संतमत: घर बैठे ईश्वर प्राप्ति और इच्छाओं का संतुलन
प्रभु प्रेमियों ! संतमत का मार्ग हमें एक अद्भुत सत्य से परिचित कराता है: ईश्वर प्राप्ति, मोक्ष और आवागमन से मुक्ति के लिए संसार का त्याग आवश्यक नहीं है। इस सत्संग में घर-बार छोड़ने की बात नहीं कही जाती, बल्कि यह सिखाया जाता है कि आप अपनी कमाई करते हुए और गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं।
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इच्छाओं का संतुलन ही आनंद का रहस्य
संतमत हमें अपनी इच्छाओं को समेटने और उन्हें कम करने की प्रेरणा देता है। इसका सीधा संबंध हमारे आनंद और शांति से है। यदि हम अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करते हुए उन्हें न्यूनतम स्तर पर ले आएं, तो हम जीवन में अधिक आनंदपूर्वक रह सकेंगे। इसके विपरीत, यदि हमारी इच्छाएं बेलगाम बढ़ती जाती हैं, तो संसार की समस्त संपत्ति प्राप्त करने पर भी हमें वास्तविक शांति और संतोष नहीं मिल सकता।
जैसा कि सद्गुरु महाराज ने कहा है:
"संतमत में चलते - चलते ईश्वर को प्राप्त कर लेंगे , मोक्ष प्राप्त होगा और आवागमन से मुक्त हो जाएंगे । इस सत्संग में घर छोड़ने के लिए नहीं कहा जाता । कमाई करके खाओ ।
इच्छाओं को समेटते-समेटते एकदम कम कर दो तो आनंदपूर्वक रह सकोगे । अगर इच्छाओं को बढ़ाओ तो संसार की सब संपत्ति मिलने पर भी शान्ति नहीं मिलेगी ।"
"बसुधा सपत दीप है सागर, कढ़ि कंचनु काढ़ि धरीजै ।।
मेरे ठाकुर के जन इनहु न बांछहि हरिमांगहि हरिरसु दीजै ।।"
आनंदपुर्वक कैसे रह सकते हैं?
इसका अर्थ है कि भले ही संसार के सातों द्वीपों और सागरों से सारा सोना निकाल कर रख दिया जाए, फिर भी मेरे ईश्वर के भक्त इन भौतिक संपत्तियों की लालसा नहीं करते, वे तो केवल हरि-रस (ईश्वरीय आनंद) की याचना करते हैं।
सद्गुरु महाराज ने कहा :
"आनंदपुर्वक कैसे रह सकते हैं? जो इच्छाओं को बढ़ाते हैं , वे इससे दुःख पाते हैं
"भक्ति का मारग झीना रे।
नहिं अचाह नहिं चाहना चरनन लौ लीना रे ॥"
जो लोग अपनी इच्छाओं को बढ़ाते हैं, वे अक्सर इसी से दुखी होते हैं। सच्ची भक्ति का मार्ग अत्यंत सूक्ष्म और कोमल है।
"भक्ति का मारग झीना रे।
नहिं अचाह नहिं चाहना चरनन लौ लीना रे ॥"
यह मार्ग न तो पूर्ण अ-चाह (किसी चीज की कामना न करना) का है और न ही असीमित चाहना का। यह वह मार्ग है जहाँ मन ईश्वर के चरणों में लीन होकर संतुष्ट रहता है, और जहाँ इच्छाएँ संयमित होकर वास्तविक आनंद की ओर ले जाती हैं।
संतमत हमें सिखाता है कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है और अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पाकर ही हम सच्चे अर्थों में आनंदपूर्ण और शांत जीवन जी सकते हैं, भले ही हम संसार में रहते हों।
संतमत: घर बैठे ईश्वर प्राप्ति और इच्छाओं का संतुलन क्या घर-परिवार में रहते हुए भी ईश्वर को पाया जा सकता है? संतमत के अनमोल सिद्धांत जानें, जो आपको आनंद और शांति की राह दिखाते हैं। [https://www.satsangdhyan.com/2026/02/santmat-ishwar-prapti-ichha-santulan.html]
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सत्संग एवं ध्यान कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार हेतु विनम्र निवेदन
📚 महर्षि मेँहीँ साहित्य सुमनावली
MS18 . महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1: 1. महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1 एक ऐसा ग्रंथ है जो मानव जीवन के दु:खों से छुटकारा दिलाने के लिए धर्मग्रंथों, साधु-संतों के वचनों और निजी अनुभूतियों से भरा हुआ है। 2. इस ग्रंथ का मनोयोगपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे उसे मनुष्य शरीर का मिलना सुनिश्चित होता है। 3. शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्म को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, अन्यथा बड़ी हानि होती है। 4. प्रवचनों का पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म संबंधी ठोस और प्रमाणिक जानकारी मिलती है, जिससे उपर्युक्त लाभ अनिवार्य होता है। 5. इस ग्रंथ का प्रथम प्रकाशन वर्ष 2004 में हुआ था और इसमें गुरु महाराज के 323 प्रवचनों का संकलन है, जो ईश्वर, जीव ब्रह्म, साधना आदि आध्यात्मिक विषयों का ज्ञान प्रदान करते हैं। ( और जाने )
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जय गुरु महाराज🙏🙏
Reviewed by सत्संग ध्यान
on
6:27:00 am
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