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LS04, पिंड माहिं ब्रह्मांड ।। Amazing feature of human body ।। मनुष्य शरीर में विश्व ब्रह्मांड दर्शन

LS04, पिंड माहिं ब्रह्मांड

      प्रभु प्रेमियों ! सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की पुस्तक "सत्संग योग" संतमत की प्रतिनिधि ग्रंथ है। इस ग्रंथ में प्रकाशित "पिंड ब्रह्मांड" का चित्र, (नक्शा) बड़े महत्व का है। इसमें ध्यान अभ्यास से संबंधित हर तरह की सांकेतिक जानकारी दी गई है। इसको समझाने के लिए पूज्यपाद लालदास जी महाराज ने "पिंड माहिं ब्रह्मांड" नामक ग्रंथ की रचना की है।  आइए ! इस पुस्तक के बारे में विशिष्ट जानकारी प्राप्त करें-

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पिंड माहिं ब्रह्मांड
पिंड माहिं ब्रह्मांड

Amazing feature of human body


मनुष्य - देह अद्भुत है :

       अध्यात्म - शास्त्रों में मनुष्य - देह की बड़ी महिमा गायी गयी है , जो अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है । कहा जाता है कि इस देह की प्राप्ति के लिए स्वर्ग के देवता भी लालायित रहते हैं । इस शरीर में रहकर कर्म करते हुए मनुष्य परम मोक्ष , स्वर्ग और नरक - तीनों की ओर चले जाते हैं । सभी प्राणियों में मनुष्य - शरीर की श्रेष्ठता इसलिए सिद्ध है कि इसी शरीर में रहकर जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा पाया जा सकता है । ऐसा अवसर मानव - शरीर के अतिरिक्त दूसरे किसी भी शरीर में प्राणी को प्राप्त नहीं हो सकता । स्वर्ग में भोग्य सामग्री की प्रचुरता रहने के कारण देवता भी इन्द्रियों के पूरे दास बने रहते हैं और यही कारण है कि वे विषय - सुखों से ऊपर उठकर मोक्ष - साधन का पुरुषार्थ करने में सक्षम नहीं हो पाते । विवेकशील मनुष्य ही अपने उद्धार की बात सोच पाता है और उसके अनुरूप साधनों में प्रवृत्त हो सकता है ।

     ' ब्रह्माण्ड पुराणोत्तर गीता ' में कहा गया है कि नौ द्वारोंवाले शरीर से ज्ञान उसी प्रकार निकलते रहते हैं , जिस प्रकार मकड़ी के शरीर से तन्तु ; देखें - ' नवच्छिद्रान्विताः देहा : स्नुवत्ते जालिका इवा ' स्वामी विवेकानन्दजी महाराज ने भी कहा है कि ' मानव - मस्तिष्क ज्ञान का अक्षय भंडार और अछोर पुस्तकालय है । ' मस्तिष्क - अधिष्ठित मन में असीम शक्ति छिपी हुई है । ज्ञान - विज्ञान का एकमात्र केन्द्र मानव का मन ही है । जिस किसी ने भी अपने जिस किसी अद्भुत कार्य से संसार के लोगों को चमत्कृत किया है , वह उसकी मानसिक एकाग्रता का ही परिणाम रहा है । मानसिक एकाग्रता के प्राप्त हो जाने पर समस्त ज्ञान - विज्ञान अपने - आप सिमट - सिमटकर मस्तिष्क में संगृहीत होने लग जाते हैं । ' ज्ञान - संकलिनी तंत्र ' में भी उल्लिखित है कि देह में ही सभी विद्याएँ , सभी देवता और सब तीर्थ विद्यमान हैं । ये केवल द्वारा बतलायी गयी युक्ति का अभ्यास करने से प्राप्त किये जा सकते हैं

 देहस्था : सर्वविद्याश्च देहस्थाः सर्वदेवताः । देहस्था : सर्वतीर्थानि गुरुवाक्येन लभ्यते ॥ ..............।


इन बातों को अच्छी तरह समझने के लिए इस पुस्तक को अवश्य खरीदें।


पिंड-माहिं-ब्रह्मांड-मुख्य-कवर
पिंड माहिं ब्रह्मांड 01

 ॥ ॐ श्रीसद्गुरवे नमः ॥

 प्रकाशकीय ( प्रथम संस्करण का )
     
      परमाराध्य सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज के द्वारा संपादित एवं लिखित “ सत्संग - योग , चारो भाग ' सन्तमत - सत्संग का प्रतिनिधि - ग्रन्थ है । इसके प्रारंभिक तीन भागों में सन्तमत के सत्स्वरूप को समग्रता के साथ दरसाने के लिए वेद , उपनिषद् , पुराण , तन्त्रशास्त्र , सन्तसाहित्य आदि सद्ग्रन्थों और साधु - साधकों तथा विद्वान् महात्माओं के महत्त्वपूर्ण वाक्य उद्धृत किये गये हैं । चारो भागों में सद्गुरुजी महाराज की पवित्र लेखनी से नि : सृत चौथे भाग को वैसा ही स्थान प्राप्त है , जैसा किसी जप - माला में मणिकाओं के बीच सुमेरु को प्राप्त होता है । चौथे भाग में सद्गुरुजी ने एक नक्शा लगवाया है , जिसका नाम है- “ अनन्त में सान्त , सान्त में अनन्त तथा ब्रह्माण्ड में पिण्ड , पिण्ड में ब्रह्माण्ड का सांकेतिक चित्र । " थोड़ी भिन्नता के साथ यही नक्शा जहाँ - तहाँ संतमत के सत्संग - मन्दिर की दीवार पर भी बनवाया गया देखने को मिलता है ।

 ' सत्संग - योग , चारो भाग ' का पहला प्रकाशन सन् १९३९ ई ० में हुआ है । संभव है , तभी से यह नक्शा उसमें संलग्न किया जाता रहा हो । इन लगभग ५१ वर्षों की लम्बी अवधि में लक्ष - लक्ष सत्संग - प्रेमियों के मन में इस नक्शे को देखकर इसको पूरी तरह समझने का कुतूहल अवश्य जाग्रत् हुआ होगा और आज भी प्रत्येक सत्संगप्रेमी इसे समझने के लिए उत्कंठित हैं ; परन्तु उनके कुतूहल की शान्ति के लिए न कभी किन्हीं के द्वारा इसपर कोई पुस्तक लिखने का प्रयत्न किया गया और न कभी मौखिक रूप से ही किन्हीं के द्वारा संपूर्णता से इसकी व्याख्या की गयी ।

 बड़े हर्ष का विषय है कि लेखक ने पहले - पहल इस नक्शे पर व्याख्यात्मक ग्रंथ ' पिण्ड माहिँ ब्रह्माण्ड ' लिखकर इस दिशा में एक महान् और साहसपूर्ण कार्य किया है । यह बात बिलकुल सत्य है कि विषय बहुत गहन और जन सामान्य के लिए दुर्बोध है , फिर भी मेरा विश्वास है कि

  सामान्य जिज्ञासु भी यदि पुस्तक को क्रमिक रूप से मनन - पूर्वक दो - चार बार पढ़ लेंगे , तो वे इसे पूरी तरह आत्मसात् कर सकने में सक्षम हो जाएंगे । इसे अच्छी तरह समझ लेने पर सत्संग - प्रेमियों को बौद्धिक संतृप्ति तो होगी  ही , साथ - ही - साथ आध्यात्मिक साधना के अन्तर्मार्ग पर अग्रसर होने के लिए उन्हें समुचित दिशा - निर्देश भी प्राप्त हो जाएगा । व्याख्या आदि से अन्त तक सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी है , जो बड़ी ही संतोषजनक और सर्वत्र सबल प्रमाणों से संपुष्ट है । 

 सन्त - साहित्य के लगभग समस्त पारिभाषिक शब्द इस पुस्तक में व्याख्यायित होकर आ गये हैं ; अनेक नये तथ्य भी उभरकर सामने आये हैं । पुस्तक की बातों को अच्छी तरह हृदयंगम कर लेने पर ‘ सत्संग - योग , चारो भाग ' , ' महर्षि मेंही - पदावली ' और अन्य संत - साहित्य के मर्म को देखने - समझने की एक विशेष विचार - दृष्टि प्राप्त हो जाएगी । इस पुस्तक के अध्ययन से यह भी विदित हो जाएगा कि कुछ लोगों ने लौकिक भावों के वशीभूत होकर किस तरह सन्तमत के सत्स्वरूप को विकृत करने का प्रयत्न किया है और उस सत्स्वरूप को उजागर करने में गुरुदेव की कैसी भूमिका रही है ।
 
 पुस्तक दो खण्डों में विभाजित है । दोनों खण्ड इसी जिल्द में हैं । प्रथम ' पिण्ड ' खण्ड में पिण्ड के मूलाधार से लेकर आज्ञाचक्र तक के षट् चक्रों का वर्णन है और दूसरे ‘ ब्रह्माण्ड ' खण्ड में ब्रह्माण्ड के सहस्रदल कमल से लेकर शब्दातीत पद तक के सात दर्जों का वर्णन है । इस पुस्तक में और भी अनेक ऐसी बातें हैं , जो नक्शे की बातों से संबंधित तो हैं ; परन्तु नक्शे में नहीं हैं । 

 अन्त में , मैं उन महानुभावों के प्रति अपना धन्यवाद और कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ , जिन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन में मेरी सहायता की है । जय गुरु !

- उमेश प्रसाद मण्डल
 १६-१-१९९ १ ई ०


पिंड माहिं ब्रह्मांड 02
पिंड माहिं ब्रह्मांड 02

पिंड माहिं ब्रह्मांड 03
पिंड माहिं ब्रह्मांड 0 3

पिंड माहिं ब्रह्मांड 04
पिंड माहिं ब्रह्मांड 04

पिंड माहिं ब्रह्मांड 05
पिंड माहिं ब्रह्मांड 05

पिंड-माहिं-ब्रह्मांड-मुख्य-चित्र
पिंड माहिं ब्रह्मांड का मुख्य चित्र


पिंड-माहिं-ब्रह्मांड-लास्ट-कवर, पिंड माहिं ब्रह्मांड 06
पिंड माहिं ब्रह्मांड 06


 ॥ ॐ श्रीसद्गुरवे नमः ॥

 पिण्ड माहिँ ब्रह्माण्ड शीर्षक - सूची

  ( पिण्ड - खण्ड )


  1. मनुष्य - देह अद्भुत है -१ /
  2. पिंड ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त रूप है -२ /
  3. योगनाड़ी -५ / 
  4. पिंड में छह चक्र हैं - ९ / 
  5. कुण्डलिनी शक्ति और उसका स्थान -११ / 
  6. मूलाधार चक्र -१३ / 
  7. स्वाधिष्ठान चक्र -१५ / 
  8. मणिपूरक चक्र -१६ / 
  9. अनाहत चक्र -१७ / 
  10. विशुद्ध चक्र -१८ / 
  11. आज्ञाचक्र , योगहृदय , षष्ठ चक्र , आधार - चक्र , Medulla ( मेड्युला ) , द्विदल कमल -२० / 
  12. शिवनेत्र , तीसरा तिल , दशम द्वार , जीव का जाग्रत् - स्थान , सुरत - शिरोमणि -विन्दु , सुषुम्न - विन्दु , योगहृदय - केन्द्र - विन्दु -२७ /
  13. धुर्लोक - परलोक , अध : -ऊर्ध्व , श्याम - श्वेत , तारक लोक , Astral Plain ( आस्ट्रल प्लेन ) -३७ / 
  14. गगन मंडल में औंधा कुआँ -४० / 
  15. बंकनाल -४१ / 
  16. भ्रमर - गुफा -४२ / 
  17. ब्रह्मरंध्र -४४ / 
  18. तारकब्रह्म , अणोरणीयाम् , निजमन , अविमुक्तात्मा , हीरा , लाल , मणि , मोती , Eastern Star ( ईस्टर्न स्टार ) -४४ / 
  19. चक्रों के देवता -५० / 
  20. चक्र और पाँच तत्त्व -५३ / 
  21. परा , पश्यन्ती , मध्यमा और वैखरी वाणी 1-५७ / 
  22. चक्र और जीव का स्थान -६१ / 
  23. दस वायु -६२ / 
  24. चक्र और कमल -६३ / 
  25. कमल और उसकी पंखुड़ियाँ -६५ / 
  26. सोलह स्वर -६७ / 
  27. अनुस्वार -६८ / 
  28. चन्द्रबिन्दु - युक्त स्वर ( अनुनासिक स्वर ) -७१ / 
  29. विसर्ग ( : ) - ७१ / 
  30. व्यंजन -७२ / 
  31. सन्तों की षट् चक्र - संबंधी वाणियाँ -७४ / 
  32. तान्त्रिक ग्रन्थ में षट् चक्र - वर्णन -८० /
  33. ध्यानयोग में प्राणायाम की क्रिया स्वतः होती जाती है -८१ /.


 ( ब्रह्माण्ड - खण्ड ) 


  1. रूप - ब्रह्माण्ड में दर्शित होनेवाली ज्योतियाँ और ज्योतिरूप -८६ /
  2. आज्ञाचक्र से ऊपर सात दर्जे हैं -८ ९ / 
  3. पदों के रंग - ९ ० / 
  4. कबीर - शब्दावली , भाग १ में दर्जों का वर्णन - ९ १ / 
  5. संत राधास्वामीजी का दर्जा से संबंधित वर्णन - ९ ५ / 
  6. अनाम पद से ऊपर और कुछ नहीं हो सकता - ९ ७ / 
  7. बाबा देवी साहब का दर्जा से संबंधित वर्णन - ९ ८ / 
  8. “ महर्षि मेंही - पदावली ' में दर्जों से संबंधित वर्णन -१०० /
  9. राधास्वामीमत : रचना के तीन महाखंड -१०१ / 
  10. सहस्रदल कमल ( सहस्त्रार ) -१०४ / 
  11. ज्योति निरंजन -११० / 
  12. मन वेदान्त का ब्रह्म नहीं -१२२ / 
  13. त्रिकुटी -१२३ / 
  14. मायाब्रह्म -१२७ / 
  15. शून्य -१३१ / 
  16. ररंब्रह्म -१३४ / 
  17. महाशून्य -१३८ / 
  18. भँवरगुफा -१३ ९ / 
  19. सोहब्रह्म -१५३ / 
  20. सतलोक -१६७ / 
  21. समष्टि प्राण , संपूर्ण प्राणियों की इन्द्रियों के आधारस्वरूप अन्तरात्मा -१७३ / 
  22. हिरण्यगर्भ , सच्चिदानन्दमयी शब्दात्मिका शक्ति -१७४ /
  23. सच्चिदानन्दमय शब्दब्रह्म -१७५ / 
  24. आदिनाद , आदिनाम , ओम् , सद्गुरु , सत्शब्द -१७६ / 
  25. सत्यनाम , सारशब्द , रामनाम , विष्णुनाम -१७७ / 
  26. कृष्णनाम , शिवनाम -१६८ / 
  27. तमस् - प्रधान लोक , रजस् - प्रधान लोक , सत्त्व - प्रधान लोक -१७८ / 
  28. पिंड , रूप - ब्रह्मांड , अरूप ब्रह्मांड -१८० / 
  29. तुरीयावस्था -१८१ / 
  30. स्थूल , सूक्ष्म , कारण , महाकारण , कैवल्य -१७२ / 
  31. अनाहत ध्वन्यात्मक , अनहद ध्वन्यात्मक -१८२ / 
  32. प्रथम वर्ग , द्वितीय वर्ग , तृतीय वर्ग -१८३ / 
  33. पूर्ण ब्रह्मपद , सत् - असत् , सगुण - निर्गुण -१८३ / 
  34. क्षर पुरुष , अक्षर पुरुष -१८४ / 
  35. पूर्व , पश्चिम , दक्षिण , उत्तर -१८४ / 
  36. अंधकार - मंडल , प्रकाश - मंडल , जड़ात्मक शब्द - मंडल , चेतनात्मक शब्द - मंडल -१८५ / 
  37. मलकूत , जबरूत , लाहूत , हाहूत , हूतलहूत , हूत -१८६ / 
  38. अपरा प्रकृति - मंडल , परा प्रकृति - मंडल , विकृति- मंडल -१८७ /
  39. शब्दातीत पद , सत् - असत् - क्षर - अक्षर - अगुण - सगुण - पर -१८७ / 
  40. अलख , अगम , अज , अद्वितीय , अनादि - अनन्त - स्वरूपी -१८८ / 
  41. अनामी , अधामी , परधाम -१८ ९ / 
  42. परम पुरुष , पुरुषोत्तम , परमात्मा , त्रयवर्गपर परम पद -१ ९ ० /
  43. उत्तर , तुरीयातीत पद , परम निर्वाणपद -१ ९ १ /.

।। विषय सूची समाप्त।।


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LS04. संतवाणी-सुधा सटीक  :    नाम्नी इस पुस्तक में टीकाकार ने मूल पद्य के नीचे क्रमश : शब्दार्थ , भावार्थ और कहीं - कहीं टिप्पणी भी दी है । उन्होंने आवश्यक समझकर कहीं - कहीं भावार्थ के बीच - बीच भी कोष्ठान्तर्गत टिप्पणी दी है । ऐसा कहना चाहिए कि टीकाकार ने शब्दार्थ , भावार्थ और टिप्पणी द्वारा पद्यार्थ को पूरी तरह स्पष्ट करने का प्रयास किया है । उनका यह प्रयास संतवाणी और सद्गुरुदेवजी महाराज के ज्ञान - विचार के संदर्भ में हुआ है । टीकाकार ने कहीं - कहीं किन्हीं सन्त के पद्य और पद्य में आये शब्द के अर्थ को उन्हीं संत की अन्य वाणी अथवा अन्य संत की वाणी के प्रमाण द्वारा संपुष्ट किया है । पुस्तक में कहीं - कहीं सन्तवाणी का पाठान्तर भी दे दिया गया है । पाठकों की अर्थ समझने की सुविधा के लिए वैष्णव साधु श्रीइन्द्रनारायण दासजी और रामानन्दी साधु श्रीसुतीक्ष्ण दासजी द्वारा लिखाये गये ' शब्दों में से प्रत्येक को खंडों में बाँटकर उनका अर्थ दिया गया है ।    (  और जाने।  ) 

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LS04, पिंड माहिं ब्रह्मांड ।। Amazing feature of human body ।। मनुष्य शरीर में विश्व ब्रह्मांड दर्शन LS04,  पिंड माहिं ब्रह्मांड ।।  Amazing feature of human body ।।  मनुष्य शरीर में विश्व ब्रह्मांड दर्शन Reviewed by सत्संग ध्यान on 8/11/2020 Rating: 5

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