Ad

Ad2

52. चोर पर दया || ​ संत की करुणा: जब महर्षि मेँहीँ ने चोर को बनाया इंसान || कुप्पाघाट की रोचक घटना

कुप्पाघाट की प्रेरक घटना

    प्रभु प्रेमियों ! यह हृदयस्पर्शी घटना महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज के जीवन की है, जो हमें सिखाती है कि कठोर दंड की तुलना में क्षमा और दया किसी व्यक्ति के चरित्र को बदलने में अधिक प्रभावशाली होती हैं।

इस संस्मरण से पहले वाले संस्मरण नंबर  51.  को पढ़ने के लिए  👉 यहाँ दवाएँ ।

कुप्पाघाट की रोचक घटना, गुरुसेवी भागीरथ बाबा के संस्मरण
कुप्पाघाट की रोचक घटना

५२. चोर पर दया

     महर्षि मेँहीँ आश्रम कुप्पाघाट के संतमत सत्संग मंदिर में अयोध्या के एक रामानंदी साधु रात में ठहरे थे। उनके पास में काँसा का एक बड़ा लोटा था। रात में उन्हीं के समीप एक चोर भी सोया था। ब्रह्ममुहूर्त तीन बजे जब साधु बाबा ध्यान करने के लिए बैठे, तो वह चोर उनका लोटा लेकर वहाँ से चल दिया।

     संयोग से मायांगज फाँड़ी (पुलिस चौकी) के एक पुलिस ने उसे देख लिया। वह अनुमान लगाने लगा कि यह गृहस्थ व्यक्ति साधु के पास रहनेवाला लोटा लेकर जा रहा है। लगता है यह आश्रम के किसी साधु का लोटा लेकर जा रहा है। उस व्यक्ति को पकड़कर रखा और चार बजे प्रातः ही उस व्यक्ति को लोटा समेत आश्रम लाया गया। उस समय पूज्य गुरुदेव व्हीलचेयर में बैठकर आश्रम के सड़क पर टहल रहे थे। उस व्यक्ति को पूज्य गुरुदेव के समीप लाया गया। इधर सत्संग मंदिर में अयोध्या के साधु अपना लोटा खोज रहा था। पूज्य गुरुदेव उस साधु को बुलवाकर लोटा दिलवा दिये और पुलिस से बोले- "इसको छोड़ दीजिए।"

     चोर से बोले- “तुम अपना घर चले जाओ और अब चोरी नहीं करना। उस चोर ने प्रणाम किया और दृढ़ता से कहा- "अब मैं चोरी नहीं करूँगा।"       ~गुरूसेवी स्वामी भागीरथ दास जी महाराज।   ∆∆∆


​नीचे इस प्रेरक प्रसंग पर आधारित एक लेख प्रस्तुत है:

​संत की करुणा: जब महर्षि मेँहीँ ने चोर को बनाया इंसान

​१. कुप्पाघाट की एक शांत भोर

​भागलपुर स्थित प्रसिद्ध महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट अपनी शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए जाना जाता है। घटना उस समय की है जब अयोध्या के एक रामानंदी साधु आश्रम के सत्संग मंदिर में ठहरे हुए थे। उनके पास धातु (काँसे) का एक बड़ा लोटा था, जो उस समय साधुओं की बहुमूल्य संपत्ति माना जाता था।

​२. लोभ और चोरी की घटना

​उसी रात, साधु के पास ही एक अन्य व्यक्ति भी सोया हुआ था, जिसकी नीयत साफ नहीं थी। ब्रह्ममुहूर्त में, जब साधु बाबा नियम के अनुसार तड़के तीन बजे ध्यान (साधना) में मग्न थे, उस व्यक्ति ने मौका पाकर उनका कीमती लोटा चुरा लिया और वहाँ से चंपत हो गया।

​३. सतर्क प्रशासन और पकड़

​चोर का दुर्भाग्य (या शायद सौभाग्य) था कि मायागंज पुलिस चौकी के एक सिपाही की नज़र उस पर पड़ गई। एक साधारण गृहस्थ के हाथ में साधुओं जैसा लोटा देखकर पुलिस को संदेह हुआ। सिपाही उसे पकड़कर सुबह चार बजे सीधे आश्रम ले आया, जहाँ पूज्य गुरुदेव महर्षि मेँहीँ परमहंस जी अपनी व्हीलचेयर पर टहल रहे थे।

​४. न्याय नहीं, दया का मार्ग

​आमतौर पर चोरी के मामले में पुलिस कार्रवाई और दंड की अपेक्षा की जाती है। लेकिन संत का दृष्टिकोण अलग था। गुरुदेव ने अयोध्या के साधु को बुलवाकर उनका लोटा वापस करवाया। लेकिन जब पुलिस ने चोर को ले जाने की अनुमति चाही, तो महर्षि जी ने अद्भुत दया दिखाते हुए कहा— "इसे छोड़ दीजिए।"

​५. हृदय परिवर्तन: एक नया जन्म

​गुरुदेव ने उस व्यक्ति को न तो डांटा, न ही उसे अपमानित किया। उन्होंने बस ममता भरे शब्दों में कहा:

"तुम अपने घर चले जाओ और अब चोरी नहीं करना।"

​सच्ची करुणा में वह शक्ति होती है जो बड़े-बड़े उपदेशों में नहीं होती। संत की निस्वार्थ दया देखकर वह चोर ग्लानि से भर गया। उसने गुरुदेव के चरणों में प्रणाम किया और दृढ़ संकल्प के साथ कहा— "अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा।"

​निष्कर्ष: लेख का संदेश

​यह प्रसंग सिद्ध करता है कि 'पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।' महर्षि मेँहीँ ने उस व्यक्ति के भीतर छिपी बुराई को अपनी क्षमा से समाप्त कर दिया। जहाँ कानून भय से सुधारने की कोशिश करता है, वहीं एक संत अपने प्रेम और विश्वास से अपराधी का हृदय परिवर्तन कर देता है।  ∆∆∆

इस संस्मरण के बाद वाले संस्मरण नंबर  53. को पढ़ने के लिए  👉 यहाँ दवाएँ । 






प्रेरक संत-संस्मरण
प्रेरक संत-संस्मरण

       प्रेरक संत-संस्मरण :  'प्रेरक संत-संस्मरण' में संतों के जीवन से जुड़ी प्रेरणादायक कहानियाँ और उनके उपदेश शामिल किया गया हैं, जो लोगों को जीवन में अच्छे कर्म करने और सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। ये संस्मरण अक्सर संतों के अनुभवों, उनके शिष्यों और समाज पर उनके प्रभाव को दर्शाते हैं, जिससे व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। इस पुस्तक में पूज्य गुरुदेव की डायरी से उनके हस्तलिखित संत-महापुरुषों की जीवनी को भी सबके पढ़ने, समझने योग्य बनाने के लिए उसे भारती अंकन रूप एवं कठिन शब्दों को सरल रूप में दिया गया है ।    इसमें गुरु महाराज हस्तलिखित कई महापुरुषों के संक्षिप्त जीवन परिचय है और बहुत सारे भजन है, जिसे हू-ब-हू उन्हीं के लिखित अक्षर में प्रकाशित किया गया है और समझने के लिए भारती नागरी लिपि में भी उसका ट्रांसलेट किया गया है।    यह पुस्तक भी गुरुदेव की डायरी का है छोटा रूप है।    इसमें डायरी के सभी बातों के साथ-साथ गुरु महाराज के बहुत सारे संस्मरण भी दिये गये हैं।   ज्यादा जाने ) 

     सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की पुस्तकें मुफ्त में पाने के लिए  शर्तों के बारे में जानने के लिए   👉 यहाँ दवाएँ।

---×---
52. चोर पर दया || ​ संत की करुणा: जब महर्षि मेँहीँ ने चोर को बनाया इंसान || कुप्पाघाट की रोचक घटना 52. चोर पर दया || ​ संत की करुणा: जब महर्षि मेँहीँ ने चोर को बनाया इंसान || कुप्पाघाट की रोचक घटना Reviewed by सत्संग ध्यान on 1/07/2026 Rating: 5

कोई टिप्पणी नहीं:

सत्संग ध्यान से संबंधित प्रश्न ही पूछा जाए।

Ad

Blogger द्वारा संचालित.