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मोक्ष दर्शन (77 से 81), गुरु और सद्‌गुरु महिमा -सद्गुरु महर्षि मेंही

 सत्संग योग भाग 4,  मोक्ष दर्शन/12

      प्रभु प्रेमियों ! भारतीय साहित्य में वेद, उपनिषद, उत्तर गीता, भागवत गीता, रामायण आदि सदग्रंथों का बड़ा महत्व है। इन्हीं सदग्रंथों में से मुख्य मुख्य आध्यात्मिक बातों को संग्रहित करके तथा अनेक संत-महात्माओं के मुख्य-मुख्य पद्यों और गद्य वचनों को भी संग्रहीत करके सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज ने "सत्संग योग भाग 4"  नामक पुस्तक की रचना है। इन सबका अध्ययन करने से यह प्रमाणित हो जाता है कि सभी संतो के और उपनिषदों के एक ही मत  है। उपर्युक्त वाक्य में जिनको किसी तरह का कोई शंका है, तो उसका समाधान स्वरूप "मोक्ष दर्शन" या सत्संग योग का चतुर्थ भाग है। इसमें जो मोक्ष से संबंधित उनकी निजी अनुभूति युक्त बातें हैं। उसे पारा संख्या देकर व्यक्त किया गया है। उन्हीं प्रसंगोों में से आज के प्रसंग में जानेंगे- ‌पारा संख्या   77 से 81  के बारे में।

मोक्ष दर्शन (77 से 81), गुरु और सद्‌गुरु महिमा -सद्गुरु महर्षि मेंही/मोक्ष दर्शन पारा77 से 81
मोक्ष दर्शन पारा 77 से 81 



     इसमेें बताया गया है कि सद्गुरु की आवश्कता क्यों है,? बिना सद्गुरु के परम कल्याण नहीं। सद्गुरु की महिमा, सद्गुरु की पहचान, अध्यात्म विद्या की विशेषता तो आइए गुरु महाराज लिखित इन पैराग्राफों को पढें-

( ७७ ) बिना गुरु - भक्ति के सुरत - शब्द - योग द्वारा परम प्रभु सर्वेश्वर की भक्ति में पूर्ण होकर अपना परम कल्याण बना लेना असम्भव है । 
कबीर पूरे गुरु बिना , पूरा शिष्य न होय ।
गुरु लोभी शिष लालची , दूनी दाझन होय ॥ ( कबीर साहब ) |
( ७८ ) जब कभी पूरे और सच्चे सद्गुरु मिलेंगे , तभी उनके सहारे अपना परम कल्याण बनाने का काम समाप्त होगा ।
( ७९ ) पूर और सच्चे सद्गुरु का मिलना परम प्रभु सर्वेश्वर के मिलने के तुल्य ही है ।
 ( ८० ) जीवन - काल में जिनकी सुरत सारे आवरणों को पार कर शब्दातीत पद में समाधि - समय लीन होती है और पिंड में बरतने के समय उन्मुनी रहनी में रहकर सारशब्द में लगी रहती है , ऐसे जीवन - मुक्त परम सन्त पुरुष पूरे और सच्चे सद्गुरु कहे जाते हैं । 
( ८१ ) परम प्रभु सर्वेश्वर को पाने की विद्या के अतिरिक्त जितनी विद्याएँ हैं , उन सबसे उतना लाभ नहीं , जितना की परम प्रभु के मिलने से । परम प्रभु से मिलने की शिक्षा की थोड़ी - सी बात के तुल्य लाभदायक दूसरी - दूसरी शिक्षाओं की अनेकानेक बातें ( लाभदायक ) नहीं हो सकती हैं । इसलिए इस विद्या के सिखलानेवाले गुरु से बढ़कर उपकारी दूसरे कोई गुरु नहीं हो सकते और इसीलिए किसी दूसरे गुरु का दर्जा , इनके दर्जे के तुल्य नहीं हो सकता है । केवल आधिभौतिक विद्या के प्रकाण्ड से भी प्रकाण्ड वा अत्यन्त धुरन्धर विद्वान के अन्तर के आवरण टूट गये हों , यह कोई आवश्यक बात नहीं है और न इनके पास कोई ऐसा यंत्र है , जिससे अन्तर का आवरण टूटे वा कटे ; परन्तु सच्चे और पूरे सद्गुरु में ये बातें आवश्यक हैं । सच्चे और पूरे सद्गुरु का अंतर - पट टूटने की सयुक्ति का किंचित् मात्र भी संकेत संसार की सब विधाओं से विशेष लाभदायक है ।


   मोक्ष दर्शन के पारा संख्या  77 से 81 में हम लोगों ने जाना कि    मनुष्य जीवन में गुरु सद्गुरु की क्या आवश्यकता है और उनकी क्या महिमा है?  इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस अनुभूति युक्त बातें के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले प्रवचन या पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। हमारा अगला पोस्ट अवश्य पढ़ें। जय गुरु महाराज।


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मोक्ष दर्शन (77 से 81), गुरु और सद्‌गुरु महिमा -सद्गुरु महर्षि मेंही मोक्ष दर्शन (77 से 81), गुरु और सद्‌गुरु महिमा -सद्गुरु महर्षि मेंही Reviewed by सत्संग ध्यान on मार्च 19, 2019 Rating: 5

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