५३. दया लौट आती है || ब्रह्ममुहूर्त में ध्यान का महत्व: महर्षि मँहीँ परमहंस जी का प्रेरक प्रसंग | Brahmamuhurta
ब्रह्ममुहूर्त में ध्यान का महत्व:
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| ५३. दया लौट आती है |
लगभग १९८१ ई० की बात है। पूज्य गुरुदेव महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट में दिन के भोजनोपरांत अपने हाथ में लाठी लेकर धीरे-धीरे टहल रहे थे। उसी समय एक सत्संगी पूज्य गुरुदेव को प्रणाम करने आये। वे व्यक्ति कुछ दूर से ही अपना माथा टेककर प्रणाम किये और खड़े होकर हाथ जोड़ते हुए बोले- "हुजूर! ध्यान करने में मन लगे, तरक्की हो-इसके लिए दया कीजिए।" यह कहकर वे हाथ जोड़े सामने खड़े रहे। पूज्य गुरुदेव उनको देखते हुए गंभीर स्वर में बोले- "मेरी दया तुम्हारे पास जाती है, तुम सोये रहते हो, तो मेरी दया लौट आती है।" वे व्यक्ति ब्रह्ममुहूर्त में ध्यानाभ्यास नहीं करते थे, सोये रहते थे। वह व्यक्ति अपनी गलती पर पश्चाताप करने लगे। ब्रह्ममुहूर्त और संध्याकाल में सोने से पाप लगता है। जब भगवान श्रीराम चौदह वर्षों के लिए वनवास गए, तब खबर मिलने पर भरत अपने ननिहाल से अयोध्या आए और माँ कौशल्या को प्रणाम कर अनेक प्रकार से शपथ खाने के सिलसिले में बोले थे-
जिसके कहने से भैया राम को वन भेजा गया हो, उसे वही पाप लगे, जो दोनों संध्याओं के समय सोये हुए पुरुष को प्राप्त होता है। जो साधक ब्रह्ममुहूर्त में सचेतता के साथ ध्यानाभ्यास करते हैं, उनके पास महापुरुषों की दया आती है और उनकी दया से वह साधक अपनी साधना में उन्नति करता है। इसलिए हम साधकों को ब्रह्ममुहूर्त में अवश्य जगकर ध्यानाभ्यास करना चाहिए। ~गुरूसेवी स्वामी भागीरथ दास जी महाराज। ∆
गुरु की दया कब लौट आती है?
बात १९८१ ई० की है, कुप्पाघाट आश्रम में पूज्य गुरुदेव टहल रहे थे। एक सत्संगी ने आकर प्रार्थना की— "हुजूर! ध्यान में मन लगे, ऐसी दया कीजिए।"
इस पर गुरुदेव ने एक मर्मस्पर्शी बात कही:
"मेरी दया तुम्हारे पास जाती है, तुम सोये रहते हो, तो मेरी दया लौट आती है।"
यह वाक्य हर उस साधक के लिए चेतावनी है जो पुरुषार्थ किए बिना केवल कृपा पर निर्भर रहना चाहता है। वह व्यक्ति ब्रह्ममुहूर्त (भोर के समय) में अभ्यास करने के बजाय सोता रहता था, जिसके कारण गुरु की आध्यात्मिक शक्ति उस तक नहीं पहुँच पाती थी।
शास्त्र क्या कहते हैं? (दोनों संध्याओं में सोने का पाप)
सनातन धर्म और शास्त्रों में ब्रह्ममुहूर्त और संध्याकाल में सोने को वर्जित माना गया है। वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड में भरत जी ने भी इसका उल्लेख किया है:
श्लोक:
उभे सन्ध्ये शयनस्य यत् पापं परिकल्प्यते।
तच्च पापं भवेत तस्य यस्यार्योऽनुमते गतः ॥
अर्थ: जो पाप दोनों संध्याओं (सुबह और शाम के संधि काल) में सोने वाले व्यक्ति को मिलता है, वही पाप उसे लगे जिसकी सहमति से श्री राम को वन भेजा गया हो। इससे स्पष्ट होता है कि इन समयों में निद्रा आलस्य और आध्यात्मिक पतन का कारण है।
सफल साधक के लिए कुछ सूत्र:
- ब्रह्ममुहूर्त में जागरण: सुबह ४ बजे से ६ बजे का समय साधना के लिए सर्वोत्तम है।
- सचेतता: केवल जागना पर्याप्त नहीं, सजग होकर ध्यानाभ्यास करना आवश्यक है।
- नियमितता: महापुरुषों की दया उन्हीं पर ठहरती है जो नियम के पक्के होते हैं।
निष्कर्ष:
यदि हम चाहते हैं कि गुरु की 'दया' हम पर फलीभूत हो, तो हमें अपने प्रमाद (आलस्य) को त्यागना होगा। जब साधक सजग होता है, तभी वह ईश्वरीय कृपा को आत्मसात कर पाता है।
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| प्रेरक संत-संस्मरण |
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Reviewed by सत्संग ध्यान
on
1/09/2026
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