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शब्दकोष-36 भटकना - मंडल तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष

संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष / भ

     प्रभु प्रेमियों ! ' संतमत+ मोक्ष - दर्शन का शब्दकोश ' नाम्नी प्रस्तुत लेख में ' मोक्ष - दर्शन ' + 'महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ भावार्थ और टिप्पणी सहित' + 'गीता-सार' + 'संतवाणी सटीक' आदि धर्म ग्रंथों में गद्यात्मक एवं पद्यात्मक वचनों में आये शब्दों के अर्थ लिखे गये हैं . कोष्ठकों में शब्दों के व्याकरणिक परिचय भी देने का प्रयास किया गया है और शब्दों से संबंधित कुछ सूक्तियों का संकलन किया गया है. जो पूज्यपाद लालदास जी महाराज द्वारा लिखित व संग्रहित  है । धर्मप्रेमियों के लिए यह कोष बड़ी ही उपादेय है । आईए इस कोष के बनाने वाले महापुरुष का दर्शन करें.

बुद्धि-बल - भटकन  तक के शब्दों का अर्थ पढ़ने के लिए   👉  यहां दवाएं

सद्गुरु महर्षि में और बाबा लाल दास जी
लालदास जी और गुरु बाबाबाबा


भटकना - मंडल   शब्द  तक के शब्द और उसके अर्थ



भटकना - मंडल

 

भटकना ( हिं ० अ ० क्रि ० ) = बिना लाभ के या बिना कारण के जहाँ तहाँ घूमना - फिरना । 

भरपूर ( वि ० ) = भरा हुआ । 

भला ( वि ० ) = अच्छा , लाभदायक । ( पुं ० ) भलाई , कल्याण । 

भव्य ( सं ० , वि ० ) = अच्छा लगने वाला , सुन्दर । 

भाँति ( सं ० , स्त्री ० ) = प्रकार , तरह , रीति , ढंग ।  

भारती भाषा ( सं ० , स्त्री ० ) = हिन्दी भाषा ( सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज हिन्दी भाषा को ' भारती भाषा ' कहना पसंद करते थे । )  

भारती सन्तवाणी ( सं ० , स्त्री ० ) = हिन्दी भाषा में लिखी गयी संतों की वाणी , हिन्दी भाषा के संतों की वाणी । 

भित्ति ( सं ० , स्त्री ० ) नींव , आधार , कारण । 

भिन्न ( सं ० , वि ० ) = अलग , एक - जैसा नहीं हो , अन्तर रखने दीवार , जो वाला । 

भिन्न - भिन्न ( सं ० , वि ० ) = अलग अलग ।  

भीतर की इन्द्रिय ( स्त्री ० ) = मन , बुद्धि , चित्त और अहंकार ।

भीषण ( सं ० , वि ० ) = भयंकर , कठिन , बहुत अधिक । 

भूप ( सं ० , वि ० ) = भूपति , पृथ्वीपति , पृथ्वी का पालन करनेवाला । ( पुं ० ) राजा । 

भूल ( हिं ० , स्त्री ० ) नासमझी , अशुद्धि , त्रुटि , चूक । 

भेद ( सं ० , पुं ० ) = प्रकार , रहस्य , छिपा हुआ हाल , युक्ति , उपाय , तरीका , कोई काम करने का ढंग , भिन्नता , अंतर । 

भोंदू ( हिं ० , वि ० ) = मूर्ख , नासमझ , छोटी बुद्धिवाला । 

भोग ( सं ० , पुं ० ) = भोगने की क्रिया  ।

भोगी ( सं ० , वि ० ) = भोगनेवाला । 

भ्रम ( सं ० , पुं ० ) = शंका , संदेह । 

भ्रू ( सं ० , स्त्री ० ) = भौंह | 


म 

मंजिल ( अ ० , स्त्री ० ) = पड़ाव , लक्ष्य , लक्ष्य स्थान , मकान का खंड , उद्देश्य , गन्तव्य स्थान , वह स्थान जहाँ जाना हो । 

मंडप ( सं ० , पुं ० ) = मँड़वा , चारो ओर से खुला हुआ ऐसा कच्चा या पक्का घर अथवा मकान जहाँ कोई विशेष कार्यक्रम होता हो । 

मंडल ( सं ० , पुं ० ) = क्षेत्र , सीमा , फैलाव , विस्तार , घेरा , गोल आकृति का कोई पदार्थ , संस्था , संघ , समुदाय ।



मजीरा - मानना    तक के शब्दों का अर्थ पढ़ने के लिए   👉  यहां दवाएं


     प्रभु प्रेमियों ! संतमत की बातें बड़ी गंभीर हैं । सामान्य लोग इसके विचारों को पूरी तरह समझ नहीं पाते । इन पोस्टों  में संत , संतमत , संतमत की उपयोगिता , जड़ प्रकृति , चेतन प्रकृति , आदिनाद , सृष्टि - क्रम , सृष्टि के मंडल , जीव , ब्रह्म , ईश्वर , परमेश्वर , ईश्वर की भक्ति , परम मुक्ति , संतमत की साधना - पद्धतियों ( मानस जप , मानस ध्यान , दृष्टियोग तथा शब्द - साधना ) , साधना - पद्धतियों के अभ्यास से उत्पन्न अनुभूतियों , सद्गुरु की महत्ता , यम - नियम , साधकों के आहार-विहार, सत्संग,   भटकना, भरपूर, भला, भव्य, भांति, भारती भाषा, भारतीय संतवाणी, भित्ति, भिन्न, भिन्न-भिन्न, भीतर की इंद्रिय, भीषण, भूप, भूल, भेद, भोंदू, भोग, भोगी, भ्रम, भ्रू, मंजिल, मंडप, मंडल आदि से संबंधित बातों पर चर्चा की गई हैं । 



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शब्दकोष-36 भटकना - मंडल तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष शब्दकोष-36  भटकना - मंडल  तक के शब्दों के शब्दार्थादि  ||  संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष Reviewed by सत्संग ध्यान on 12/13/2021 Rating: 5

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