अंकगणित (Arithmetic): परिभाषा, अर्थ और आध्यात्मिक महत्व
प्रभु प्रेमियों ! अंकगणित संस्कृत का शब्द है और यह पुलिंग है । इसका मतलब होता है वह शास्त्र जिसमें अंकों के हिसाब से सारी गणनाएं या हिसाब करते हैं। अथवा यह भी कह सकते हैं कि जिसमें अंकों के बारे में सारी जानकारी हो और अंकों से सारी गणनाएं या हिसाब किताब सिखाई जाती हो उसे अंकगणित कहते हैं।
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| अंकगणित क्या है? |
अंकगणित का अर्थ
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अंकगणित ( सं ० , पुं ० ) = वह शास्त्र जिसमें अंकों के आधार पर सारी गणनाएँ या हिसाब होते हैं ।
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अंकगणित ( सं ० , पुं ० ) = वह शास्त्र जिसमें अंकों के आधार पर सारी गणनाएँ या हिसाब होते हैं ।
नमस्ते ! आपके द्वारा दी गई जानकारी बहुत ही सूक्ष्म और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण है। विशेष रूप से 'मोक्ष दर्शन' और महर्षि मेँहीँ परमहंस जी के विचारों का समावेश इसे और भी विशिष्ट बनाता है।
अंकगणित गणित की वह मूलभूत शाखा है जिससे हम सभी का परिचय बचपन में ही हो जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अंकगणित केवल जोड़-घटाव तक सीमित नहीं है? इसका संबंध हमारे जीवन की सटीक गणनाओं और यहाँ तक कि आध्यात्मिक मण्डलों की निश्चितता से भी है।
अंकगणित का शाब्दिक अर्थ (Etymology)
'अंकगणित' शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है और व्याकरण की दृष्टि से यह पुलिंग है। यह दो शब्दों के मेल से बना है:
- अंक: संख्याएँ (Numbers)
- गणित: गणना करना (Calculation)
अर्थात, वह शास्त्र जिसमें अंकों के माध्यम से हिसाब-किताब या गणनाएं की जाती हैं, उसे अंकगणित कहते हैं।
'अंकगणित' शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है और व्याकरण की दृष्टि से यह पुलिंग है। यह दो शब्दों के मेल से बना है:
- अंक: संख्याएँ (Numbers)
- गणित: गणना करना (Calculation)
अर्थात, वह शास्त्र जिसमें अंकों के माध्यम से हिसाब-किताब या गणनाएं की जाती हैं, उसे अंकगणित कहते हैं।
अंकगणित की परिभाषा (Definition of Arithmetic)
साधारण शब्दों में, अंकगणित वह विज्ञान है जिसके अंतर्गत हम अंकों और उनके बीच होने वाली विभिन्न संक्रियाओं (Operations) जैसे—जोड़, घटाव, गुणा और भाग का अध्ययन करते हैं। यह वह आधार है जिस पर संपूर्ण गणित की इमारत टिकी हुई है।
शब्दकोश के अनुसार, यदि हम वर्णमाला के क्रम को देखें, तो 'अंकगणित' शब्द से पहले 'अँचला' शब्द आता है और इसके ठीक बाद 'अंकित' शब्द का स्थान है।
'मोक्ष दर्शन' में अंकगणित का अद्भुत वर्णन
संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज द्वारा रचित अद्भुत ग्रंथ 'मोक्ष दर्शन' में अंकगणित शब्द का प्रयोग बहुत ही गहरे दार्शनिक और वैज्ञानिक संदर्भ में किया गया है।
मोक्ष दर्शन (पैराग्राफ 45) के अनुसार:
"ऊपर का शब्द नीचे दूर तक पहुँचता है और सूक्ष्म अपने से स्थूल में स्वाभाविक ही व्यापक होता है तथा सूक्ष्म धार, स्थूल धार से लम्बी होती है। इन कारणों से प्रत्येक निचले मण्डल के केन्द्र पर से उसके ऊपर के मण्डल के केन्द्रीय शब्द का ग्रहण होना अंकगणित के हिसाब के सदृश ध्रुव निश्चित है।"
( ४५ ) ऊपर का शब्द नीचे दूर तक पहुँचता है और सूक्ष्म अपने से स्थूल में स्वाभाविक ही व्यापक होता है तथा सूक्ष्म धार , स्थूल धार से लम्बी होती है । इन कारणों से प्रत्येक निचले मण्डल के केन्द्र पर से उसके ऊपर के मण्डल के केन्द्रीय शब्द का ग्रहण होना अंकगणित के हिसाब के सदृश ध्रुव निश्चित है । ऊपर कथित शब्दों के अभ्यास से सुरत का नीचे गिरना नहीं हो सकता है ।
संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज द्वारा रचित अद्भुत ग्रंथ 'मोक्ष दर्शन' में अंकगणित शब्द का प्रयोग बहुत ही गहरे दार्शनिक और वैज्ञानिक संदर्भ में किया गया है।
मोक्ष दर्शन (पैराग्राफ 45) के अनुसार:
"ऊपर का शब्द नीचे दूर तक पहुँचता है और सूक्ष्म अपने से स्थूल में स्वाभाविक ही व्यापक होता है तथा सूक्ष्म धार, स्थूल धार से लम्बी होती है। इन कारणों से प्रत्येक निचले मण्डल के केन्द्र पर से उसके ऊपर के मण्डल के केन्द्रीय शब्द का ग्रहण होना अंकगणित के हिसाब के सदृश ध्रुव निश्चित है।"
( ४५ ) ऊपर का शब्द नीचे दूर तक पहुँचता है और सूक्ष्म अपने से स्थूल में स्वाभाविक ही व्यापक होता है तथा सूक्ष्म धार , स्थूल धार से लम्बी होती है । इन कारणों से प्रत्येक निचले मण्डल के केन्द्र पर से उसके ऊपर के मण्डल के केन्द्रीय शब्द का ग्रहण होना अंकगणित के हिसाब के सदृश ध्रुव निश्चित है । ऊपर कथित शब्दों के अभ्यास से सुरत का नीचे गिरना नहीं हो सकता है ।
इस कथन का विश्लेषण
महर्षि मेँहीँ जी यहाँ समझाते हैं कि जिस प्रकार अंकगणित के नियम (जैसे 2 + 2 = 4) अटल और निश्चित होते हैं, उनमें किसी प्रकार का संशय नहीं होता, ठीक उसी प्रकार साधना मार्ग में सूक्ष्म मण्डलों के शब्दों का ग्रहण होना भी एक 'ध्रुव सत्य' यानी निश्चित गणना की तरह है।
यहाँ 'अंकगणित' शब्द का प्रयोग 'निश्चितता' (Certainty) को दर्शाने के लिए किया गया है। यह बताता है कि अध्यात्म केवल भावना नहीं, बल्कि एक सटीक विज्ञान है जिसकी गणनाएँ अंकगणित की तरह ही सटीक हैं।
अंकगणित के प्रमुख आधार (Core Elements)
अंकगणित मुख्य रूप से निम्नलिखित चार स्तंभों पर टिका हुआ है:
- योग (Addition): दो या दो से अधिक अंकों को मिलाना।
- व्यवकलन (Subtraction): एक संख्या में से दूसरी को घटाना।
- गुणन (Multiplication): किसी संख्या को बार-बार जोड़ने की प्रक्रिया।
- भाग (Division): किसी संख्या को बराबर हिस्सों में बाँटना।
दैनिक जीवन और अध्यात्म में अंकगणित की भूमिका
हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण गणनाओं से भरा है। बाजार से सामान खरीदने से लेकर ब्रह्मांड के नक्षत्रों की दूरी मापने तक, हर जगह अंकगणित विद्यमान है।
- व्यावहारिक स्तर पर: बजट बनाना, समय प्रबंधन और व्यापार।
- आध्यात्मिक स्तर पर: जैसा कि महर्षि मेँहीँ जी ने संकेत दिया, जप की संख्या, श्वासों की गिनती और ध्यान की गहराइयों में जाने का क्रम भी एक प्रकार की सूक्ष्म गणना ही है।
हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण गणनाओं से भरा है। बाजार से सामान खरीदने से लेकर ब्रह्मांड के नक्षत्रों की दूरी मापने तक, हर जगह अंकगणित विद्यमान है।
- व्यावहारिक स्तर पर: बजट बनाना, समय प्रबंधन और व्यापार।
- आध्यात्मिक स्तर पर: जैसा कि महर्षि मेँहीँ जी ने संकेत दिया, जप की संख्या, श्वासों की गिनती और ध्यान की गहराइयों में जाने का क्रम भी एक प्रकार की सूक्ष्म गणना ही है।
निष्कर्ष और निवेदन
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क्या आपको यह जानकारी उपयोगी लगी? कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय दें और इस ज्ञान को अन्य साधकों के साथ भी साझा करें। फिर मिलते हैं अगले पोस्ट में। जय गुरु !
Reviewed by सत्संग ध्यान
on
6:27:00 pm
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