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46. परिस्थिति के कारण विचार में बदलाव || परिस्थितियाँ हमारे विचारों और कार्यों को गढ़ती हैं ।

परिस्थितियाँ हमारे विचारों और कार्यों को गढ़ती हैं । 

     प्रभु प्रेमियों  !  'परिस्थिति के कारण विचार में परिवर्तन' का अर्थ है कि किसी व्यक्ति, जीव या प्रणाली के सोचने के तरीके और निर्णय, उसके आसपास के पर्यावरणीय और सामाजिक हालात (परिस्थितियों) से कैसे प्रभावित होते हैं, जिसमें प्राकृतिक कारक (मौसम, जलवायु) और सामाजिक-आर्थिक कारक (समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था) शामिल हैं, जो संसाधनों के उपयोग, विकास और जीवन की गुणवत्ता को आकार देते हैं, और इन कारकों को समझना पारिस्थितिक संतुलन व सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण है। परिस्थितियाँ हमारे विचारों और कार्यों को गढ़ती हैं, और इन्हीं परिस्थितियों को समझकर ही हम अपने और प्रकृति के लिए बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। गुरु महाराज भी विशम परिस्थितियों में  कैसा व्यवहार करते थे, इस संस्मरण से समझिये। 

इस संस्मरण से पहले वाले संस्मरण नंबर  45. को पढ़ने के लिए  👉 यहाँ दवाएँ ।


46. परिस्थिति के कारण विचार में बदलाव
46. परिस्थिति के कारण विचार में बदलाव

46. परिस्थिति के कारण विचार में बदलाव

     संथाल परगना के करमाटाँड़ नामक गाँव में स्वामी गंगेश्वरानंद जी महाराज का जन्म स्थान है। उस क्षेत्र के प्रायः लोग उनको गंगा गुरुजी या गंगा ठाकुर कहकर जानते हैं। उस क्षेत्र में उनका बहुत सम्मान था। अभी भी उस क्षेत्र में उनका बहुत सम्मान के साथ नाम लेते हैं। लगभग १९६२-६३ ई० की बात है। इन्होंने दो दिवसीय सत्संग के लिए पूज्य गुरुदेव महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज से सविनय प्रार्थना की। इनकी प्रार्थना करते ही पूज्य गुरुदेव से तुरंत सत्संग कराने की स्वीकृति मिल गई और सत्संग का समय भी निश्चित कर दिया गया। निश्चित किये गये समय पर पूज्य गुरुदेव अपने समीपवर्ती शिष्यों के साथ करमाटाँड़ सत्संग करने के लिए पहुँच गये। वहाँ पहुँचते ही मुझे जोरों का बुखार आ गया। फिर भी मैं उस अवस्था में भी किसी तरह सेवा में लगा रहा। दो दिन के सत्संग में एक दिन प्रातःकाल का सत्संग सम्पन्न हुआ। अपराह्नकाल के सत्संग में पूज्य गुरुदेव पंडाल गये और थोड़ा-सा उपदेश देकर स्वामी गंगेश्वरानंदजी को बुलाकर बोले - "गंगा ! भगीरथ को बुखार लग गया है, इसको लेकर मैं आश्रम जा रहा हूँ। कल का सत्संग तुमलोग आपस में मिलकर कर लेना।" यह कहकर पंडाल से कुप्पाघाट के लिए प्रस्थान कर दिये। मैंने किसी तरह उन्हें कारगाड़ी में बैठाया। पूज्य गुरुदेव पूज्य संतसेवी बाबा से बोले-संतसेवीजी ! आप आगे के सीट पर बैठ जाइए। भगीरथ लेटकर जाएगा। शिष्य उम्र में बड़ा हो या छोटा, सबके प्रति गुरुदेव अगाध प्रेम और दया रखते थे। ∆        ~गुरूसेवी स्वामी भागीरथ दास जी महाराज


इस संस्मरण के बाद वाले संस्मरण नंबर 47. को पढ़ने के लिए  👉 यहाँ दवाएँ । 






प्रेरक संत-संस्मरण
प्रेरक संत-संस्मरण

       प्रेरक संत-संस्मरण :  'प्रेरक संत-संस्मरण' में संतों के जीवन से जुड़ी प्रेरणादायक कहानियाँ और उनके उपदेश शामिल किया गया हैं, जो लोगों को जीवन में अच्छे कर्म करने और सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। ये संस्मरण अक्सर संतों के अनुभवों, उनके शिष्यों और समाज पर उनके प्रभाव को दर्शाते हैं, जिससे व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। इस पुस्तक में पूज्य गुरुदेव की डायरी से उनके हस्तलिखित संत-महापुरुषों की जीवनी को भी सबके पढ़ने, समझने योग्य बनाने के लिए उसे भारती अंकन रूप एवं कठिन शब्दों को सरल रूप में दिया गया है ।    इसमें गुरु महाराज हस्तलिखित कई महापुरुषों के संक्षिप्त जीवन परिचय है और बहुत सारे भजन है, जिसे हू-ब-हू उन्हीं के लिखित अक्षर में प्रकाशित किया गया है और समझने के लिए भारती नागरी लिपि में भी उसका ट्रांसलेट किया गया है।    यह पुस्तक भी गुरुदेव की डायरी का है छोटा रूप है।    इसमें डायरी के सभी बातों के साथ-साथ गुरु महाराज के बहुत सारे संस्मरण भी दिये गये हैं।   ज्यादा जाने ) 

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