गृहस्थी और वैराग्य का संग्राम: सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी के विचार
प्रभु प्रेमियों ! सतगुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज अपने प्रवचन में संत कबीर साहब के वचनों का संदर्भ देते हुए कहते हैं कि मन को इच्छारहित बनाना ही साधना का सार है। यह शरीर संसार में अकेला नहीं रह सकता; इसे वस्त्र और भोजन की आवश्यकता होती है। परिवार की जिम्मेदारियों को संभालना कठिन अवश्य है, लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर चुनौतियाँ हर जगह हैं।
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| Maharshi Mehi Spiritual Discourse on Life Paths |
S02: 8. गृहस्थी और वैराग्य का संग्राम
"संत कबीर साहब भी कहते हैं - इच्छारहित मन बने । यह देह संसार में आकर अकेले नहीं रहेगा । इसके लिए कपड़े - भोजन चाहिए । परिवार में लोगों की संभाल बड़ा कठिन है । बाबाजी बन जाओ , स्त्री , पुत्र आदि अगर नहीं हो , शादी नहीं हुई हो तो अकेले ही रहो , जैसे मैं । परंतु दोनों ओर कठिनाइयों के समुद्रों को ही पार करने पड़ते हैं । वा दोनों ओर अग्निकुण्डों में गिरकर ही अपने को सुरक्षित रखना होता है । गृहस्थी में रहना किले के अंदर रहकर लड़ना है , परंतु गृहस्थी छोड़कर रहना , मैदान में रहकर लड़ना है ।
शूर संग्राम को देखि भागै नहीं ।
देख भागै सोइ शूर नाहीं ॥
काम औ क्रोध मद लोभ से जूझना।
मड़ा घमसान तहँ खेत माहिं ।।
साँच औ शील संतोष शाही भये ।
नाम शमशेर तहँ खूब बाजै ॥
कहै कबीर कोई जूझि हैं शूरमा ।
कायराँ भीड़ ता तुरत भाजै ॥
अच्छी बात है कि गृहस्थी में रहकर लोग भजन करें । यदि मेरी निस्वत पूछो कि तुमने गृहस्थी क्यों छोड़ी ? तो जानना चाहिए कि पहले जैसी जानकारी थी , वैसी आजकल नहीं है , बदल गयी है । परंतु जिस व्रत को धारण करना चाहिए , उसको निभाना चाहिए ।
दो कठिन मार्ग: गृहस्थ और साधु
महाराज जी समझाते हैं कि चाहे आप गृहस्थी में रहें या साधु (बाबाजी) बन जाएँ, दोनों ही मार्गों पर कठिनाइयों के समुद्र को पार करना पड़ता है। उन्होंने एक बहुत सुंदर तुलना की है:"गृहस्थी में रहना किले के अंदर रहकर लड़ना है, परंतु गृहस्थी छोड़कर रहना, मैदान में रहकर लड़ना है।"
"गृहस्थी में रहना किले के अंदर रहकर लड़ना है, परंतु गृहस्थी छोड़कर रहना, मैदान में रहकर लड़ना है।"
अर्थात, गृहस्थ जीवन एक सुरक्षा कवच की तरह है जहाँ रहकर आप विकारो से लड़ते हैं, जबकि वैराग्य का मार्ग खुले मैदान की लड़ाई जैसा है जहाँ प्रहार सीधे होते हैं।
शूरवीर की पहचान
कबीर साहब के शब्दों में असली शूरवीर वह है जो विकारों के युद्ध से भागता नहीं:
शूर संग्राम को देखि भागै नहीं। देख भागै सोइ शूर नाहीं ॥
काम औ क्रोध मद लोभ से जूझना। मड़ा घमसान तहँ खेत माहिं ।।
साँच औ शील संतोष शाही भये। नाम शमशेर तहँ खूब बाजै ॥
कहै कबीर कोई जूझि हैं शूरमा। कायराँ भीड़ ता तुरत भाजै ॥
असली युद्ध काम, क्रोध, मद और लोभ से लड़ना है। इसमें सत्य, शील और संतोष ही हमारे असली शस्त्र हैं।
निष्कर्ष: जहाँ हैं, वहीं भजन करें
महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज कहते हैं कि यह बहुत अच्छी बात है कि लोग गृहस्थी में रहकर ही ईश्वर का भजन करें। उन्होंने अपने जीवन के निर्णय पर भी प्रकाश डाला कि समय के साथ जानकारियाँ और अनुभव बदलते हैं, परंतु मुख्य बात यह है कि जिस भी व्रत या मार्ग को धारण किया जाए, उसे पूरी निष्ठा के साथ निभाना चाहिए।
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सत्संग एवं ध्यान कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार हेतु विनम्र निवेदन
📚 महर्षि मेँहीँ साहित्य सुमनावली
MS18 . महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1: 1. महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1 एक ऐसा ग्रंथ है जो मानव जीवन के दु:खों से छुटकारा दिलाने के लिए धर्मग्रंथों, साधु-संतों के वचनों और निजी अनुभूतियों से भरा हुआ है। 2. इस ग्रंथ का मनोयोगपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे उसे मनुष्य शरीर का मिलना सुनिश्चित होता है। 3. शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्म को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, अन्यथा बड़ी हानि होती है। 4. प्रवचनों का पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म संबंधी ठोस और प्रमाणिक जानकारी मिलती है, जिससे उपर्युक्त लाभ अनिवार्य होता है। 5. इस ग्रंथ का प्रथम प्रकाशन वर्ष 2004 में हुआ था और इसमें गुरु महाराज के 323 प्रवचनों का संकलन है, जो ईश्वर, जीव ब्रह्म, साधना आदि आध्यात्मिक विषयों का ज्ञान प्रदान करते हैं। ( और जाने )
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जय गुरु महाराज🙏🙏
Reviewed by सत्संग ध्यान
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8:04:00 am
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