ॐ (Om) का अर्थ क्या है? महर्षि मेँहीँ शब्दकोश और संतमत के अनुसार आध्यात्मिक रहस्य
प्रभु प्रेमियों ! ॐ केवल एक अक्षर नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है। आध्यात्मिक साधकों के लिए ॐ का महत्व सर्वोपरि है। आज के इस लेख में हम महर्षि मेँहीँ शब्दकोश और संतमत के सिद्धांतों के आधार पर 'ॐ' के गहरे अर्थ और इसके आध्यात्मिक महत्व को समझेंगे।
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| ओंकार क्या है? |
'महर्षि मेँहीँ शब्दकोश' ॐ के अर्थ से शुरू
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ॐ ( सं ० , पुं ० ) =' ओम् ' का एक अक्षरवाला रूप , आदिशब्द जिससे सृष्टि हुई है ।
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ॐ ( सं ० , पुं ० ) =' ओम् ' का एक अक्षरवाला रूप , आदिशब्द जिससे सृष्टि हुई है ।
सद्गुरु महर्षि मेँहीँ का संवाद
सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज ने आदिनाद को ही 'ओम्' कहा है। पद्य में वे कहते हैं—*"ब्रह्मनाद शब्दब्रह्म ओम् वही।"* यह शब्द संपूर्ण सृष्टि में ध्वनित हो रहा है और मुँह के सभी उच्चारण-अवयवों को भरते हुए उच्चरित होता है।
'ओम्, स्फोट ' ॐ शब्द संस्कृत मूल का पुल्लिंग शब्द है। संत-महात्माओं के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में जब केवल परमात्मा थे, तब उनके अंदर एक मौज उठी—'एकोहं बहुस्याम:' (मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊं)। इसी मौज से जो प्रथम शब्द उत्पन्न हुआ, उसे ही "ओम्, आदिनाद या स्फोट" कहा जाता है। इसको विविध संतों ने विविध नामों से अभिव्यक्त किया है। कहीं इसे ही दुर्गा, राम, कृष्ण आदि का रूप भी माना जाता है।
सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज ने आदिनाद को ही 'ओम्' कहा है। पद्य में वे कहते हैं—*"ब्रह्मनाद शब्दब्रह्म ओम् वही।"* यह शब्द संपूर्ण सृष्टि में ध्वनित हो रहा है और मुँह के सभी उच्चारण-अवयवों को भरते हुए उच्चरित होता है।
'ओम्, स्फोट ' ॐ शब्द संस्कृत मूल का पुल्लिंग शब्द है। संत-महात्माओं के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में जब केवल परमात्मा थे, तब उनके अंदर एक मौज उठी—'एकोहं बहुस्याम:' (मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊं)। इसी मौज से जो प्रथम शब्द उत्पन्न हुआ, उसे ही "ओम्, आदिनाद या स्फोट" कहा जाता है। इसको विविध संतों ने विविध नामों से अभिव्यक्त किया है। कहीं इसे ही दुर्गा, राम, कृष्ण आदि का रूप भी माना जाता है।
ॐ का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ
ॐ तीन अक्षरों के मेल से बना है: अ, उ और म। माण्डूक्योपनिषद् के निम्नलिखित श्लोक में त्रय मात्रिक ओंकार (अ, उ, म्) की परब्रह्म परमात्मा से एकता दिखलायी गयी है-
- अ: परमात्मा के विराट रूप का बोधक है, जो विश्व का उपास्य है।
- उ: हिरण्यगर्भ का बोधक है, जो तेजस् का उपास्य है।
- म: ईश्वर बोधक है, जो प्राज्ञ का उपास्य है।
'जागरित स्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽप्ते रादिमत्त्वाद्वाऽऽप्नोति हवै सर्वान्कामा-नादिश्च भवति य एवं वेद ॥९॥'
अर्थात् (ओंकार की (पहली मात्रा अकार ही (समस्त जगत् के नामों में अर्थात् शब्द मात्र में) व्याप्त होने के कारण और आदि वाला होने के कारण जाग्रत की भाँति स्थूल जगत्-रूप शरीरवाला वैश्वानर नामक पहला पाद है। जो इस प्रकार जानता है, वह अवश्य ही सम्पूर्ण भोगों को प्राप्त कर लेता है और सबका आदि (प्रधान) बन जाता है॥९॥
'स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्क-र्षादुभयत्वाद्वोत्कर्षति हवैज्ञानसंतति समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति च एवं वेद ॥१०॥'
अर्थात् (ओंकार की) दूसरी मात्रा 'उ' ('अ' से) उत्कृष्ट होने के कारण और दोनों भाववाला होने के कारण स्वप्न की भाँति सूक्ष्म जगत्-रूप शरीरवाला तैजस नामक दूसरा पाद है। जो इस प्रकार जानता है, वह अवश्य ही ज्ञान की परम्परा को उन्नत करता है और समान भाववाला हो जाता है। इसके कुल में परमात्मा को नहीं जाननेवाला नहीं होता ॥१०॥
सुषुप्त स्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति हवा इदं सर्वमयीतिश्च भवति च एवं वेद॥११॥'
अर्थात् (ओंकार की) तीसरी मात्रा 'म्' ही माप करनेवाला (जाननेवाला) होने के कारण और विलीन करनेवाला होने से सुषुप्ति की भाँति जगत्-रूप शरीरवाला प्राज्ञ नामक तीसरा पाद है। जो इस प्रकार जानता है, वह अवश्य ही इस सम्पूर्ण कारण जगत् को माप लेता है अर्थात् भली भाँति जान लेता है और सबको अपने में विलीन करनेवाला हो जाता है।॥११॥ ( ॐ विवेचन, पृष्ठ 9, 10 और 11 )
ॐ तीन अक्षरों के मेल से बना है: अ, उ और म। माण्डूक्योपनिषद् के निम्नलिखित श्लोक में त्रय मात्रिक ओंकार (अ, उ, म्) की परब्रह्म परमात्मा से एकता दिखलायी गयी है-
- अ: परमात्मा के विराट रूप का बोधक है, जो विश्व का उपास्य है।
- उ: हिरण्यगर्भ का बोधक है, जो तेजस् का उपास्य है।
- म: ईश्वर बोधक है, जो प्राज्ञ का उपास्य है।
ओम् के उच्चारण का नमूना इस वीडियो से समझे
ॐ की व्याकरणिक व्याख्या
संतमत दर्शन के अनुसार, 'ओम्' तीन अक्षरों की संधि से बना है:
- अ (A): इसका उच्चारण कंठ से होता है।
- उ (U): इसका उच्चारण ओष्ठ (होठों) से होता है।
- म् (M): इसका उच्चारण ओष्ठ और नासिका (नाक) से होता है।
जब 'ओ' के आगे '३' लिखा जाता है (**ओ३म्**), तो यह 'प्लुत' स्वर का सूचक है, जिसका अर्थ है कि इसका उच्चारण सामान्य से तीन गुना अधिक समय तक करना चाहिए।
' ओम् ' आदिनाद को कहा गया है । गुरुदेव ने भी आदिनाद को ही ' ओम् ' कहा है ; देखें- ' ब्रह्मनाद शब्दब्रह्म ओम् वही । " ( पद्य - सं ० ५ ) ' ओम् ' अ , उ और म् की संधि से बना हुआ है । अ कंट से , उ ओष्ठ से और म् दोनों ओष्ठों तथा नासिका से उच्चरित होता है । इसे एकाक्षर रूप में ॐ लिखा जाता है । ' ओ ३ म् ' का ३ बतलाता है कि ओ प्लुत है । जिस स्वर का उच्चारण करने में तीन या तीन से अधिक गुणा समय लगे , उसे प्लुत कहते हैं । ' ओ ३ म् ' को ' ओऽम् ' की तरह भी लिखा जाता है । ऽ भी ' ओ ' स्वर के प्लुत होने का सूचक है । साधारण रूप से ' ओ ' का उच्चारण करने में जितना समय लगता है , ' ओ ३ म् ' के ' ओ ' का उच्चारण करने में उससे तीन गुणा समय लगाना चाहिए । इस पद्य में गाते समय ' ओ ३ म् ' का उच्चारण साधारण ढंग से ही किया जाता है ।
प्रातःकालीन नाम संकीर्तन ( अव्यक्त अनादि अनन्त अजय अज .... ) की अंतिम कड़ी ( भजो ॐ ॐ प्रभु नाम यही .... ) में आये ' ओ ३ म् ' का उच्चारण चरण को दुबारा गाते समय हमलोग सही ढंग से करते हैं । आदिनाद सम्पूर्ण सृष्टि में भरपूर होकर ध्वनित हो रहा है । ' ओ ३ म् ' शब्द भी मुँह के सब उच्चारण - अवयवों को भरते हुए उच्चरित होता है । ऐसा दूसरा कोई शब्द नहीं है । इसीलिए ' ओ ३ म् ' को ध्वन्यात्मक आदिनाद का सबसे उत्तम वाचक मान लिया गया है । (संतमत-दर्शन पुस्तक द्वितीय संस्करण के पृ. नं. 80 से)
' ओम् ' अ , उ और म् की संधि से बना हुआ है । अ कंट से , उ ओष्ठ से और म् दोनों ओष्ठों तथा नासिका से उच्चरित होता है । इसे एकाक्षर रूप में ॐ लिखा जाता है । ' ओ ३ म् ' का ३ बतलाता है कि ओ प्लुत है । जिस स्वर का उच्चारण करने में तीन या तीन से अधिक गुणा समय लगे , उसे प्लुत कहते हैं । ' ओ ३ म् ' को ' ओऽम् ' की तरह भी लिखा जाता है । ऽ भी ' ओ ' स्वर के प्लुत होने का सूचक है । साधारण रूप से ' ओ ' का उच्चारण करने में जितना समय लगता है , ' ओ ३ म् ' के ' ओ ' का उच्चारण करने में उससे तीन गुणा समय लगाना चाहिए । इस पद्य में गाते समय ' ओ ३ म् ' का उच्चारण साधारण ढंग से ही किया जाता है ।
'मोक्ष दर्शन' में ओंकार का वर्णन
( ३२ ) परा और अपरा ; युगल प्रकृतियों के बनने के पूर्व ही आदिनाद वा आदि ध्वन्यात्मक शब्द अवश्य प्रकट हुआ । इसी को ॐ , सत्यशब्द , सारशब्द , सत्यनाम , रामनाम , आदिशब्द और आदिनाम कहते हैं। (मोक्ष दर्शन पैराग्राफ 32)
( ३५ ) अव्यक्त से व्यक्त हुआ है अर्थात् सूक्ष्मता से स्थूलता हुई है । सूक्ष्म , स्थूल में स्वाभाविक ही व्यापक होता है । अतएव आदिशब्द सर्वव्यापक है । इस शब्द में योगी जन रमते हुए परम प्रभु सर्वेश्वर तक पहुँचते हैं अर्थात् इस शब्द के द्वारा परम प्रभु सर्वेश्वर का अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) ज्ञान होता है । इसलिए इस शब्द को परम प्रभु का नाम - ' रामनाम ' कहते हैं । यह सबमें सार रूप से है तथा अपरिवर्तनशील भी है । इसीलिए इसको सारशब्द , सत्यशब्द और सत्यनाम भारती सन्तवाणी में कहा है , और उपनिषदों में ऋषियों ने इसको ॐ कहा है । इसीलिए यह आदिशब्द संसार में ॐ कहकर विख्यात है । (मोक्ष दर्शन पैराग्राफ 35)
( ३५ ) अव्यक्त से व्यक्त हुआ है अर्थात् सूक्ष्मता से स्थूलता हुई है । सूक्ष्म , स्थूल में स्वाभाविक ही व्यापक होता है । अतएव आदिशब्द सर्वव्यापक है । इस शब्द में योगी जन रमते हुए परम प्रभु सर्वेश्वर तक पहुँचते हैं अर्थात् इस शब्द के द्वारा परम प्रभु सर्वेश्वर का अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) ज्ञान होता है । इसलिए इस शब्द को परम प्रभु का नाम - ' रामनाम ' कहते हैं । यह सबमें सार रूप से है तथा अपरिवर्तनशील भी है । इसीलिए इसको सारशब्द , सत्यशब्द और सत्यनाम भारती सन्तवाणी में कहा है , और उपनिषदों में ऋषियों ने इसको ॐ कहा है । इसीलिए यह आदिशब्द संसार में ॐ कहकर विख्यात है । (मोक्ष दर्शन पैराग्राफ 35)
सद्गुरु महर्षि मेँहीँ जी के अनुसार ॐ का महत्व
पूज्यपाद सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज के अनुसार, ॐ उस अनाहत नाद का प्रतीक है जो साधना की उच्च अवस्था में सुनाई देता है। संतमत में इसे 'सार शब्द' की ओर ले जाने वाली सीढ़ी माना गया है। महाराज जी ने अपनी पुस्तक 'मोक्ष-दर्शन' और 'पदावली' में ॐ की व्याख्या बहुत ही सूक्ष्म तरीके से की है।
'"ॐ' क्या है? 'ॐ' का विवेचन गम्भीर है। फिर भी, मेरे प्रिय उत्साही लेखक शिष्य ने जो लिखा है, सो प्रशंसनीय है। वस्तुतः 'ॐ' का स्वरूप गहरे ध्यान में ही विदित होने योग्य है। यद्यपि इसका जप भी होता है; परन्तु इसका यथार्थ स्वरूप ध्यान में ही प्राप्त हो सकता है। इन बातों की जानकारी पुस्तक के पाठ करने पर होगी। यह सत्संग में पाठ करने के योग्य है। साथ ही, पाठकगण पुस्तिका को कई बार पढ़ेंगे, तो ठीक-ठीक 'ॐ' के विषय में कुछ अधिक जानकार हो सकेंगे। " 👉 ( ओम् विवेचन पुस्तक के आशीर्वचन से )
पूज्यपाद सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज के अनुसार, ॐ उस अनाहत नाद का प्रतीक है जो साधना की उच्च अवस्था में सुनाई देता है। संतमत में इसे 'सार शब्द' की ओर ले जाने वाली सीढ़ी माना गया है। महाराज जी ने अपनी पुस्तक 'मोक्ष-दर्शन' और 'पदावली' में ॐ की व्याख्या बहुत ही सूक्ष्म तरीके से की है।
'"ॐ' क्या है? 'ॐ' का विवेचन गम्भीर है। फिर भी, मेरे प्रिय उत्साही लेखक शिष्य ने जो लिखा है, सो प्रशंसनीय है। वस्तुतः 'ॐ' का स्वरूप गहरे ध्यान में ही विदित होने योग्य है। यद्यपि इसका जप भी होता है; परन्तु इसका यथार्थ स्वरूप ध्यान में ही प्राप्त हो सकता है। इन बातों की जानकारी पुस्तक के पाठ करने पर होगी। यह सत्संग में पाठ करने के योग्य है। साथ ही, पाठकगण पुस्तिका को कई बार पढ़ेंगे, तो ठीक-ठीक 'ॐ' के विषय में कुछ अधिक जानकार हो सकेंगे। " 👉 ( ओम् विवेचन पुस्तक के आशीर्वचन से )
साधना में ॐ का उपयोग
ॐ का उच्चारण या इसका मानसिक जाप मन को स्थिर करने में सहायक होता है। ध्यानाभ्यास के दौरान जब साधक आंतरिक ध्वनियों को सुनने का प्रयास करता है, तो ॐ की ध्वनि उसे एकाग्रता प्रदान करती है।
निष्कर्ष और निवेदन
मोक्ष-पर्यंत ध्यानाभ्यास कार्यक्रम में सहयोग करने के लिए "सत्संग ध्यान स्टोर" से कुछ अवश्य खरीदें ।
क्या आपको यह जानकारी उपयोगी लगी? कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय दें और इस ज्ञान को अन्य साधकों के साथ भी साझा करें। फिर मिलते हैं अगले पोस्ट में। जय गुरु !
Reviewed by सत्संग ध्यान
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12:22:00 pm
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प्रभु प्रेमियों ! कृपया वही टिप्पणी करें जो आप किसी संतवाणी से प्रूफ कर सके या समझ बनी हो किसी ऐसी बानी का उपयोग न करें जिनसे आपका भी समय खराब हो और हमारा भी जय गुरु महाराज