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MS01-03 ध्यान क्या है ।। विस्तार सहित शीघ्र सिद्धि देने वाले उपनिषद मंत्रों पर बिशेष चर्चाएं

सत्संग योग भाग एक / 03  

प्रभु प्रेमियों ! भारतीय साहित्य में वेद, उपनिषद, उत्तर गीता, श्रीमद्भगवद्गीता, आदि सदग्रंथों का बड़ा महत्व है। इन्हीं सदग्रंथों  में से ध्यान योग से संबंधित कुछ श्लोकों को संग्रहित करके सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज ने 'सत्संग योग' नामक पुस्तक के पहले भाग में रखा है। ऐसा करके गुरु महाराज सभी संतो, वेद-उपनिषदों, गीता-रामायण आदि के बातों में सामान्यता  सिद्ध किए हैं।  उन्हीं श्लोकों में से कुछ श्लोकों का पाठ  और चिंतन हम लोग यहां करेंगे। 

इन श्लोकों में ध्यान योग से संबंधित विशेष चर्चा किया गया है, जैसे कि- यह ध्यान योग क्या है? इसके बारे में उपनिषद मंत्रों में क्या कहा गया हैै? इसकी क्या महिमा हैै? इसे कैसे करना चाहिए? ध्यान क्या है, ध्यान कैसे करें, ध्यान कितने प्रकार का होता है, ध्यान के जोखिम, ध्यान के फायदे, ध्यान की महिमा, विविध प्रकार के ध्यानों में सर्वश्रेष्ठ ध्यान, गीता के अनुसार ध्यान, रामायण के अनुसार ध्यान, वेद के अनुसार ध्यान, उपनिषद के अनुसार ध्यान, अन्य धर्म ग्रंथों के अनुसार ध्यान, इत्यादि बातों के बारे में विस्तार से जानेंगे। इन बातों को समझने केे पहले गुरु महाराज का दर्शन करें -

ध्यानयोग के संबंध में सत्संग योग भाग १ के दूसरे पोस्ट में भी काफी चर्चा हुआ है; उसे पढ़ने के लिए    यहां दबाएं।

नीचे ध्यान मुद्रा में चित्र दिए गए हैं।

ध्यान मुद्रा में गुरुदेव
ध्यान मुद्रा में गुरुदेव

ध्यान क्या है एक परिचय

प्रभु प्रेमियों ! आप लोग रेलवे प्लेटफार्म पर अवश्य ही सुने होंगे ध्यान दें। मास्टर को कहते हुए भी सुने होंगे ध्यान से सुनो । इस प्रकार यह ध्यान शब्द सामान्य बोलचाल की भाषा है जिसका सीधा-सा अर्थ है अपनी वृत्ति को एकाग्र करना । उपनिषद वाक्य भी है चित्तवृत्ति के निरोध को योग कहते हैं योग हम लोग ध्यान अभ्यास को ही कहते हैं। आइए ध्यान योग के बारे में सत्संग योग के प्रथम भाग में क्या लिखा है उसे पढ़ते हैं-


ध्यानविन्दूपनिषद् ( सामवेद का ) 

मूल - यदि शैलसमं पापं विस्तीर्णं बहुयोजनम् । भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन ॥ १ ॥ 
अर्थ - कई योजन तक फैला हुआ पहाड़ के समान यदि पाप हो तो वह ध्यानयोग से नष्ट हो जाता है । इसके समान पापों का नष्ट करनेवाला कभी कुछ नहीं हुआ है ॥ १ ॥ 

मूल - बीजाक्षरं परं विन्दुं नादं तस्योपरि स्थितम् । सशब्दं चाक्षरे क्षीणे निःशब्दं परमं पदम् ॥ २ ॥ 
अर्थ - परम विन्दु ही बीजाक्षर है ; उसके ऊपर नाद है । नाद जब अक्षर ( अनाश ब्रह्म ) में लय हो जाता है , तो निःशब्द परम पद है ॥ २ ॥ 

मूल - अनाहतं तु यच्छब्दं तस्य शब्दस्य यत्परम् । तत्परं विन्दते यस्तु स योगी छिन्नसंशयः ॥ ३ ॥ 
अर्थ - अनाहत के बाद जो निःशब्द परम पद है , योगी उसे सबसे बढ़कर समझते हैं , जहाँ सब संशय दूर हो जाते हैं ॥३ ॥ 

मूल - बालाग्रशतसाहस्रं तस्य भागस्य भागिनः । तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरंजनम् ॥ ४ ॥ 
अर्थ - यदि केश की नोक को सौ हजार भाग करें , तो उसका फिर भाग करने पर जो आधा भाग होगा , वह नाद का स्वरूप होगा और जब यह नाद भी लय हो जाता है , तब योगी निरंजन ब्रह्म को प्राप्त करता है ॥ ४ ॥ 

मूल - अकारः पीतवर्णः स्याद्रजोगुण उदीरितः ॥१२ ॥ उकारः सात्त्विकः शुक्लो मकारः कृष्ण तामसः ॥१२ / ॥ अर्थ - अ = रजोगुण = पीतवर्ण ; उ = सत्त्वगुण = शुक्लवर्ण ; म = तमोगुण = कृष्णवर्ण । 

मूल- तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टा निनादवत् । विन्दुनादकलातीतं यस्तं वेद स वेदवित् ॥ ३७ ॥ 
अर्थ - अटूट तेल - धारा तथा घण्टे के दीर्घ नादवत् , विन्दु , नाद तथा कला के परे जो जानता है , वह वेदज्ञ है ॥ ३७ ॥

मूल - स्वात्मानं पुरुषं पश्येन्मनस्तत्र लयं गतम् । रत्नानि ज्योत्स्निनादं तु विन्दुमाहेश्वरं पदम् । य एवं वेद पुरुषः स कैवल्यं समश्नुत इत्युपनिषत् ॥ १०५ ॥ 
अर्थ - मनुष्यों को अपनी आत्मा की ओर देखना चाहिए , जहाँ जाकर मन लय हो जाता है । जो रलों को , चन्द्र - ज्योति को , नाद को , विन्दु को और महेश्वर के परमपद को जानता है , वह कैवल्य पद पाता है । यही उपनिषद् है ॥ १०५ ॥


सिंहासन पर विराजित ध्यान मुद्रा में
सिंहासन पर विराजित ध्यान मुद्रा में


 शाण्डिल्योपनिषद् ( अथर्ववेद का ) 

अध्याय १ 

मूल - विद्वान्समग्रीवशिरो नासाग्रदृग्भ्रूमध्ये शशभृद्विम्ब पश्यन्नेत्राभ्याममृतं पिबेत् ॥ १६ ॥ 
अर्थ - विद्वान गला और सिर को सीधा करके नासिका के आगे दृष्टि रखते हुए , भ्रुवों के बीच में चन्द्रमा के बिम्ब को देखते हुए नेत्रों से अमृत का पान करें ॥ १६ ॥ 

मूल - यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्वश्यः शनैः शनैः । तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम् ॥२३ ॥ 
अर्थ - जैसे सिंह , हाथी और बाघ धीरे - धीरे काबू में आते हैं , इसी तरह प्राणायाम ( अर्थात् वायु का अभ्यास कर वश में करना ) भी किया जाता है , प्रकारान्तर होने से वह अभ्यासी को मार  डालता है ॥ २३ ॥ 

मूल - द्वादशांगुल पर्यन्ते नासाग्रे विमलेऽम्बरे । संविद्वृशि प्रशाम्यन्त्यां प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३२ ॥ 
अर्थ - जब ज्ञानदृष्टि ( सुरत , चेतन - वृत्ति ) नासाग्र से बारह अंगुल पर स्वच्छ आकाश में स्थिर हो , तो प्राण का स्पन्दन रुद्ध हो जाता है। 

मूल - भ्रूमध्ये तारकालोकशान्तावन्तमुपागते । चेतनैकतने बद्धे प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३३ ॥ 
अर्थ - जब चेतन अथवा सुरत भौंओं के बीच के तारक - लोक ( तारा - मंडल ) में पहुँचकर स्थिर होती है , तो प्राण की गति बन्द हो जाती है ॥ ३३ ॥ 

मूल - चिरकालं हृदेकान्तव्योमसंवेदनान्मुने । अवासनमनोध्यानात्प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३५ ॥ 
अर्थ - हृदयाकाश में संकल्प - विकल्प और वासनाहीन मन से बहुत दिनों तक ध्यान करने से प्राण की गति रुक जाती है ॥३५ ॥ 

मूल - तारसंयमात्सकलविषयज्ञानं भवति । 
अर्थ - तारा ( प्रणव - विन्दु ) में संयम करने से सब विषयों का ज्ञान होता है । ( संयम की पूर्णता समाधि में है । ) 

मूल - कायाकाशसंयमादाकाशगमनम् । 
अर्थ - शरीर के आकाश में संयम करने पर आकाश में गमन होता है । 

एकांत मैदान में ध्यानस्थ गुरुदेव
एकांत मैदान में ध्यानस्थ गुरुदेव


अध्याय २ 

मूल - अथ ह शाण्डिल्यो ह वै ब्रह्मऋषिश्चतुर्युवेदेषु ब्रह्मविद्यामलभमानः किं नामेत्यथर्वाणं भगवन्तमुपसन्नः पप्रच्छाधीहि भगवन् ब्रह्मविद्यां येन श्रेयोऽवाप्स्यामीति । स होवाचाऽथर्वा शाण्डिल्य सत्यं विज्ञानमनन्तं ब्रह्म यस्मिन्निदमोतं च प्रोतं च । यस्मिन्निदं सं च विचैति सर्वं यस्मिन्विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति । तदपाणिपादमचक्षुः श्रोत्रमजिह्वमशरीरमग्राह्यमनिर्देश्यम् । यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । ३८
अर्थ - चारो वेदों में - से ब्रह्म - विद्या नहीं प्राप्त कर ब्रह्म - ऋषि शाण्डिल्य ने भगवान अथर्वण ऋषि के पास जाकर कहा- ' हे भगवन् ! ब्रह्मविद्या का मुझे उपदेश कीजिए , जिससे मेरा कल्याण हो । ' अथर्वण ऋषि ने कहा - ' हे शाण्डिल्य ! ब्रह्म सत्य , विज्ञान और अनन्त है , जिसमें यह संसार ओतप्रोत है । ( ओत - बुना हुआ । प्रोत गुंथा हुआ ) जिसमें यह सारा ब्रह्माण्ड ( विश्व ) स्थिर है और जिसको जान लेने से इस संसार का भी सार जाना जाता है । वह ब्रह्म बिना हाथ , पैर , नेत्र , कान , जिह्वा तथा शरीर का है । जो ग्रहण करने योग्य तथा वर्णन करने ( वा देखने ) योग्य नहीं है , और मन जहाँ से लौट आते हैं ; क्योंकि इनको ( अर्थात् मन - वाणी को ) वह अप्राप्य ( नहीं प्राप्त होने योग्य ) है । '


युवावस्था में ध्यानस्थ गुरुदेव
युवावस्था में ध्यानस्थ गुरुदेव


वराहोपनिषद् ( कृष्ण यजुर्वेद का ) 

अध्याय २ 

मूल - दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् । दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥७६ ॥ 
अर्थ - बिना सद्गुरु की कृपा के विषय - त्याग दुर्लभ है , ( ब्रह्मतत्त्व ) -दर्शन दुर्लभ है और सहज समाधि की अवस्था भी दुर्लभ है ॥७६ ॥ 

मूल - इन्द्रियाणां मनो नाथो मनोनाथस्तु मारुतः । मारुतस्य लयो नाथस्तन्नाथं लयमाश्रय ॥८० ॥ पुंखानुपुंखविषयेक्षण तत्परोऽपि ब्रह्मावलोकनधियं न जहाति योगी । संगीतताललयवाद्यवशं गतापि मौलिस्थकुम्भपरिरक्षणधीनटीव ॥ ८२ ॥ सर्वचिन्तां परित्यज्य सावधानेन चेतसा । नाद एवानुसंधेयो योगसाम्राज्यमिच्छता ॥८३ ॥ 
अर्थ - इन्द्रियों का नाथ मन है , मन का वायु है और वायु का नाथ लय है ; इसलिए लय का अवलम्बन करना चाहिए ( अर्थात् लययोग का अभ्यास करना चाहिए ) ॥८० ॥ जो योगी सूक्ष्मातिसूक्ष्म पदार्थों को देखने में समर्थ है , उसकी बुद्धि ब्रह्म के देखने से कभी विचलित नहीं होती है , वैसे ही , जैसे कि कोई नटी सिर पर घड़ा रखकर हर तरह से नाचती , गाती और बजाती है ; पर घड़ा उसके सिर से नहीं गिरता ॥८२ ॥ योग - साम्राज्य की इच्छा करनेवाले मनुष्यों को सब चिन्ता त्यागकर सावधान होकर नाद की ही खोज करनी चाहिए ॥ ८३ ॥


 अध्याय ४ 

 

मूल - शुकश्च वामदेवश्च द्वे सृती देवनिर्मिते । शुको विहंगमः प्रोक्तो वामदेवः पिपीलिका ॥ ३६ ॥ 
अर्थ - देवताओं ने शुक और वामदेव नामक दो मार्गों को बनाया है । शुक - मार्ग विहंगम - मार्ग के नाम से विख्यात है और वामदेव - मार्ग पिपीलिका - मार्ग के नाम से ॥ ३६ ॥

लययोग = विहंगम - मार्ग = शुक ( मुनि ) का मार्ग । हठयोग = पिपीलिका - मार्ग = वामदेव ( मुनि ) का मार्ग ।


 अध्याय ५ 

मूल- ... पंचभूतात्मको देहः पंचमण्डलपूरितः ...॥ १ अर्थ - यह शरीर पंचभूतों से बना हुआ है और इसमें पाँच मंडल हैं ॥१ ॥ 


सहजता से गुरुदेव
सहजता से गुरुदेव


मण्डलब्राह्मणोपनिषद् ( शुक्ल यजुर्वेद का )

 ब्राह्मणं १ 

मूल- ... निद्राभयसरीसृपं हिंसादितरंग तृष्णावर्त दारपंक संसारवार्धितर्तुं सूक्ष्ममार्गमवलम्ब्य सत्त्वादिगुणा नतिक्रम्य तारकमवलोकयेत् । भ्रूमध्ये सच्चिदानन्दतेजः कूटरूपं तारकं ब्रह्म ... ....॥ २ ॥ 
अर्थ - निद्रा , भय आदि जहाँ जीव - जन्तु हैं , हिंसा आदि तरंगवाले , तृष्णा - रूपी भँवरवाले , स्त्री - रूपी पंकवाले , संसार - रूपी समुद्र को तरने के लिए सूक्ष्ममार्ग का अवलम्बन करके , सत्त्वादि गुणों को पार करके , दोनों भौंओं के बीच में सत् - चित् - आनन्द - तेजपुंज तारक - ब्रह्म का अवलोकन करें ॥२ ॥ 

ब्राह्मणं २ 

मूल - .. तन्मध्येजगल्लीनम् । तन्नादविन्दुकलातीतमखण्ड  मण्डलम् । तत्सगुणनिर्गुणस्वरूपम् । तद्वेत्ता विमुक्तः । आदावग्नि मण्डलम् । तदुपरि सूर्यमण्डलम् । तन्मध्ये सुधाचन्द्रमण्डलम् । तन्मध्ये - ऽखण्डब्रह्मतेजोमण्डलम् । तद्विद्युल्लेखावच्छुक्लभास्वरम् । तदेव शाम्भवीलक्षणम् । तद्दर्शने तिस्रो मूर्तयः अमा प्रतिपत्पूर्णिमा चेति । निमीलितदर्शनममादृष्टिः । अर्धोन्मीलितं प्रतिपत् । सर्वोन्मीलनं पूर्णिमा भवति । ... तल्लक्ष्यं नासाग्रम् ...। तदभ्यासान्मनः स्थैर्यम् । ततोवायु स्थैर्यम् । तच्चिह्नानि आदौ तारकवदृश्यते । ततो वज्रदर्पणम् । तत उपरिपूर्णचन्द्रमण्डलम् । ततो नवरत्नप्रभा मण्डलम् । ततो मध्याह्नार्कमण्डलम् । ततो वह्निशिखामण्डलं क्रमादृश्यते ॥१ ॥ तदा पश्चिमाभिमुखप्रकाशः स्फटिकधू प्रविन्दुनादकलानक्षत्रखद्योत - दीपनेत्रसुवर्णनवरत्नादि प्रभा दृश्यन्ते । तदेव प्रणवस्वरूपम् ॥२ ॥ 
अर्थ - उस ( ब्रह्म ) के अन्दर संसार लीन ( डूबा हुआ ) है । वह ( ब्रह्म ) नाद , विन्दु और कला के परे , सगुण , निर्गुण तथा अखण्डमण्डल - स्वरूप है ; इसका जाननेवाला विमुक्त होता है । पहले अग्निमण्डल है , इसके ऊपर सूर्यमण्डल है , उसके बीच में सुधामय चन्द्रमण्डल है और उसके मध्य में अखण्ड ब्रह्मतेजमण्डल है , वह शुक्ल बिजली की धार के समान चमकीला है । केवल यही शाम्भवी का लक्षण है । उसे देखने के लिए तीन दृष्टियाँ होती हैं ; अमावस्या , प्रतिपदा और पूर्णिमा । आँख बन्द कर देखना अमादृष्टि है , आधी आँख खोलकर देखना प्रतिपदा और पूरी आँख खोलकर देखना पूर्णिमा है । उसका लक्ष्य नासाग्र होना चाहिए । उसके अभ्यास से मन की स्थिरता आती है । इससे वायु स्थिर होता उसके ये चिह्न हैं - आरम्भ में तारा - सा दीखता है । तब हीरा के ऐना की तरह दीखता है । उसके बाद पूर्ण चन्द्रमण्डल दिखलाई देता है । उसके बाद नौ रत्नों का प्रभामण्डल दिखाई देता है । उसके बाद दोपहर का सूर्यमण्डल दिखाई देता है । उसके बाद अग्निशिखामण्डल दिखाई देता है । ये सब क्रम से दिखाई देते हैं ॥१ ॥ तब पश्चिम की ओर प्रकाश दिखाई देता है । स्फटिक , धूम्र  ( धुआँ ) , विन्दु , नाद , कला , तारा , जुगनू , दीपक , नेत्र , सोना और नवरत्न आदि की प्रभा दिखाई देती है । केवल यही प्रणव का स्वरूप है ...॥ २ ॥ 

मूल - पंचावस्थाः जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयतुरीयातीता : ....॥ ४
अर्थ - जाग्रत् , स्वप्न , सुषुप्ति , तुरीय और तुरीयातीत ; ये पाँच अवस्थाएँ हैं ॥४ ॥ 

मूल - सर्व परिपूर्ण तुरीयातीत ब्रह्मभूतो योगी भवति ॥५ ॥ 
अर्थ - पूर्ण योगी तुरीयातीत अवस्था को प्राप्त कर ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ॥५ ॥ 

ब्राह्मणं ४ 

... आकाशं पराकाशं महाकाशं सूर्याकाशं परमाकाशमिति पंच भवन्ति । बाह्याभ्यन्तरमन्धकारमयमाकाशम् । सबाह्यस्याभ्यन्तरे कालानलसदृशं पराकाशम् । सबाह्याभ्यन्तरेऽपरिमितद्युतिनिभं तत्त्वं महाकाशम् । सबाह्याभ्यन्तरे सूर्यनिभं सूर्याकाशम् । अनिर्वचनीयज्योति : सर्वव्यापकं निरतिशयानन्दलक्षणं परमाकाशम् ॥ १ ॥ 
अर्थ - पाँच आकाश हैं - आकाश , पराकाश , महाकाश , सूर्याकाश और परमाकाश । बाहर और अन्दर जो अन्धकारमय हो , वह आकाश है । बाहर और अन्दर जो कालाग्नि के समान हो , उसे पराकाश कहते हैं । बाहर और अन्दर अपरिमित तेज के समान तत्त्व को महाकाश कहते हैं । अन्दर और बाहर सूर्य के समान चमक जिसमें है , उसे सूर्याकाश कहते हैं । अकथनीय सर्वव्यापक सर्वोत्तम आनन्दज्योति को परमाकाश कहते हैं ॥१ ॥ 

ब्राह्मणं ५ 

अनाहतस्य शब्दस्य तस्य शब्दस्य यो ध्वनिः । ध्वनेरन्तर्गतं ज्योतिर्योतिरन्तर्गतं मनः ॥ 
अर्थ - अनाहत शब्द का जो शब्द है , उसकी जो ध्वनि है , उस ध्वनि के अन्दर ज्योति ( चेतन ) है और ज्योति के अन्दर मन ( लय को प्राप्त होता ) है । इति।।


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