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मोक्ष दर्शन (54-59) आंतरिक साधना में मन की गति और तृप्तिदायक चैन का मिलना ।। सद्गुरु महर्षि मेंहीं

सत्संग योग भाग 4 (मोक्ष दर्शन) / 06

प्रभु प्रेमियों ! भारतीय साहित्य में वेद, उपनिषद, उत्तर गीता, भागवत गीता, रामायण आदि सदग्रंथों का बड़ा महत्व है। इन्हीं सदग्रंथों, प्राचीन और आधुनिक संतो के विचारों को संग्रहित करकेे 'सत्संग योग' नामक पुस्तक की रचना हुई है। इसमें सभी पहुंचे हुए संत-महात्माओं के विचारों में एकता है, इसे प्रमाणित किया है और चौथे भाग में इन विचारों के आधार पर और सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की अपनी साधनात्मक अनुभूतियों से जो अनुभव ज्ञान हुआ है, उसके आधार पर मनुष्यों के सभी दुखों से छूटने के उपायों का वर्णन किया गया है। इसे मोक्ष दर्शन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें ध्यान योग से संबंधित बातों को अभिव्यक्त् करने के लिए पाराग्राफ नंंबर दिया गया हैैैै । इन्हीं पैराग्राफों में से  कुुछ पैराग्राफों  के बारे  में  जानेंगेेेे ।

इसमें गुरु युक्ति और ध्यान अभ्यास, ध्यान अभ्यास से कैसा चैन मिलता है इसका नमूना, ध्यान का फल, आंतरिक साधना में मन की गति कहां तक है, ईश्वर का असली नाम क्या हैै, ध्यानाभ्यास कैसे और किस क्रम मेंं करना है, दृष्टि योग कैसेे करेेंं,  इत्यादि बातों के बारे में बताया गया है। इन बातों को समझने के पहले आइए गुरु महाराज का दर्शन करें।

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आंतरिक साधना पर चर्चा करते गुरुदेव और संतसेवी जी महाराज

आंतरिक साधना में मन की गति और तृप्ति

संतमत के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज dhyaan abhyaas se kaisa chain milata hai isaka namoona, dhyaan ka phal, aantarik saadhana mein man kee gati kahaan tak hai? eeshvar ka asalee naam kya hai? dhyaanaabhyaas kis kram menn karana hai? drshti yog kaisee kareen ? आदि बातों के बारे में बताते हुए 'सत्संग योग' के चौथे भाग में लिखते हैं-


मोक्ष दर्शन (54-59) 

( ५४ ) अन्तर साधन की युक्ति और साधन में सहायता सद्गुरु की सेवा करके प्राप्त करनी चाहिये और उनकी बतायी हुई युक्ति से नित्य एवं नियमित रूप से अभ्यास करना परम आवश्यक है । 

( ५५ ) जाग्रत से स्वप्न अवस्था में जाने में अन्तर - ही - अन्तर स्वाभाविक चाल होती है और इस चाल के समय मन की चिन्ताएँ छूटती हैं तथा विचित्र चैन - सा मालूम होता है । अतएव चिन्ता को त्यागने से अर्थात् मन को एकाग्र करने से वा मन को एकविन्दुता प्राप्त होने से अन्तर - ही - अन्तर चलना तथा विचित्र चैन का मिलना पूर्ण सम्भव है । है कुछ रहनि गहनि की बाता । बैठा रहे चला पुनि जाता ॥ ( कबीर साहब ) बैठे ने रास्ता काटा । चलते ने बाट न पाई ॥ ( राधास्वामी साहब ) 

( ५६ ) किसी चीज का किसी ओर से सिमटाव होने पर उसकी गति उस ओर की विपरीत ओर को स्वाभाविक ही हो जाती है । स्थूल मण्डल से मन का सिमटाव होकर जब मन एकविन्दुता प्राप्त करेगा , तब स्थूल मण्डल के विपरीत सूक्ष्म मण्डल में उसकी गति अवश्य हो जाएगी । 

( ५७ ) दूध में घी की तरह मन में चेतनवृत्ति वा सुरत है । मन के चलने से सुरत भी चलेगी । मन सूक्ष्म जड़ है । वह जड़ात्मक कारण मण्डल से ऊपर नहीं जा सकता । यहाँ तक ही मन के संग सुरत का चलना हो सकता है । इसके आगे मन का संग छोड़कर सुरत की गति हो सकेगी ; क्योंकि जड़ात्मक मूल प्रकृति - मण्डल के  ऊपर में इसका निज मण्डल है , जहाँ से यह आयी है । 

( ५८ ) संख्या ३५ में सर्वेश्वर के ध्वन्यात्मक नाम का वर्णन हुआ है । ध्वन्यात्मक अनाहत आदिशब्द परम प्रभु सर्वेश्वर का निज नाम वा जाति नाम वा उनके स्वरूप का अपरोक्ष ज्ञान करा देनेवाला नाम है और जिन वर्णात्मक शब्दों से इस ध्वन्यात्मक नाम को और परम प्रभु सर्वेश्वर को लोग पुकारते हैं , उन सब वर्णात्मक शब्दों से उपर्युक्त ध्वन्यात्मक नाम का तथा परम प्रभु सर्वेश्वर का गुण - वर्णन होता है । इसलिए उन वर्णात्मक शब्दों को परम प्रभु सर्वेश्वर का सिफाती व गुण - प्रकटकारी वा गुण - प्रकाशक नाम कहते हैं । इन नामों से परम प्रभु सर्वेश्वर की तथा उनके निज नाम की स्थिति और केवल गुण व्यक्त होते हैं ; परन्तु उनका अपरोक्ष ज्ञान नहीं होता है । 

( ५९ ) सृष्टि के जिस मण्डल में जो रहता है , उसके लिए प्रथम उसी मण्डल के तत्त्व का अवलम्ब ग्रहण कर सकना स्वभावानुकूल होता है । स्थूल मण्डल के निवासियों को प्रथम स्थूल का ही अवलम्ब लेना स्वभावानुकूल होने के कारण सरल होगा । अतएव मन के सिमटाव के लिए प्रथम परम प्रभु सर्वेश्वर के किसी वर्णात्मक नाम के मानस जप का तथा परम प्रभु सर्वेश्वर के किसी उत्तम स्थूल विभूति - रूप के मानस - ध्यान का अवलम्ब लेकर मन के सिमटाव का अभ्यास करना चाहिए । परम प्रभु सर्वेश्वर सारे प्रकृति - मण्डल और विश्व - ब्रह्माण्ड में ओत - प्रोत - व्यापक हैं । सृष्टि के सब तेजवान , विभूतिवान और उत्तम धर्मवान उनकी विभूतियाँ हैं । उपर्युक्त अभ्यास से मन को समेट में रखने की कुछ शक्ति प्राप्त करके सूक्ष्मता में प्रवेश करने के लिए सूक्ष्म अवलम्ब को ग्रहण करने का अभ्यास करना चाहिये । सूक्ष्म अवलम्ब विन्दु है । विन्दु को ही परम प्रभु सर्वेश्वर का अणु से भी अणु रूप कहते हैं । परिमाण - शून्य , नहीं विभाजित होनेवाला चिह्न को विन्दु कहते हैं । इसको यथार्थतः बाहर में बाल की नोक से भी चिह्नित करना असम्भव है । इसलिए बाहर में कुछ अंकित करके और उसे देखकर इसका मानस ध्यान करना भी असम्भव है । इसका अभ्यास अंतर में दृष्टियोग करने से होता है । दृष्टियोग में डीम और पुतलियों को उलटाना और किसी प्रकार इनपर जोर लगाना अनावश्यक है । ऐसा करने से आँखों में रोग होते हैं । दृष्टि , देखने की शक्ति को कहते हैं । दोनों आँखों की दृष्टियों को मिलाकर मिलन - स्थल पर मन को टिकाकर देखने से एकविन्दुता प्राप्त होती है । इसको दृष्टियोग कहते हैं । इस अभ्यास से सूक्ष्म वा दिव्य दृष्टि खुल जाती है । मन की एकविन्दुता प्राप्त रहने की अवस्था में स्थूल और सूक्ष्म मण्डलों के सन्धि - विन्दु वा स्थूल मण्डल के केन्द्र - विन्दु से उत्थित नाद वा अनहद ध्वन्यात्मक शब्द , सुरत को ग्रहण होना पूर्ण सम्भव है ; क्योंकि सूक्ष्मता में स्थिति रहने के कारण सूक्ष्म नाद का ग्रहण होना असम्भव नहीं है । शब्द में अपने उद्गम - स्थान पर सुरत को आकर्षण करने का गुण रहने के कारण , इस शब्द के मिल जाने पर शब्द - से - शब्द में सुरत खिंचती हुई चलती - चलती शब्दातीत पद ( परम प्रभु सर्वेश्वर ) तक पहुँच जाएगी । इसके लिए सद्गुरु की सेवा , उनके सत्संग , उनकी कृपा और अतिशय ध्यानाभ्यास की अत्यन्त आवश्यकता है । 

( ६० ) दृष्टियोग बिना ही शब्दयोग करने की विधि यद्यपि उपनिषदों और भारती सन्तवाणी में नहीं है , तथापि सम्भव है कि बिना दृष्टियोग के ही यदि कोई सुरत - शब्द - योग का अत्यन्त अभ्यास करे , तो कभी - न - कभी स्थूल मण्डल का केन्द्रीय शब्द उससे पकड़ा जा सके और तब उस अभ्यासी के आगे का काम यथोचित होने लगे । इसका कारण यह है कि अन्तर के शब्द में ध्यान लगाने से यही ज्ञात होता है कि सुनने में आनेवाले सब शब्द ऊपर की ही ओर से आ रहे हैं , नीचे की ओर से नहीं और वह केन्द्रीय शब्द भी ऊपर की ही ओर से प्रवाहित होता है । शब्द - ध्यान करने से मन की चंचलता अवश्य छूटती है । मन की चंचलता दूर होने पर मन सूक्ष्मता में प्रवेश करता है । सूक्ष्मता में प्रवेश किया हुआ मन उस केन्द्रीय सूक्ष्म नाद को ग्रहण करे , यह आश्चर्य नहीं ; परन्तु उपनिषदों की और भारती सन्तवाणी की विधि को ही विशेष उत्तम जानना चाहिये । शब्द की डगर पर चढ़े हुए की ...। इति।।


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प्रभु प्रेमियों ! मोक्ष दर्शन के उपर्युक्त पैराग्राफों से हमलोगों ने जाना कि What is the comfort of meditation practice, the fruit of meditation, how far is the speed of the mind in internal meditation?  What is the real name of god?  In which order to meditate?  How to do Drishti Yoga? इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस पोस्ट के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। निम्न वीडियो में उपर्युक्त वचनों का पाठ किया गया है। इसे भी अवश्य देखें, सुनें।



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मोक्ष दर्शन (54-59) आंतरिक साधना में मन की गति और तृप्तिदायक चैन का मिलना ।। सद्गुरु महर्षि मेंहीं मोक्ष दर्शन (54-59) आंतरिक साधना में मन की गति और तृप्तिदायक चैन का मिलना ।। सद्गुरु महर्षि मेंहीं Reviewed by सत्संग ध्यान on 6/19/2020 Rating: 5

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