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मोक्ष दर्शन (66-71) दृष्टियोग की अनुभूति और शब्द अभ्यास ।। सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

सत्संग योग भाग 4 (मोक्ष दर्शन) / 08

प्रभु प्रेमियों ! भारतीय साहित्य में वेद, उपनिषद, उत्तर गीता, भागवत गीता, रामायण आदि सदग्रंथों का बड़ा महत्व है। इन्हीं सदग्रंथों, प्राचीन और आधुनिक संतो के विचारों को संग्रहित करकेे 'सत्संग योग' नामक पुस्तक की रचना हुई है। इसमें सभी पहुंचे हुए संत-महात्माओं के विचारों में एकता है, इसे प्रमाणित किया है और चौथे भाग में इन विचारों के आधार पर और सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की अपनी साधनात्मक अनुभूतियों से जो अनुभव ज्ञान हुआ है, उसके आधार पर मनुष्यों के सभी दुखों से छूटने के उपायों का वर्णन किया गया है। इसे मोक्ष दर्शन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें ध्यान योग से संबंधित बातों को अभिव्यक्त् करने के लिए पाराग्राफ नंंबर दिया गया हैैैै । इन्हीं पैराग्राफों में से  कुुछ पैराग्राफों  के बारे  में  जानेंगेेेे ।

इसमें दृष्टियोग का अभ्यास कितना करना चाहिए, शब्दयोग कब करना चाहिए, दृष्टियोगाभ्यास से कहां तक पहुंचा जाता है, दृष्टि योग और शब्द अभ्यास एक साथ कैसे कर सकते हैं, किस मंडल में कैसा शब्द होता है, सतलोक के शब्द को सतनाम कहते हैं इत्यादि बातों के बारे में बताया गया है। इन बातों को समझने के पहले आइए गुरु महाराज का दर्शन करें।

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दृष्टि योग और सब्द योग पर गंभीर चिंतन करते गुरुदेव महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

दृष्टियोग की अनुभूति और शब्द अभ्यास  
संतमत के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज drshtiyog ka abhyaas kitana karana chaahie, shabdayog kab karana chaahie, drshtiyogaabhyaas se kahaan tak pahuncha jaata hai, drshti yog aur shabd abhyaas ek saath kaise kar sakate hain, kis mandal mein kaisa shabd hota hai, satalok ke shabd ko satanaam kahate hain. आदि बातों के बारे में बताते हुए 'सत्संग योग' के चौथे भाग में लिखते हैं-


मोक्ष दर्शन (66-71) 


( ६७ ) दृष्टि - योग से शब्द - योग आसान है । यह वर्णन हो चुका है कि एकविन्दुता प्राप्त करने तक के लिए दृष्टि - योग अवश्य होना चाहिए ; परन्तु और विशेष दृष्टि - योग कर तब शब्द - अभ्यास करने का ख्याल रखना आवश्यक है ; क्योंकि इसमें विशेष काल तक कठिन मार्ग पर चलते रहना है । 

( ६८ ) एकविन्दुता प्राप्त किये हुए रहकर शब्द में सुरत लगा देना उचित है । दोनों से एक ही ओर को खिंचाव होगा । शब्द में विशेष रस प्राप्त होने के कारण पीछे विन्दु छूट जायगा और केवल शब्द - ही - शब्द में सुरत लग जायगी , तो कोई हानि नहीं , यही तो होना ही चाहिये । 

( ६९ ) केवल दृष्टि - योग से जड़ात्मक प्रकृति के किसी मण्डल के घेरे में पहुँचकर दूसरे किसी शब्द के अभ्यास का सहारा लिए बिना वहाँ ही सारशब्द के पकड़ने का ख्याल युक्ति - युक्त नहीं होने के कारण मानने योग्य नहीं है ; क्योंकि जड़ का कोई भी आवरण सार धार अर्थात् निर्मल चेतन - धार का अपरोक्ष ज्ञान होने देने में अवश्य ही बाधक है । जड़ात्मक मूल प्रकृति के बनने के पूर्व ही आदिशब्द अर्थात् सारशब्द का उदय हुआ है , इसलिए यह शब्द - रूप धार , निर्मल चेतन धार है । 

( ७० ) विविध सुन्दर दृश्यों से सजे हुए मण्डप में मीठे सुरीले स्वर के गानों और बाजाओं को संलग्न होकर सुनते रहने पर भी मण्डप के दृश्यों का गौण रूप में भी देखना होता ही है । उसी प्रकार जड़ात्मक दृश्य - मण्डल के अंदर शब्द - ध्यान में रत होते हुए भी वहाँ के दृश्य अवश्य देखे जाएँगे । इसीलिए कहा गया है कि ' ध्वनेरन्तर्गतं ज्योतिः ' । केवल शब्द - ध्यान भी ज्योति - मण्डल में प्रवेश करा दे , इसमें आश्चर्य नहीं । ज्योति न मिले , तो उतनी हानि नहीं , जितनी हानि कि शब्द के नहीं मिलने से  ।

( ७१ ) सारशब्द अलौकिक शब्द है । परम अलौकिक से ही इसका उदय है । विश्व - ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड आदि की रचना के पूर्व ही इसका उदय हुआ है । इसलिए वर्णात्मक शब्द , जो पिण्ड के बिना हो नहीं सकता अर्थात् मनुष्य - पिण्ड ही जिसके बनने का कारण है वा यों भी कहा जा सकता है कि लौकिक वस्तु ही जिसके बनने का कारण है , उसमें सारशब्द की नकल हो सके , कदापि सम्भव नहीं है । सारशब्द को जिन सब वर्णात्मक शब्दों के द्वारा जनाया जाता है , उन शब्दों को बोलने से जैसी जैसी आवाजें सुनने में आती हैं , सारशब्द उनमें से किसी की भी तरह सुनने में लगे , यह भी कदापि सम्भव नहीं है । राधास्वामीजी के ये दोहे हैं कि 

"अल्लाहू त्रिकुटी लखा , जाय लखा हा सुन्न । शब्द अनाहू पाइया , भंवर गुफा की धुन्न । हक्क हक्क सतनाम धुन , पाई चढ़ सच खण्ड । सन्त फकर बोली युगल , पद दोउ एक अखण्ड ॥"

राधास्वामी - मत में त्रिकुटी का शब्द ' ओं , ' सुन्न का ' ररं ' भँवर गुफा का ‘ सोहं ' और सतलोक अर्थात् सच - खण्ड का ‘ सतनाम ' मानते हैं ; और उपर्युक्त दोहों में राधास्वामीजी बताते हैं कि फकर अर्थात् मुसलमान फकीर त्रिकुटी का शब्द ' अल्लाहू , ' सुन्न का ' हा ' , भँवर गुफा का ' अनाहू ' और सतलोक का ' हक्क ' ' हक्क ' मानते हैं । उपर्युक्त दोहों के अर्थ को समझने पर यह अवश्य जानने में आता है कि सारशब्द की तो बात ही क्या , उसके नीचे के शब्दों की भी ठीक - ठीक नकल मनुष्य की भाषा में हो नहीं सकती । एक सतलोक वा सचखण्ड के शब्द को ' सतनाम ' कहता है और दूसरा उसी को ' हक्क - हक्क ' कहता है , और पहला व्यक्ति दूसरे के कहे को ठीक मानता है , तो उसको यह अवसर नहीं है कि तीसरा जो उसी को ' ओं ' वा राम कहता है , उससे वह कहे कि ' ओं ' और ' राम ' नीचे दर्जे के शब्द हैं , सतलोक के नहीं । अतएव किसी एक वर्णात्मक शब्द को यह कहना कि यही खास शब्द सारशब्द की ठीक - ठीक नकल है , अत्यन्त अयुक्त है और विश्वास करने योग्य नहीं है । इति ।।


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प्रभु प्रेमियों ! मोक्ष दर्शन के उपर्युक्त पैराग्राफों से हमलोगों ने जाना कि How much one should practice visualization, when to do word yoga, where one can reach through visual practice, how one can practice vision yoga and word practice together, what kind of word is in which circle, the word of Satlok is called Satnam. इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस पोस्ट के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। निम्न वीडियो में उपर्युक्त वचनों का पाठ किया गया है। इसे भी अवश्य देखें, सुनें।




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