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MS01-02, उपनिषदों में बिंदु ध्यान की महिमा ।। यज्ञ-हवन, जप-तप सबसे श्रेष्ठतम फलदायक सुषुम्ना ध्यान

सत्संग योग भाग एक / 02   

प्रभु प्रेमियों ! भारतीय साहित्य में वेद, उपनिषद, उत्तर गीता, श्रीमद्भगवद्गीता, आदि सदग्रंथों का बड़ा महत्व है। इन्हीं सदग्रंथों  में से ध्यान योग से संबंधित कुछ श्लोकों को संग्रहित करके सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज ने 'सत्संग योग' नामक पुस्तक के पहले भाग में रखा है।  जिसका टीका और व्याख्या भी किया गया है । उन्हीं श्लोकों में से कुछ श्लोकों का पाठ  और चिंतन हम लोग यहां करेंगे। 

वैदिक ऋषियों का कहना है कि 'विंदु-ध्यान' की जानकारी होने से जो पुण्य-फल होता है; उसके16वें भाग के एक भाग के बराबर भी नहीं  है- हजारों अश्वमेध और बाजपेय यज्ञ का पुण्य फल सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज हम लोगों को जो ध्यान योग बतलाए हैं । वह सभी ग्रंथों , सभी संतों को मान्य है । इतना ही नहीं, यह 'विंदु-ध्यान' करना और सभी तरह के पूजा-पाठ, जप-तप, होम-हवन इत्यादि से सर्वश्रेष्ठ है। इसका थोड़ा अभ्यास भी महान फलदायक है। इन्हीं बातों के साथ-साथ निम्न बातों पर भी कुछ न कुछ चर्चा इस पोस्ट में मिलेगा। जैसे- ध्यान कैसे करना चाहिए? ध्यान की महिमा, भगवान का ध्यान कैसे करें? हाऊ टू मेडीटेशन? भगवान का ध्यान कैसे करें? ध्यान करने के तरीके, वृत्त पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए या नहीं? जाने ध्यान की विधि, ध्यान की विधि क्या है? ध्यान योग कैसे करना है? ध्यान कैसे लगाएं? ध्यान की शुरुआत कहां से करें, ध्यान करने का सही तरीका, ध्यान करने के करने तरीके हैं? ध्यान साधना कैसे  करें? ध्यान करने के तरीके हिंदी में,ध्यान की परिभाषा,ध्यान का अर्थ,ध्यान के लाभ,ध्यान लगाने की विधि,विंदु-ध्यान' कैसे करना है, ध्यान कैसे लगाएं,  इत्यादि बातें। इन बातों को समझने से पहले आइए गुरु महाराज का  दर्शन करें-
 
सत्संग योग भाग 1 के पहले पोस्ट में सत्संग ध्यान की चर्चा है उसे  पढ़ने के लिए    यहां दबाएं।


गुरु महाराज। Vindu-meditation-of-glory
गुरु महाराज

विंदु-ध्यान की महिमा

विंदु-ध्यान का थोड़ा अभ्यास भी महा फलदायक है।  हजारों अश्वमेध, हजारों बाजपेय यज्ञ से सुषुम्ना-ध्यान (विन्दु ध्यान) का थोड़ा अभ्यास भी श्रेष्ठतम है।   तराज़ू के एक पलड़े पर सुषुम्ना-ध्यान (विन्दु ध्यान) कैसे किया जाता है, इसका केवल चिंतन करने से जो फल होगा, उस फल को रखें और दूसरे पलड़े पर हजारों अश्वमेध, हजारों बाजपेय यज्ञ करने से जो फल प्राप्त होगा उस पल को रखे, तो आप पायेंगे कि सुषुम्ना-ध्यान (विन्दु ध्यान) का चिंतन वाला भाग इतना भारी है। यज्ञ के (हजारों अश्वमेध, हजारों बाजपेय यज्ञ के) सोलह और भाग रखा जाएगा तब भी सुषुम्ना ध्यान का पलड़ा भारी ही रहेगा। अर्थात् जो दीक्षा लेकर थोड़ा भी अभ्यास करते हैं तो वह  हजारों अश्वमेध यज्ञ, हजारों बाजपेय यज्ञ का पुण्य फल से भी ज्यादा अच्छा पुण्य प्राप्त करते हैं। आइए इस संबंध में सत्संग योग में जो लिखा है, उसका पाठ करें-


योगशिखोपनिषद् ( कृष्ण यजुर्वेद का ) 

अध्याय 6

मूल - एकोत्तरं नाडिशतं तासां मध्ये परा स्मृता । सुषुम्ना तु परे लीना विरजा ब्रह्मरूपिणी ॥५ ॥ 
अर्थ - एक सौ एक नाड़ियाँ हैं , उनमें ( सुषुम्ना ) श्रेष्ठ है । सुषुम्ना पर में विद्यमान है , वह रजस् - रहित ( सत्त्व - प्रधान ) है , वह ब्रह्मस्वरूपिणी है।॥५ ॥ 

मूल - इडा तिष्ठति वामेन पिंगला दक्षिणेन तु । तयोर्मध्ये परं स्थानं यस्तद्वेद स वेदवित् ॥६ ॥ 
अर्थ- -इड़ा बाईं ओर रहती है और पिंगला दाहिनी ओर । उन दोनों के बीच में जो स्थान है ( सुषुम्ना ) , उसको जो जानता है , वही वेद जानता है ॥६ ॥ 

मूल - अनाहतस्य शब्दस्य तस्य शब्दस्य यो ध्वनिः । ध्वनेरन्तर्गतं ज्योतिर्योतिषोऽन्तर्गतं मनः ॥२१ ॥ 
अर्थ - अनाहत शब्द होता है , उस शब्द से ध्वनि निकलती है , उस ध्वनि में ज्योति विराजती है , उस ज्योति के भीतर मन को लीन किया जाता है ॥२१ ॥ 

मूल- केचिद्वदन्ति चाधारं सुषुम्ना च सरस्वती ॥ २१ अर्थ - कोई - कोई आधार को सुषुम्ना और सरस्वती कहते हैं ॥२१ ॥ 

मूल - आधारचक्रमहसा विद्युत्पुंजसमप्रभा । तदा मुक्तिर्न संदेहो यदि तुष्टः स्वयं गुरुः ॥ २६ ॥ 
अर्थ - बिजली - पुंज के समान प्रभा ( प्रकाश ) वाले आधारचक्र के ज्ञान - प्रकाश से मुक्ति हो जाती है , इसमें सन्देह नहीं , जबकि गुरु प्रसन्न रहें ॥२६ ॥ 

मूल - वामदक्षे निरुन्धन्ति प्रविशन्ति सुषुम्नया । 
ब्रह्मरन्ध्र प्रविश्यान्तस्ते यान्ति परमां गतिम् ॥३४अर्थ- ( जो ) बाएँ और दाहिने को रोककर सुषुम्ना में प्रवेश करते हैं , वे ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश कर मुक्ति को प्राप्त करते हैं ॥३४ ॥

 मूल - सुषुम्नायां प्रवेशेन चन्द्रसूर्यो लयं गतौ ॥ ३६ ॥
 अर्थ - सुषुम्ना में प्रवेश करने से चन्द्र - सूर्य लय होते हैं ॥३६ ॥ 

मूल- सुषुम्नायां यदा योगी क्षणैकमपि तिष्ठति । सुषुम्नायां यदा योगी क्षणार्धमपि तिष्ठति ॥३८ ॥ सुषुम्नायां यदा योगी सुलग्नो लवणाम्बुवत् । सुषुम्नायां यदा योगी लीयते क्षीरनीरवत् ॥ ३९ ॥ भिद्यते च तदा ग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते परमाकाशे ते यान्ति परमां गतिम् ॥ ४० ॥ 
अर्थ -सुषुम्ना में जब योगी एक क्षण भी ठहरता है , सुषुम्ना में जब योगी आधा क्षण भी ठहरता है , सुषुम्ना में जब योगी पानी और नमक के समान मिल जाता है और सुषुम्ना में जब योगी दूध और पानी के समान मिल जाता है , तब ( उसकी ) ग्रन्थि ( गिरह - गाँठ ) टूट जाती है , ( उसके ) सम्पूर्ण संशयों का नाश हो जाता है और वह परमाकाश में विलाकर परम गति को प्राप्त होता है॥३८-४० ॥ 

मूल - गंगायां सागरे स्नात्वा नत्वा च मणिकर्णिकाम् । मध्यनाडीविचारस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥४१ अर्थ - गंगासागर में स्नान कर मणिकर्णिका को प्रणाम करना ( इसका जो फल होता है , वह ) मध्य नाड़ी ( सुषुम्ना ) के विचार के ( फल के ) सोलहवें अंश के भी बराबर नहीं है ॥४१ ॥ 

मूल - अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च । सुषुम्ना ध्यानयोगस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ४३ ॥ 
अर्थ - हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ सुषुम्ना ध्यान - योग का सोलहवाँ भाग भी नहीं है ॥४३ ॥ 

मूल - सुषुम्नायां सदा गोष्ठी यः कश्चित्कुरुते नरः । स मुक्तेः सर्वपापेभ्यो निःश्रेयसमवाप्नुयात् ॥ ४४ ॥ 
अर्थ - जो नर सुषुम्ना में सदा सभा करता है , वह सब पापों से मुक्त होकर सच्चा कल्याण पाता है ॥ ४४ ॥ 

मूल - सुषुम्नैव परं तीर्थं सुषुम्नैव परो जपः । सुषुम्नैव परं ध्यानं सुषुम्नैव परा गतिः ॥ ४५ ॥ 
अर्थ - सुषुम्ना ही प्रधान तीर्थ है , सुषुम्ना ही प्रधान जप है , सुषुम्ना ही प्रधान ध्यान है और सुषुम्ना ही परा ( ऊँची ) गति है ॥४५ ॥ 

मूल - अनेक यज्ञदानानि व्रतानि नियमास्तथा । सुषुम्नाध्यानलेशस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ४६ ॥ अर्थ - अनेक यज्ञ , दान , व्रत और नियम ; स्वल्पमात्र सुषुम्ना - ध्यान के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं है ॥४६ ॥ 

मूल - मायाशक्तिर्ललाटाग्रभागे व्योमाम्बुजे तथा । नादरूपा परा शक्तिर्ललाटस्य तु मध्यमे ॥४८ ॥ 
अर्थ - आकाश - रूपी कमल में और ललाट के अग्रभाग ( ऊपर भाग ) में माया - शक्ति विराजमान है । ललाट के मध्य भाग में नादरूपा पराशक्ति विराजमान है ॥४८ ॥ 

मूल - भागे विन्दुमयी शक्तिर्ललाटस्यापरांशके । विन्दुमध्ये च जीवात्मा सूक्ष्मरूपेण वर्तते ॥ ४९ ॥ 
अर्थ - ललाट के दूसरे भाग ( नीचे भाग ) में विन्दुमयी शक्ति विराजमान है और विन्दु के बीच में जीवात्मा सूक्ष्म रूप से विराजमान है ॥ ४९ ॥ 

मूल - सदा नादानुसन्धानात्संक्षीणा वासना भवेत् । निरंजने विलीयेत मरुन्मनसि पद्मज ।। ७१ ॥ 
अर्थ - नादानुसन्धान ( सुरत - शब्दयोग - अभ्यास ) सदा करने से वासना का नाश होता है । हे ब्रह्मा ! तब वायु ( प्राणवायु ) निरंजन मन में लीन हो जाता है ॥७१ ॥ 

मूल - कर्णधारं गुरुं प्राप्य तद्वाक्यं प्लववदृढम् । अभ्यासवासनाशक्त्या तरन्ति भवसागरम् ॥ ७९ ॥ अर्थ - गुरु को कर्णधार ( मल्लाह ) पाकर और उनके वाक्य को दृढ़ नौका पाकर अभ्यास ( करने की ) वासना की शक्ति से भवसागर को लोग पार करते हैं ॥ ७९ ॥



 श्रीजाबालदर्शनोपनिषद् ( सामवेद का )

 खण्ड १ 

मूल - ज्ञानशौचं परित्यज्य बाह्ये यो रमते नरः । स मूढः कांचनं त्यक्त्वा लोष्टं गृह्णाति सुव्रत ॥ २२ ॥ 
अर्थ - ज्ञान - शौच को छोड़कर जो बाहरी शौच में लगा रहता है , वह मूढ़ सोने को छोड़कर मिट्टी का ढेला लेता है ॥ २२ ॥ 

खण्ड २ 

मूल - तपः संतोषमास्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम् । सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीर्मतिश्च जपो व्रतम् ॥ १ ॥ 
अर्थ - तप , संतोष , आस्तिक्य , दान , ईश्वर - पूजन , सिद्धान्त श्रवण , लज्जा , विचार और जप ; ये ही व्रत हैं ॥१ ॥ 

खण्ड ४ 

मूल - चित्तमन्तर्गतं दुष्टं तीर्थस्नानैर्न शुद्ध्यति । शतशोऽपि जलैौत सुराभाण्डमिवाशुचि ॥ ५४ ॥ 
अर्थ - भीतर में रहनेवाला दूषित चित्त तीर्थस्नान से शुद्ध नहीं होता , जिस प्रकार सैकड़ों बार जल से धोने पर भी मदिरा का पात्र शुद्ध नहीं हो सकता ॥५४ ॥ 

मूल - तीर्थे दाने जपे यज्ञे काष्ठे पाषाणके सदा । शिवं पश्यति मूढात्मा शिवे देहे प्रतिष्ठिते ॥ ५७ ॥ 
अर्थ - वह शिव तो शरीर में विद्यमान है , पर मूर्ख लोग तीर्थ में , दान में , जप में , यज्ञ में , काष्ठ में और पाषाण में शिव देखते हैं।॥ ५७ ॥ 

खण्ड ५ 

मूल- पर्वताग्रे नदीतीरे बिल्वमूले वनेऽथवा । मनोरमे शुचौ देशे मठं कृत्वा समाहितः ॥ ४ ॥ आरभ्य चासनं पश्चात्प्राङ्गमुखोदङमुखोऽपि वा । समग्रीवशिरः कायः संवृतास्यः सुनिश्चलः ॥५ ॥ नासाग्रे शशभृद्विम्बे विन्दुमध्ये तुरीयकम् । स्रवन्तममृतं पश्येन्नेत्राभ्यां सुसमाहितः ॥६ ॥
अर्थ - पर्वत के आगे , नदी के किनारे , बिल्व ( बेल , श्रीफल ) वृक्ष की जड़ में अथवा वन में- में - सुन्दर और पवित्र स्थान में मठ बनाकर स्थिर हो जावे । आसन आरम्भ करके पूर्व या उत्तर मुख होकर पीछे गला , सिर और शरीर को सीधा करके , मुख बन्द करके अच्छी तरह निश्चल होवे । नाक के आगे चन्द्र - बिम्ब - विन्दु के मध्य में , उस तुरीय और चूते हुए अमृत को अच्छी तरह समाधिस्थ होकर आँखों से देखे॥४-६ ॥ 

मूल - नादाभिव्यक्तिरित्येतच्चिह्न तत्सिद्धिसूचकम् ॥११ ॥ 
अर्थ - नाद की अभिव्यक्ति अर्थात् प्रकट होना , उसकी ( ब्रह्म प्राप्ति की ) सिद्धि का सूचक चिह्न है ॥११ ॥ इति ।।

सत्संग योग भाग 1 से ध्यानाभ्यास से संबंधित है और श्लोक पढ़ने के लिए   यहां दवाएं

प्रभु प्रेमियों ! गुरु महाराज के भारती पुस्तक "सत्संग योग" के इस लेख का पाठ करके आपलोगों ने जाना कि  विंदु-ध्यान का थोड़ा अभ्यास के फल का 16 वें भाग के बराबर भी नहीं  है- हजारों अश्वमेध और बाजपेय यज्ञ । इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। योग शिखोपनिषद अध्याय 6 के कुछ मंत्रों का पाठ हमलोग ने निम्न वीडियो में देखें । 



सत्संग योग चारों भाग, सद्गुरु महर्षि मेंही कृत
सत्संग योग चारों भाग
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MS01-02, उपनिषदों में बिंदु ध्यान की महिमा ।। यज्ञ-हवन, जप-तप सबसे श्रेष्ठतम फलदायक सुषुम्ना ध्यान MS01-02, उपनिषदों में बिंदु ध्यान की महिमा ।। यज्ञ-हवन, जप-तप सबसे श्रेष्ठतम फलदायक सुषुम्ना ध्यान Reviewed by सत्संग ध्यान on 6/19/2020 Rating: 5

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