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शब्दकोष 28 || नियमित से निर्मल तक के शब्दों के शब्दार्थ, व्याकरणिक परिचय और प्रयोग इत्यादि का वर्णन

महर्षि मेँहीँ+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष /

     प्रभु प्रेमियों ! ' महर्षि मेँहीँ+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोश ' नाम्नी प्रस्तुत लेख में ' मोक्ष - दर्शन ' + 'महर्षि मेँहीँ पदावली शब्दार्थ भावार्थ और टिप्पणी सहित' + 'गीता-सार' + 'संतवाणी सटीक' आदि धर्म ग्रंथों में गद्यात्मक एवं पद्यात्मक वचनों में आये शब्दों के अर्थ लिखे गये हैं । उन शब्दों को शब्दार्थ सहित यहाँ लिखा गया है। ये शब्द किस वचन में किस लेख में प्रयुक्त हुए हैं, उसकी भी जानकारी अंग्रेजी अक्षर तथा संख्या नंबर देकर कोष्ठक में लिंक सहित दिया गया है। कोष्ठकों में शब्दों के व्याकरणिक परिचय भी देने का प्रयास किया गया है और शब्दों से संबंधित कुछ सूक्तियों का संकलन भी है। जो पूज्यपाद लालदास जी महाराज  द्वारा लिखित व संग्रहित  है । धर्मप्रेमियों के लिए यह कोष बड़ी ही उपयोगी है । आईए इस कोष के बनाने वाले महापुरुष का दर्शन करें--

नाई - नियम  तक के शब्दों का अर्थ पढ़ने के लिए   👉  यहां दवाएं

सद्गुरु महर्षि में और बाबा लाल दास जी
बाबा लालदास जी और सद्गुरु महाराज


महर्षि मेँहीँ+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष


नियमित - निर्मल

 

नियमित ( सं ० वि ० ) = नियमपूर्वक ,  नियम के साथ , नियम से बँधा हुआ । 

निरंजन ( सं ० वि ० ) = अंजन रहित , माया - रहित ।

( निरन्तरि = निरंतर , लगातार , एक समान , बिना अवकाश छोड़े ।नानक वाणी 03 ) 

(निरत= संलग्न ; यहाँ अर्थ है संलग्नता । ( सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज ने अपनी पुस्तक ' सन्तवाणी सटीक ' में सन्तवाणियों में आये ' निरत ' का अर्थ प्रायः संलग्नता ही किया है । ) P01 ) 

निराकार ( सं ० वि ० ) = आकार रहित , रूप - रहित , स्थूल दृष्टि और सूक्ष्म दृष्टि से भी नहीं दिखलायी पड़नेवाला ( पुं ० ) जो पदार्थ स्थूल दृष्टि और सूक्ष्म दृष्टि से भी दिखलायी नहीं पड़े । 

(निरास = निराशा , सांसारिक पदार्थों से सुख पाने की इच्छा न रखना ।   श्रीचंदवाणी 1क  

निरीह ( स ० वि ० ) इच्छा - रहित , चेष्टा रहित , क्रिया - रहित ।

निरुपाधिक ( सं ० , वि ० ) = उपाधि -रहित , गुण - रहित , त्रयगुण रहित , निर्गुण , बाधा - रहित , माया - रहित । 

निरोध ( सं ० , पुं ० ) = रोक . रुकावट , नियंत्रण । 

(निर्गुण = गुण - रहित , जो त्रय गुणों ( सत्त्व , रज और तम ) सं विहीन हो , चेतन प्रकृति । P01 )

निर्गुण अनामी ( सं ० , वि ० ) = जो त्रय गुण - रहित और शब्द - विहीन हो । ( पुं ० ) परम प्रभु परमात्मा । 

निर्गुण - उपासक ( सं ० वि ० ) = त्रयगुण रहित आदिशब्द का ध्यानाभ्यास करनेवाला , त्रयगुण रहित परमात्मा की उपासना या भक्ति करनेवाला । 

निर्गुण - उपासना ( सं ० , स्त्री ० ) = त्रयगुण - रहित आदिशब्द का ध्यानाभ्यास , जयगुण - रहित परमात्मा की भक्ति ।  

निर्गुण नाद ( सं ० , पुं ० ) = वह ध्वन्यात्मक शब्द जो त्रय गुणों से विहीन है , सारशब्द , आदिनाद ।

निर्गुण नाम ( सं ० , पुं ० ) = परमात्मा का त्रयगुण  रहित ध्वन्यात्मक नाम , सारशब्द , ओंकार , आदिनाद । 

निर्गुण - निराकार ( सं ० , वि ० ) = त्रय गुण रहित और आकार ( रूप ) रहित । ( पुं ० ) सारशब्द , आदिनाद , परमात्मा । 

निर्गुण निराकार - उपासना ( सं ० , स्त्री ० ) = सारशब्द का ध्यान । ( ध्वन्यात्मक सारशब्द त्रयगुण रहित और रूप - रहित है । ) 

निर्गुण ब्रह्म ( सं ० , पुं ० ) = त्रय गुण - रहित चेतन प्रकृति मंडल में व्याप्त परमात्म - अंश , निर्गुण शब्दब्रह्म , आदिनाद , परमात्मा।

निर्गुण रामनाम ( सं ० , पुं ० ) = त्रय गुण - रहित सर्वव्यापक शब्द , आदिशब्द । 

निर्गुण रूप ( सं ० , पुं ० ) = वह रूप जो त्रय गुण - विहीन हो ।

निर्णय ( सं ० , पुं ० ) = फैसला , तय , बुद्धि विचार के द्वारा निश्चित की गयी कोई बात । 

निर्मल ( सं ० , वि ० ) = मल - रहित , शुद्ध । 

(निर्मल ( नि : + मल ) = मल - रहित , पवित्र , पवित्र करनेवाला । P139 ) 

निर्मल चैतन्य - परधाम    तक के शब्दों का अर्थ पढ़ने के लिए   👉  यहां दवाएं



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शब्दकोष 28 || नियमित से निर्मल तक के शब्दों के शब्दार्थ, व्याकरणिक परिचय और प्रयोग इत्यादि का वर्णन शब्दकोष 28 ||  नियमित  से  निर्मल  तक के शब्दों के शब्दार्थ, व्याकरणिक परिचय और प्रयोग इत्यादि का वर्णन Reviewed by सत्संग ध्यान on 12/13/2021 Rating: 5

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