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शब्दकोष-24 थर्टी - दृष्टि निरोध तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष

संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष / थ

     प्रभु प्रेमियों ! ' संतमत+ मोक्ष - दर्शन का शब्दकोश ' नाम्नी प्रस्तुत लेख में ' मोक्ष - दर्शन ' + 'महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ भावार्थ और टिप्पणी सहित' + 'गीता-सार' + 'संतवाणी सटीक' आदि धर्म ग्रंथों में गद्यात्मक एवं पद्यात्मक वचनों में आये शब्दों के अर्थ लिखे गये हैं . कोष्ठकों में शब्दों के व्याकरणिक परिचय भी देने का प्रयास किया गया है और शब्दों से संबंधित कुछ सूक्तियों का संकलन किया गया है. जो पूज्यपाद लालदास जी महाराज द्वारा लिखित व संग्रहित  है । धर्मप्रेमियों के लिए यह कोष बड़ी ही उपादेय है । आईए इस कोष के बनाने वाले महापुरुष का दर्शन करें.

तरंग - त्रिकुटी  तक के शब्दों का अर्थ पढ़ने के लिए   👉  यहां दवाएं

सद्गुरु महर्षि में और बाबा लाल दास जी
लालदास जी और गुरु बाबाबाबा


थर्टी - दृष्टि निरोध    शब्द  तक के शब्द और उसके अर्थ



थर्टी ( अँ ० ) = तीस । 

थिर ( वि ० ) = स्थिर , निश्चित , प्रमाणित , सत्य ।


 

दया ( सं ० , स्त्री ० ) = हृदय का एक कोमल भाव जिसके चलते कोई प्राणी दुर्दशाग्रस्त दूसरे प्राणी की सहायता करने के लिए तैयार हो जाता है । 

दया - दान ( सं ० , पुं ० ) = दया या कृपा प्रदान करने की क्रिया ।

दरसाना ( स ० क्रि ० ) = दिखाना । 

दर्जा ( फा ० दर्जः , पुं ० ) = पद , स्थान , श्रेणी , महत्त्व , स्तर , मंडल । 

दर्शन ( सं ० , पुं ० ) = देखना , पवित्र व्यक्ति को आँखों से देखना , विचार धारा , किसी विषय से संबंधित विचार , वह ज्ञान जिसमें ब्रह्म , जीव , माया और परम मुक्ति के उपाय से संबंधित बातों का उल्लेख हो । 

दाझन ( हिं ० , स्त्री ० ) = जलन, उलझन , परेशानी , कष्ट , तकलीफ । 

दाद ( फा ० , स्त्री ० ) - प्रशंसा , न्याय । 

दिल ( अ ० , पुं ० ) - हृदय ।

दिव्य दृष्टि ( सं ० , स्त्री ० ) = अलौकिक दृष्टि जो एकविन्दुता की प्राप्ति होने पर खुलती है , यौगिक दृष्टि , सूक्ष्म दृष्टि ।

दीपक ज्योति ( सं ० , स्त्री ० ) = दीपक का प्रकाश । दुराचरण ( सं ० , पुं ० ) = बुरा . आचरण । 

दुराचारी ( सं ० , वि ० ) = बुरे आचरणवाला । 

दुर्गति ( सं ० , स्त्री ० ) = बुरी दशा , खराब हालत । 

दुर्लभ ( सं ० , वि ० ) = कठिन , कठिनाई से प्राप्त होनेयोग्य । 

दृढ़ आसन ( पुं ० ) = तनकर बैठने की कोई वह मुद्रा जिसमें शरीर बिल्कुल ही हिले - डुले नहीं । 

दृश्य ( सं ० वि ० ) = देखने के योग्य , जो देखा जा सके । ( पुं ० ) कोई रूप । 

दृष्टि ( सं ० , स्त्री ० ) = देखने की शक्ति । 

दृष्टि - निरोध ( सं ० , पुं ० ) = दृष्टि की चंचलता को रोकना ।


दृष्टियोग - ध्यान-बल    तक के शब्दों का अर्थ पढ़ने के लिए   👉  यहां दवाएं


     प्रभु प्रेमियों ! संतमत की बातें बड़ी गंभीर हैं । सामान्य लोग इसके विचारों को पूरी तरह समझ नहीं पाते । इन पोस्टों  में संत , संतमत , संतमत की उपयोगिता , जड़ प्रकृति , चेतन प्रकृति , आदिनाद , सृष्टि - क्रम , सृष्टि के मंडल , जीव , ब्रह्म , ईश्वर , परमेश्वर , ईश्वर की भक्ति , परम मुक्ति , संतमत की साधना - पद्धतियों ( मानस जप , मानस ध्यान , दृष्टियोग तथा शब्द - साधना ) , साधना - पद्धतियों के अभ्यास से उत्पन्न अनुभूतियों , सद्गुरु की महत्ता , यम - नियम , साधकों के आहार-विहार, सत्संग,  थर्टी, थिर, दया, दया-दान, दरसाना, दर्जा, दर्शन, दाझन, दाद, दिल, दिव्य दृष्टि, दीपक-ज्योति, द्वाराचरण, दुराचारी, दुर्गति, दुर्लभ, दृढ़ आसन, दृष्य, दृष्टि, दृष्टि निरोध, आदि से संबंधित बातों पर चर्चा की गई हैं । 



मोक्ष दर्शन का शब्दकोश
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शब्दकोष-24 थर्टी - दृष्टि निरोध तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष शब्दकोष-24  थर्टी - दृष्टि निरोध  तक के शब्दों के शब्दार्थादि  ||  संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष Reviewed by सत्संग ध्यान on 12/13/2021 Rating: 5

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