47. भोजन और युद्ध की बातें
प्रभु प्रेमियों ! भोजन और युद्ध, दोनों ही मानव अस्तित्व के बुनियादी पहलू हैं, लेकिन वे जीवन और मृत्यु के बिल्कुल विपरीत छोरों पर स्थित हैं। जहाँ भोजन जीवन का स्रोत है। यह पोषण प्रदान करता है, शरीर को ऊर्जा देता है, और समुदायों को एक साथ लाता है। यह संस्कृति, परंपरा और उत्सव का एक अभिन्न अंग है। भोजन साझा करना शांति और आतिथ्य का प्रतीक है। वहीं युद्ध विनाश का चरम रूप है। यह मृत्यु, पीड़ा और तबाही लाता है। यह समुदायों को विभाजित करता है, संस्कृतियों को नष्ट करता है और जीवन के स्रोतों को बाधित करता है। युद्ध की स्थिति में भोजन अक्सर एक हथियार या दुर्लभ वस्तु बन जाता है। देश, काल और परिस्थिति के अनुसार इन दोनों का चयन बहुत सोच-समझकर करना चाहिए । इस संबंध में समयानुसार हमारे गुरु महाराज का क्या विचार है ? इसी पर चर्चा करते हुए यह संस्मरण लिखा गया है~
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Food and war देश, काल और परिस्थिति के अनुसार इन दोनों का चयन
47. भोजन और युद्ध की बातें
एक अच्छे साधु पूज्य गुरुदेव से किसी वार्तालाप के सिलसिले में बोले- "हुजूर! भोजन में आगे और रैन (युद्ध) में पीछे रहना चाहिए। यह सुनकर पूज्य गुरुदेव बोले-यह पेटू और कायर का काम है। पेटू और कायर प्रवृत्तिवाले व्यक्ति से आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती है।
दिनांक १२ अक्टूबर, १९६२ ई० को चीन और भारत के बीच जब युद्ध छिड़ गया था, उस अवसर पर पूज्य गुरुदेव बोले थे-“आज या कल, कभी-न-कभी इस शरीर का नाश हो जाना ध्रुव निश्चित है; किन्तु लोक-कल्याणकारी कार्य में इस शरीर की बलि हो जाना अति श्रेयस्कर है। मैं बूढ़ा हो गया हूँ, हाथ काँपते हैं, फिर भी यदि देशरक्षा के निमित्त सरकार युद्ध में जाने के लिए कहे तो मैं सहर्ष जाने के लिए तैयार हूँ। देश रक्षार्थ युद्ध के लिए अपने देश के किसी भी व्यक्ति को मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। यह अनिवार्य हिंसा है, जैसे कृषकों के लिए कृषि-कर्म की हिंसा। नवजवानों को साहसी, निरालसी और पुरुषार्थी होना चाहिए और सभी देशवासियों को तन, मन और धन से सतत सरकार की सहायता के लिए तत्पर, सावधान और क्रियाशील रहना चाहिए, जिससे देश का संकट शीघ्र टल जाए।
हमारी वैदिक-परम्परा के अनुसार अतिथि एवं बड़ों के भोजन के उपरांत ही भोजन करना चाहिए। माँ-बहनों को भी अपने परिवार को भोजन कराने के उपरान्त ही भोजन करना चाहिए। यदि खूब भूख लगे, तो बना हुआ भोजन नहीं खाकर, भोजन के विकल्प में दूसरा कुछ खा लेना चाहिए।
~गुरूसेवी स्वामी भागीरथ दास जी महाराज।
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