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S02. 2. सत्संग में कैसे बैठना चाहिए ? सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज का व्यावहारिक मार्गदर्शन

सत्संग में कैसे बैठना चाहिए? महर्षि मेँहीँ परमहंस जी का व्यावहारिक मार्गदर्शन

सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी सत्संग में भक्तों को बैठने का तरीका बताते हुए।
महर्षि मेँहीँ परमहंस: सत्संग में कैसे बैठें?

S02. 2. सत्संग में कैसे बैठना चाहिए? 

​सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज का हर वचन हमारे जीवन को सरल बनाने वाला है। एक प्रसंग में, अररिया के सत्संग का स्मरण करते हुए, गुरु महाराज ने भक्तों को सत्संग में बैठने का अत्यंत व्यावहारिक तरीका बताया, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है:

"अररिया इलाके में मैं बुलाया गया था। वहाँ एक पुराने सत्संगी थे, अब उनका शरीर नहीं है। मिड्ल स्कूल में सत्संग का प्रबंध था। मैं स्वभावतः अपने जैसा (धीरे-धीरे) बोला। लोग कुछ दूर कुछ नजदीक थे। कुछ सुने, कुछ नहीं सुने, इसलिए लोगो ने हल्ला किया। वहाँ लाउड स्पीकर का प्रबंध नहीं था। उसी प्रकार मैं जोर से नहीं बोल सकता। आपलोग नजदीक-नजदीक बैठिए तो अच्छा है।"

​इन वचनों में गुरु महाराज की कोमलता और भक्तों के प्रति उनकी चिंता स्पष्ट झलकती है। वे चाहते थे कि हर सत्संगी को वाणी का पूरा लाभ मिले। यह सिर्फ लाउडस्पीकर की कमी की बात नहीं थी, बल्कि सत्संग की एकाग्रता और मर्यादा की भी बात थी।

​सत्संग का अर्थ है 'सत्' यानि सत्य के संग बैठना। जब हम नजदीक होकर बैठते हैं, तो वाणी सीधे हृदय तक पहुँचती है। यह शारीरिक समीपता हमें मानसिक और आत्मिक समीपता भी प्रदान करती है। गुरु महाराज का यह मार्गदर्शन हमें सिखाता है कि सत्संग में सिर्फ उपस्थित होना ही नहीं, बल्कि पूरी एकाग्रता और विनय के साथ श्रवण करना भी आवश्यक है। नजदीक बैठना केवल शारीरिक दूरी कम करना नहीं, बल्कि गुरुदेव और वाणी के प्रति अपने समर्पण को गहरा करना है।

​इस प्रकार सत्संग में बैठकर हम न केवल वाणी का पूरा लाभ उठा पाते हैं, बल्कि पूरे वातावरण को भी शांति और श्रद्धा से भर देते हैं।


सत्संग में कैसे बैठना चाहिए? 🙏

"आपलोग नजदीक-नजदीक बैठिए तो अच्छा है।" - सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी के इन वचनों का गहरा अर्थ और सत्संग की सच्ची मर्यादा।

पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें: [https://www.satsangdhyan.com/2026/02/satsang-mein-kaise-baithna-chahiye.html]

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📚 महर्षि मेँहीँ साहित्य सुमनावली 

MS18 . महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1 का मुख्य कवर पृष्ठ ।
          महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर
     MS18 . महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1- 1. महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1 एक ऐसा ग्रंथ है जो मानव जीवन के दु:खों से छुटकारा दिलाने के लिए धर्मग्रंथों, साधु-संतों के वचनों और निजी अनुभूतियों से भरा हुआ है।     2. इस ग्रंथ का मनोयोगपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे उसे मनुष्य शरीर का मिलना सुनिश्चित होता है।     3. शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्म को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, अन्यथा बड़ी हानि होती है।     4. प्रवचनों का पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म संबंधी ठोस और प्रमाणिक जानकारी मिलती है, जिससे उपर्युक्त लाभ अनिवार्य होता है।     5. इस ग्रंथ का प्रथम प्रकाशन वर्ष 2004 में हुआ था और इसमें गुरु महाराज के 323 प्रवचनों का संकलन है, जो ईश्वर, जीव ब्रह्म, साधना आदि आध्यात्मिक विषयों का ज्ञान प्रदान करते हैं। ( और जाने )   

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