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S02: 10. ईश्वर की पहचान: इन्द्रियातीत ज्ञान और आत्म-साधना -सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज

ईश्वर की पहचान: इन्द्रियातीत ज्ञान और आत्म-साधना

​प्रभु प्रेमियों ! सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज अपने प्रवचन में ईश्वर की गूढ़ प्रकृति और उसे जानने के मार्ग पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं कि हम परमात्मा, ईश्वर की स्थिति को मानते हैं, और यह केवल संतों के मानने के कारण नहीं, बल्कि हमें स्वयं उस पर विश्वास है। हम बचपन से ही घरों में 'राम-राम', 'वाह गुरु' जैसे शब्द सुनते और कहते आए हैं, और यह श्रद्धा मिट नहीं सकती।

Maharshi Mehi Paramhans meditating, surrounded by spiritual symbols representing unseen divine
Inner Realization of God through Santmat.
.

इन्द्रियातीत ज्ञान और आत्म-साधना

    गुरु ​महाराज जी समझाते हैं कि बचपन में राम-राम कहते थे, किंतु परमात्मा पदार्थ रूप में कैसा है, क्या है, यह ज्ञान हमें सत्संग से ही मिलता है। जो लोग ईश्वर के अस्तित्व से इनकार करते हैं, वह बात हमें आश्चर्यचकित करती है। वेद-पुराण और संतों की वाणी में एक ही मत है: ईश्वर को जानकर जानना और पहचानकर जानना आवश्यक है।
"    अभी आपलोग ईश्वर के विषय में सुन रहे हैं । परमात्मा , ईश्वर है । उसकी स्थिति को हमलोग मानते हैं । संत मानते हैं , इसलिए हम मानते हैं , ऐसा नहीं । हमें तो विश्वास है । घर - घर में बचपन से राम - राम , वाह गुरु आदि कहते आए हैं । यह श्रद्धा नहीं मिट सकती । राम - राम तो बच्चे में कहते थे , किंतु पदार्थ रूप में परमात्मा कैसा है , क्या है , यह सत्संग से जाना जाता है । कोई कहते हैं कि ईश्वर नहीं है तो आश्चर्य मालूम होता है । वेद - पुराण संत की वाणी में एक राय यह है कि ईश्वर को जानकर जानना और पहचानकर जानना । ईश्वर इन्द्रिय से जानने योग्य नहीं है । हाथ - पैर से नहीं जानेंगे , स्वाद , गंध आदि मालूम ही नहीं होगा । किंतु वह बिन पावन की राह है , बिन बस्ती का देश । 
बस्ती न शुन्यं शुन्यं न बस्ती , अगम अगोचर ऐसा । गगन शिखर महिं बालक बोलहिं , वाका नाँव धरहुगे कैसा ।। 
    बस्ती या शून्य , देश या काल , इन्द्रिय - ज्ञान में है । जो इन्द्रिय - ज्ञान से ऊपर है , उसके लिए मालूम होता है , जैसे हई नहीं है । वेद में आया है कि आत्मा से आत्मा जाना जाता है । आँख , कान दोनों इन्द्रियाँ हैं , किंतु एक का ज्ञान दूसरे के द्वारा नहीं हो सकता । उसी प्रकार मन - बुद्धि के द्वारा उस परमात्मा को नहीं जान सकते । अपने से ही जानेंगे अपने को इन्द्रिय से रहित करके । गोरख , नानक , कबीर ; सबकी वाणी में यही कहा गया है कि इन्द्रियों से नहीं , आत्मा से जानेंगे । तभी अन्तर साधना सफल है 
।"

​इंद्रियों से परे ईश्वर का स्वरूप

​महर्षि जी स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर इंद्रियों से जानने योग्य नहीं है। हम उसे हाथ-पैर से नहीं जान सकते, न ही उसका कोई स्वाद या गंध मालूम होगा। वह "बिन पावन की राह है, बिन बस्ती का देश।"

​कबीर साहब की वाणी में यह गूढ़ रहस्य और भी स्पष्ट होता है:

"बस्ती न शुन्यं शुन्यं न बस्ती, अगम अगोचर ऐसा।

गगन शिखर महिं बालक बोलहिं, वाका नाँव धरहुगे कैसा ।।"

​यह कहता है कि ईश्वर न तो बस्ती में है और न शून्य में, वह इतना अगम और अगोचर (इंद्रियों से परे) है कि उसका नाम रखना भी कठिन है। बस्ती या शून्य, देश या काल, ये सभी इंद्रिय-ज्ञान के दायरे में आते हैं। जो कुछ इंद्रिय-ज्ञान से ऊपर है, वह हमें ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह है ही नहीं।

​आत्मा से आत्मा को जानना

​वेद में कहा गया है कि आत्मा से आत्मा जाना जाता है। जैसे आँख और कान दोनों इंद्रियाँ हैं, किंतु एक का ज्ञान दूसरे के द्वारा नहीं हो सकता (आँख से सुना नहीं जा सकता, कान से देखा नहीं जा सकता), उसी प्रकार मन और बुद्धि के द्वारा उस परमात्मा को नहीं जान सकते।

​हम उसे अपने आप से ही जानेंगे, अपनी इंद्रियों से रहित करके। गोरख, नानक, और कबीर जैसे सभी संतों की वाणी में यही संदेश दिया गया है कि ईश्वर को इंद्रियों से नहीं, बल्कि आत्मा से जानना है। यही अंतर साधना की सफलता है।


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ईश्वर की पहचान: इन्द्रियातीत ज्ञान और आत्म-साधना क्या ईश्वर को इंद्रियों से जाना जा सकता है? महर्षि मेँहीँ परमहंस जी के प्रवचन से जानें परमात्मा को पहचानने का गूढ़ रहस्य। [https://www.satsangdhyan.com/2026/02/maharshi-mehi-ishwar-pahchan-aatma-sadhana.html#gsc.tab=0]

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📚 महर्षि मेँहीँ साहित्य सुमनावली 

MS18 . महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1 का मुख्य कवर पृष्ठ ।
          महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर
     MS18 . महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1:  1. महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1 एक ऐसा ग्रंथ है जो मानव जीवन के दु:खों से छुटकारा दिलाने के लिए धर्मग्रंथों, साधु-संतों के वचनों और निजी अनुभूतियों से भरा हुआ है।     2. इस ग्रंथ का मनोयोगपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे उसे मनुष्य शरीर का मिलना सुनिश्चित होता है।     3. शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्म को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, अन्यथा बड़ी हानि होती है।     4. प्रवचनों का पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म संबंधी ठोस और प्रमाणिक जानकारी मिलती है, जिससे उपर्युक्त लाभ अनिवार्य होता है।     5. इस ग्रंथ का प्रथम प्रकाशन वर्ष 2004 में हुआ था और इसमें गुरु महाराज के 323 प्रवचनों का संकलन है, जो ईश्वर, जीव ब्रह्म, साधना आदि आध्यात्मिक विषयों का ज्ञान प्रदान करते हैं। ( और जाने )   

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जय गुरु महाराज🙏🙏

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