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शब्दकोष-25 दृष्टियोग - ध्यान-बल तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष

संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष / द

     प्रभु प्रेमियों ! ' संतमत+ मोक्ष - दर्शन का शब्दकोश ' नाम्नी प्रस्तुत लेख में ' मोक्ष - दर्शन ' + 'महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ भावार्थ और टिप्पणी सहित' + 'गीता-सार' + 'संतवाणी सटीक' आदि धर्म ग्रंथों में गद्यात्मक एवं पद्यात्मक वचनों में आये शब्दों के अर्थ लिखे गये हैं . कोष्ठकों में शब्दों के व्याकरणिक परिचय भी देने का प्रयास किया गया है और शब्दों से संबंधित कुछ सूक्तियों का संकलन किया गया है. जो पूज्यपाद लालदास जी महाराज द्वारा लिखित व संग्रहित  है । धर्मप्रेमियों के लिए यह कोष बड़ी ही उपादेय है । आईए इस कोष के बनाने वाले महापुरुष का दर्शन करें.

थर्टी - दृष्टि निरोध  तक के शब्दों का अर्थ पढ़ने के लिए   👉  यहां दवाएं

सद्गुरु महर्षि में और बाबा लाल दास जी
लालदास जी और गुरु बाबाबाबा


दृष्टियोग - ध्यान-बल    शब्द  तक के शब्द और उसके अर्थ


दृष्टियोग - ध्यान-बल

 

दृष्टियोग ( सं ० , पुं ० ) = एक यौगिक क्रिया जिसमें दोनों दृष्टि - धाराओं को गुरु के द्वारा बतलाये गये स्थान पर जोड़कर एक ज्योतिर्मय विन्दु को उगाने का अभ्यास किया जाता है , शून्य ध्यान , विन्दु- ध्यान , ज्योति - ध्यान । 

देखनिहारे ( वि ० ) = देखनेवाले । 

देश ( सं ० , पुं ० ) = स्थान , कोई स्थान विशेष , जनसंख्यावाला वह भूभाग जिसका कोई स्वतंत्र शासक हो । 

देशकालातीत ( सं ० , वि ० ) = देश - काल से अतीत , देश ( स्थान ) और काल ( समय ) से विहीन । ( पँ ० ) परमात्मा । 

देही ( सं ० , वि ० ) = देह ( शरीर ) में रहनेवाला । ( पँ ० ) आत्मा , जीवात्मा । 

दो बन्द ( पुं ० ) = आँख और मुँह का बन्द करना । 

द्रव्य ( सं ० , पुं ० ) = पदार्थ । 

द्वेष ( सं ० , पुं ० ) = शत्रुता , बैर , मनमुटाव । 

ध 

घड़ ( पुं ० ) = शरीर में गले और कमर के बीच का भाग ।

धम्मपद ( पुं ० ) = धर्म का पथ , धर्म का मार्ग , भगवान् बुद्ध की एक पुस्तक का नाम जिसमें उनके उपदेश संकलित हैं । 

धरना ( स ० क्रि ० ) = पकड़ना । 

धर्म ( सं ० , पुं ० ) = कर्त्तव्य कर्म , करनेयोग्य काम , स्वभाव , साधु संतों के द्वारा चलाया गया मत या सम्प्रदाय  । 

धार ( स्त्री ० ) = धारा , मौज , कम्प , शब्द । 

धारण करना ( स ० क्रि ० ) = पकड़ना , अपनाना । 

धारणा ( सं ० , स्त्री ० ) = पकड़ , मान्यता , हठ , योग के आठ अंगों में से एक जिसमें ध्येय तत्त्व पर मन का थोड़ा - थोड़ा टिकाव होने लगता है । 

धार - रूप ( वि ० ) = प्रवाह - रूप , जिसमें बहने या एक स्थान से दूसरे स्थान तक चलने अथवा जाने का गुण हो । 

धीरे - धीरे ( क्रि ० वि ० ) = आहिस्ते-आहिस्ते , मंद गति से । 

घुरंधर ( सं ० , वि ० ) = श्रेष्ठ , प्रधान , सबसे बड़ा । 

ध्यान ( सं ० , पुं ० ) = चिन्तन , ख्याल , योग का सातवाँ अंग जिसमें मन या सुरत देर तक ध्येय तत्त्व पर टिकने लग जाती है ।

ध्यान - बल ( सं ० , पुं ० ) ध्यानाभ्यास करने से उत्पन्न होनेवाला आन्तरिक बल  ।


ध्यानाभ्यास - नशा    तक के शब्दों का अर्थ पढ़ने के लिए   👉  यहां दवाएं


     प्रभु प्रेमियों ! संतमत की बातें बड़ी गंभीर हैं । सामान्य लोग इसके विचारों को पूरी तरह समझ नहीं पाते । इन पोस्टों  में संत , संतमत , संतमत की उपयोगिता , जड़ प्रकृति , चेतन प्रकृति , आदिनाद , सृष्टि - क्रम , सृष्टि के मंडल , जीव , ब्रह्म , ईश्वर , परमेश्वर , ईश्वर की भक्ति , परम मुक्ति , संतमत की साधना - पद्धतियों ( मानस जप , मानस ध्यान , दृष्टियोग तथा शब्द - साधना ) , साधना - पद्धतियों के अभ्यास से उत्पन्न अनुभूतियों , सद्गुरु की महत्ता , यम - नियम , साधकों के आहार-विहार, सत्संग,  दृष्टियोग, देखनिहारे, देश, देशकालातीत, देही, दो बंद, द्रव्य, द्वेष, धड़, धम्मपद, धरना, धर्म, धार, धारण करना, धारणा, धार-रूप, धीरे-धीरे, धुरंधर, ध्यान, ध्यान बल, आदि से संबंधित बातों पर चर्चा की गई हैं । 



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शब्दकोष-25 दृष्टियोग - ध्यान-बल तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष शब्दकोष-25   दृष्टियोग - ध्यान-बल   तक के शब्दों के शब्दार्थादि  ||  संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष Reviewed by सत्संग ध्यान on 12/18/2021 Rating: 5

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