीं Reviewed by सत्संग ध्यान on 11/04/2018 Rating: 5

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