प्रभु प्रेमियों ! 'गुरु का प्रेम' (Guru ka Prem) का अर्थ सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि एक गहरा, निस्वार्थ और मार्गदर्शक रिश्ता है, जो शिष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, जो पानी की प्यास बुझाने, शीतलता देने और अनंतता का एहसास कराने जैसा है, जहां गुरु का हर शब्द और कार्य शिष्य के आध्यात्मिक उत्थान के लिए होता है और शिष्य का समर्पण ही इस प्रेम का सबसे बड़ा फल है। आइये सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज अपने शिष्यों से, सेवकों से कैसा स्नेहित व्यवहार करते थे, इसका एक झलक इस प्रसंग में देखें--
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49. गुरु का प्रेम
Guru ka Prem सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि एक गहरा, निस्वार्थ और मार्गदर्शक रिश्ता है।
४९. गुरु का प्रेम
लगभग १९७५ ई० की बात है। पूज्य गुरुदेव महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज संतमत सत्संग का कई जगह प्रचार करते हुए कटिहार जिलान्तर्गत स्थित संतमत सत्संग मंदिर मनिहारी पहुँचे। गर्मी का समय था। वहाँ पहुँचने पर मुझे जोरों का बुखार आ गया। उस समय टीकापट्टी के सम्माननीय आनंद बाबू भी साथ में थे। मैंने उनसे लगभग दो बजे अपराह्न काल में कहा- "कल गुरुदेव को जलालगढ़ जाना है। मुझको बुखार लग गया है। रात में भी नहीं खाया हूँ और अभी तक कुछ नहीं खाया हूँ। ऐसा कोई उपाय बतलाइए, जिससे जल्द हमारा बुखार छूट जाए।" उन्होंने कहा- "अच्छा, मैं इसकी व्यवस्था करता हूँ।" उन्होंने सबसे पहले मेरे लिए पूज्य संतसेवी बाबा से एनीमा लेने का सामान माँग लिये। पूज्य बाबा कभी-कभी अपना पेट साफ करने के लिए एनीमा लेते थे। इसके बाद वे बेल, जामुन, नींबू आदि कई तरह के पत्ते को लाकर पानी में खौलाए। उसके बाद उस पानी को अनुकूल बनाकर एनीमा पात्र में देकर बोले- "इससे एनीमा लीजिए।" उस अनुकूल बने पानी से एनीमा लेने से मेरा पेट बिल्कुल साफ हो गया, लेकिन भूख नहीं लगी। रातभर में बुखार बिल्कुल ठीक हो गया। पूज्य गुरुदेव जलालगढ़ जाने लगे, तब हमसे बोले - "बेटा! तुमने रात में भी कुछ नहीं खाया है? इसलिए हमको जो मुनक्का देते हो, वही मुनक्का एक मुट्ठी धोकर खा लो। इसके बाद हमको गाड़ी में बैठाना। मैंने वैसा ही किया। ∆ ~गुरूसेवी स्वामी भागीरथ दास जी महाराज।
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प्रेरक संत-संस्मरण : 'प्रेरक संत-संस्मरण' में संतों के जीवन से जुड़ी प्रेरणादायक कहानियाँ और उनके उपदेश शामिल किया गया हैं, जो लोगों को जीवन में अच्छे कर्म करने और सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। ये संस्मरण अक्सर संतों के अनुभवों, उनके शिष्यों और समाज पर उनके प्रभाव को दर्शाते हैं, जिससे व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। इस पुस्तक में पूज्य गुरुदेव की डायरी से उनके हस्तलिखित संत-महापुरुषों की जीवनी को भी सबके पढ़ने, समझने योग्य बनाने के लिए उसे भारती अंकन रूप एवं कठिन शब्दों को सरल रूप में दिया गया है । इसमें गुरु महाराज हस्तलिखित कई महापुरुषों के संक्षिप्त जीवन परिचय है और बहुत सारे भजन है, जिसे हू-ब-हू उन्हीं के लिखित अक्षर में प्रकाशित किया गया है और समझने के लिए भारती नागरी लिपि में भी उसका ट्रांसलेट किया गया है। यह पुस्तक भी गुरुदेव की डायरी का है छोटा रूप है। इसमें डायरी के सभी बातों के साथ-साथ गुरु महाराज के बहुत सारे संस्मरण भी दिये गये हैं। ( ज्यादा जाने )
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49. गुरु का प्रेम || Guru ka Prem सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि एक गहरा, निस्वार्थ और मार्गदर्शक रिश्ता है।
Reviewed by सत्संग ध्यान
on
1/01/2026
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