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शब्दकोष 32 || पुनः से प्रत्याहार तक के शब्दों के शब्दार्थ, व्याकरणिक परिचय और प्रयोग इत्यादि का वर्णन

महर्षि मेँहीँ+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष / प

    प्रभु प्रेमियों ! ' महर्षि मेँहीँ+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोश ' नाम्नी प्रस्तुत लेख में ' मोक्ष - दर्शन ' + 'महर्षि मेँहीँ पदावली शब्दार्थ भावार्थ और टिप्पणी सहित' + 'गीता-सार' + 'संतवाणी सटीक' आदि धर्म ग्रंथों में गद्यात्मक एवं पद्यात्मक वचनों में आये शब्दों के अर्थ लिखे गये हैं । उन शब्दों को शब्दार्थ सहित यहाँ लिखा गया है। ये शब्द किस वचन में किस लेख में प्रयुक्त हुए हैं, उसकी भी जानकारी अंग्रेजी अक्षर तथा संख्या नंबर देकर कोष्ठक में लिंक सहित दिया गया है। कोष्ठकों में शब्दों के व्याकरणिक परिचय भी देने का प्रयास किया गया है और शब्दों से संबंधित कुछ सूक्तियों का संकलन भी है। जो पूज्यपाद लालदास जी महाराज  द्वारा लिखित व संग्रहित  है । धर्मप्रेमियों के लिए यह कोष बड़ी ही उपयोगी है । आईए इस कोष के बनाने वाले महापुरुष का दर्शन करें--

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सद्गुरु महर्षि में और बाबा लाल दास जी
बाबा लालदास जी और सद्गुरु महाराज

महर्षि मेँहीँ+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष


पुनः - प्रत्याहार

 

(पुटी = जिसमें कोई चीज रखी जा सके , खोखली जगह । P01 ) 

पुन : ( सं ० , क्रि ० वि ० ) = फिर , दुबारा , पीछे , बाद ।

पुनरुदय ( सं ० , पुं ० ) = फिर से जन्म या उत्पत्ति । 

पुरट ( सं ० , पुं ० ) = सोना । 

(पुराइय = पूरा कीजिये । P11 ) 

(पुरातन = प्राचीन , पुराना । P06 ) 

(पुसतीन = पुस्तीन , रोएँदार पशुओं की खाल से बना कोट । श्रीचंदवाणी 1क )

पुरुषोत्तम ( सं ० , वि ० ) जो पुरुषों में उत्तम हो , क्षर पुरुष ( जड़ प्रकृति - मंडल ) और अक्षर पुरुष ( चेतन प्रकृति - मंडल ) - दोनों पुरुषों से जो उत्तम हो ( पुं ० ) परमात्मा । 

( पुहप = पुष्प , फूल । नानक वाणी 03  ) 

पूरक ( सं ० वि ० ) पूरा करनेवाला । ( पँ ० ) प्राणायाम की एक क्रिया जिसमें नाक से बाहर की वायु भीतर खींची जाती है ।

पूर्ण ( सं ० , वि ० ) = पूरा , समूचा , सच्चा , भरा हुआ । 

(पूर्णकाम = जिसकी सभी इच्छाएं पूरी हो गई हों ; यहाँ अर्थ है - जो सभी इच्छाओं को पूरा कर दे , पूरण काम । P05 ) 

(पूर्ण धनी = पूरा धनवान्, सर्वसमर्थ, सर्वशक्तिसम्पन्न, सब प्रकार से अपने आपमें पूर्ण । P12 )

पूर्ण ब्रह्म ( सं ० , पुं ० ) = समस्त प्रकृति - मंडलों में व्यापक परमात्मा " का अंश ।  

(पूर्ण भरोसा - पूर्ण रूप से आश्रित होना , पूरा आसरा , पूरी आशा , पूरा विश्वास ; जो परिस्थिति हमारे समक्ष आयी हुई है , वह परमात्मा की भेजी हुई है , उससे हमें कुछ लाभ ही होगा - ऐसा विश्वास रखना । P06 ) 

पूर्ण समाधि ( सं ० , स्त्री ० ) = वह वास्तविक समाधि जिसमें जीव परमात्मा से एकता प्राप्त कर लेता है , योग की वह अवस्था जिसमें जीव और परमात्मा के बीच कोई अन्तर नहीं रह जाता ।

पूर्णता ( सं ० , स्त्री ० = पूरा होने का भाव । 

पूर्व ( सं ० , क्रि ० वि ० ) = पहले । 

{पेखे = देखे, देखता है। ('पेखना' का अर्थ है देखना यह संस्कृत 'प्रेक्षण' का तद्भव रूप है।) P10 }

पृथक्त्व ( सं ० , पुं ० ) = पृथक्ता , अलगाव , अलग होने का भाव ।  

पृथक् ( सं ० , वि ० ) = अलग , भिन्न । 

पृष्ठ ( सं ० , पुं ० ) = पीठ , पन्ने की किसी तरफ का भाग । 

पेखना ( हिं ० , पुं ० ) = तमाशा , खेल । 

पैगाम ( फा ० , पुं ० ) = संदेश ,  खबर , सूचना । 

प्युपिल ( अँ ० , पुं ० ) = शिष्य , छात्र , विद्यार्थी । 

प्रकाण्ड ( सं ० , वि ० ) = बहुत बड़ा । 

प्रकृति ( सं ० , स्त्री ० ) = स्वभाव , परमेश्वर की वह शक्ति ( माया ) जिससे वह विश्व - ब्रह्माण्ड या संसार की रचना करता है , वह तत्त्व जिससे दूसरा कोई पदार्थ बने , जड़ प्रकृति , चेतन प्रकृति ।

प्रकृति के सारे व्याप्य ( पुं ० ) = स्थूल , सूक्ष्म , कारण , महाकारण और कैवल्य - प्रकृति के ये सारे मंडल जिनमें परमात्मा अंश - रूप से व्यापक है । 

(प्रकृति द्वय = दोनों प्रकृतियाँ - जड़ प्रकृति और चेतन प्रकृति । P07

प्रकृति - मंडल ( सं ० , पुं ० ) = जड़ प्रकृति और चेतन प्रकृति के मंडल फैलाव ) जैसे स्थूल , सूक्ष्म , कारण , महाकारण और कैवल्य । 

(प्रचंड = बहुत अधिक , तीत्र , प्रखर , तेज , उग्र , तीक्ष्ण । P04 ) 

{प्रतीक = चिह , वह जिससे किसी की पहचान हो जाए । ( आदिनाद परमात्मा की पहचान करा देता है , इसीलिए वह परमात्मा का प्रतीक कहा जाता है । ) P05 }

प्रत्याहार ( सं ० , पुं ० ) = उलटी दिशा में लौटाकर लाना , योग के आठ अंगों में से एक जिसमें साधना  समय इधर - उधर भागनेवाले मन को लौटा - लौटाकर ध्येय तत्त्व पर स्थिर किया जाता है । 


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    प्रभु प्रेमियों ! संतमत की बातें बड़ी गंभीर हैं । सामान्य लोग इनके विचारों को पूरी तरह समझ नहीं पाते । इस पोस्ट में  पुनः, पुनरुदय, पुरट, पुरुषोत्तम, पूरक, पूर्ण, पूर्ण ब्रह्म, पूर्ण समाधि, पूर्णता, पूर्व, पृथक्त्व, पृथक्, पृष्ठ, पेखना, पैगाम, प्युपिल, प्रकाण्ड, प्रकृति, प्रकृति के सारे व्याप्य, प्रकृति-मंडल, प्रत्याहार  आदि से संबंधित बातों पर चर्चा की गई हैं । हमें विश्वास है कि इसके पाठ से आप संतमत को सहजता से समझ पायेंगे। इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी।




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शब्दकोष 32 || पुनः से प्रत्याहार तक के शब्दों के शब्दार्थ, व्याकरणिक परिचय और प्रयोग इत्यादि का वर्णन शब्दकोष 32  ||  पुनः से  प्रत्याहार   तक के शब्दों के शब्दार्थ, व्याकरणिक परिचय और प्रयोग इत्यादि का वर्णन Reviewed by सत्संग ध्यान on 12/13/2021 Rating: 5

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