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51. एक चोर पकड़ा है || अहिंसा और कर्म का विधान : जीवन की सार्थकता का मार्ग The principle of non-violence and karma

अहिंसा और कर्म का विधान : 

     प्रभु प्रेमियों। !  यह एक बहुत ही गहरा और आध्यात्मिक लेख है।  पूज्यपाद गुरूसेवी स्वामी भागीरथ बाबा जी महाराज द्वारा साझा किए गए प्रसंग और संत वाणी के आधार पर मैंने यह लेख तैयार किया है, जो पाठकों को अहिंसा और कर्म की महत्ता समझाने में सहायक होगा। 

इस संस्मरण से पहले वाले संस्मरण नंबर  50. को पढ़ने के लिए  👉 यहाँ दवाएँ ।

51. एक चोर पकड़ा है, गुरु सेवी भगीरथ बाबा के संस्मरण,
51. एक चोर पकड़ा है

५१.  एक चोर पकड़ा है।

     भगवान् महावीर ने अपने उपेदश देने के सिलसिले में कहा था- "अहिंसा परमो धर्मः।" अहिंसा सभी धर्मों में श्रेष्ठ है। मन, वचन और कर्म से जो अहिंसक होते हैं, उनके सामने हिंसक प्राणी भी अपना स्वभाव बदल देते हैं। सभी महापुरुषों ने हिंसा करने की मनाही की है।

     पूज्य गुरुदेव एक दिन प्रातःकाल अपने एक सेवक से बोले- "आज रात में मैंने एक चोर पकड़ा है।" यह कहकर अपनी गमछी की एक छोर से बँधे एक खटमल निकालकर दिये और बोले- "इसको बाहर फेंक दो, मारना मत।" यह कहकर गुरुदेव ने हिंसा करने की मनाही की। महापुरुषों का कहना है कि हिंसा दो प्रकार की होती है- १. वार्य और २. अनिवार्य। श्वास लेना, खेती करना, घर की सफाई करना, अपना राज्य बचाने के लिए युद्ध करना, चोर-डकैतों से अपनी सुरक्षा के लिए सामना करना आदि अनिवार्य हिंसा है। ये स्वाभाविक रूप से होते ही हैं। अनिवार्य हिंसा से बचाव के लिए प्रायश्चित के रूप में कुछ पुण्य कार्य कर लेना चाहिए।

     वार्य हिंसा जैसे कि अपने जिभ्या-स्वाद या अन्य कारण वश किसी जीवों की हत्या की जाती है; जैसे-मांस, मछली, अंडा इत्यादि के लिए हिंसा करनी। अपने स्वार्थ के लिए किसी को मार डालना इत्यादि। इस तरह की हिंसा से बचना चाहिए; क्योंकि कर्म का फल भोगना ही पड़ता है और कई गुणा होकर स्वयं भोगना पड़ता है। चित्रकूट में कौशल्याजी ने सीताजी की माता सुनयनाजी से कहा था-  कौसल्या कह दोष न काहू। कर्म विवस दुख-सुख क्षति लाहू॥* *कठिन कर्मगति जान विधाता। जो सुभ असुभ सकल फलदाता ॥

किसी का दोष नहीं है, दुःख-सुख, हानि और लाभ सब कर्म ही होते हैं- 'अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।' कठिन कर्म विधाता जानती है, जो शुभाशुभ सभी फल देता है, कारण है कि कर्म की गति नहीं देखी जाती, विधाता जानती है।
(अयोध्याकांड, पृ० ६४१, क्षेपक से)

संत पलटू साहब की वाणी में है-

अपनी   अपनी    करनी,    अपने   अपने    साथ ॥ 
अपने    अपने    साथ,    करै     सो     दुख   आवै । 
बाप।   कै    कारनी     बाप, पूत    कै    पूत    पावै ॥ 
जोरू कै जोरूहिं फलै, खसम का खसम को फलता। 
निज    करण   सेति,     जीव   सब   पार    उतरता ॥ 
नेकी    बड़ी    है   संग,      और।   ना    संगी    कोई । 
देखौ   बूझि     बिचारी,    संग    ये     जाइहैं     दोई ॥ 
पलटू    करनी।   और    की,     नहीं   और   के साथ। 
अपनी   अपनी    करनी,    अपने    अपने   साथ  ॥ ∆
                                                                                                     ~गुरूसेवी स्वामी भागीरथ दास जी महाराज



अहिंसा और कर्म का विधान: जीवन की सार्थकता का मार्ग

​     अक्सर हम धर्म को केवल पूजा-पाठ और अनुष्ठानों तक सीमित मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में धर्म हमारे आचरण और संवेदनाओं में बसता है। भगवान महावीर ने कहा था— "अहिंसा परमो धर्मः"। यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है। जब मनुष्य मन, वचन और कर्म से अहिंसक हो जाता है, तो उसके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा और हिंसक प्रवृत्तियाँ भी शांत होने लगती हैं।

​महापुरुषों की सूक्ष्म करुणा

​     एक प्रेरक प्रसंग में पूज्य गुरुदेव ने सुबह एक सेवक से कहा कि उन्होंने रात में एक 'चोर' पकड़ा है। वह चोर कोई मनुष्य नहीं, बल्कि एक छोटा सा खटमल था। गुरुदेव ने उसे मारने के बजाय बाहर छोड़ने का निर्देश दिया। यह छोटी सी घटना हमें एक बड़ा पाठ पढ़ाती है कि करुणा किसी जीव के आकार पर निर्भर नहीं करती। एक छोटे से प्राणी के प्रति दया दिखाना ही वास्तव में अहिंसा के मार्ग पर चलना है।

​हिंसा के दो स्वरूप: वार्य और अनिवार्य

​संतों ने विवेकपूर्ण ढंग से हिंसा को दो श्रेणियों में विभाजित किया है, ताकि मनुष्य भ्रमित न हो:

  1. अनिवार्य हिंसा: जीवन निर्वाह के लिए जो अनिवार्य है, जैसे सांस लेना, खेती करना (भोजन के लिए), स्वच्छता बनाए रखना या राष्ट्र की रक्षा के लिए युद्ध। ये क्रियाएं जीवन का हिस्सा हैं। ऋषि-मुनि कहते हैं कि ऐसी हिंसा के दोष से बचने के लिए मनुष्य को निरंतर पुण्य कार्य और सेवा करते रहना चाहिए ताकि संतुलन बना रहे।
  2. वार्य हिंसा: ऐसी हिंसा जिसे टाला जा सकता है, लेकिन हम अपने स्वाद (मांस, मछली आदि) या स्वार्थ के लिए करते हैं। यह हिंसा मनुष्य के पतन का कारण बनती है और उसे कर्मों के भारी चक्र में फंसा देती है।

​कर्म की गति और अटल विधान

​रामायण के अयोध्याकांड का प्रसंग स्पष्ट करता है कि सुख-दुख, लाभ-हानि किसी दूसरे के कारण नहीं, बल्कि हमारे अपने कर्मों का प्रतिबिंब हैं। माता कौशल्या कहती हैं:

कठिन कर्मगति जान विधाता। जो सुभ असुभ सकल फलदाता॥

​अर्थात्, कर्म की गति अत्यंत गूढ़ है जिसे केवल विधाता जानता है। हमने जो बोया है, वही हमें काटना होगा। कर्म फल से न कोई बचा है और न कोई बच पाएगा।

​संत पलटू साहब की चेतावनी: 'अपनी अपनी करनी'

​संत पलटू साहब अपनी वाणी में स्पष्ट करते हैं कि इस संसार में मनुष्य अकेला आता है और अकेला ही जाता है। पिता, पुत्र, स्त्री या पति—कोई भी आपके कर्मों का फल नहीं भुगत सकता।

  • "करै सो दुख आवै" — जो जैसा करेगा, वैसा ही फल पाएगा।
  • ​अंत समय में न धन साथ जाएगा, न परिवार। साथ जाएगी तो केवल आपकी 'नेकी' (अच्छे कर्म) या 'बदी' (बुरे कर्म)।

​निष्कर्ष

​यह जीवन एक पाठशाला है जहाँ 'अहिंसा' हमारा विषय है और 'कर्म' हमारी परीक्षा। यदि हम वार्य हिंसा का त्याग करें और अनिवार्य हिंसा के बदले पुण्य का संचय करें, तो हमारा कल्याण निश्चित है। जैसा कि गुरुदेव ने सिखाया, हर जीव में ईश्वर का अंश देखकर दया का भाव रखना ही सच्ची गुरु सेवा है।


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प्रेरक संत-संस्मरण
प्रेरक संत-संस्मरण

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51. एक चोर पकड़ा है || अहिंसा और कर्म का विधान : जीवन की सार्थकता का मार्ग The principle of non-violence and karma 51. एक चोर पकड़ा है || अहिंसा और कर्म का विधान : जीवन की सार्थकता का मार्ग  The principle of non-violence and karma Reviewed by सत्संग ध्यान on 1/05/2026 Rating: 5

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