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शब्दकोष-02 अक्षर - अतिरिक्त तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष

 संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष / अ

     प्रभु प्रेमियों ! ' संतमत+ मोक्ष - दर्शन का शब्दकोश ' नाम्नी प्रस्तुत लेख में ' मोक्ष - दर्शन ' + 'महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ भावार्थ और टिप्पणी सहित' + 'गीता-सार' + 'संतवाणी सटीक' आदि धर्म ग्रंथों में गद्यात्मक एवं पद्यात्मक वचनों में आये शब्दों के अर्थ लिखे गये हैं . कोष्ठकों में शब्दों के व्याकरणिक परिचय भी देने का प्रयास किया गया है और शब्दों से संबंधित कुछ सूक्तियों का संकलन किया गया है. जो पूज्यपाद लालदास जी महाराज द्वारा लिखित व संग्रहित  है । धर्मप्रेमियों के लिए यह कोष बड़ी ही उपयोगी है । आईए इस कोष के बनाने वाले महापुरुष का दर्शन करें.

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सद्गुरु महर्षि मेंही और बाबा लाल दास जी
बाबा लालदास जी और गुरुदेव

अक्षर - अतिरिक्त   तक के शब्दों के शब्दार्थ आदि


अक्षर - अतिरिक्त


अक्षर (सं., वि. ) = जो क्षर ( विनाशशील या परिवर्तनशील )  नहीं हो , अविनाशी , परिवर्त्तन रहित , विनाश रहित । (पुं.) चेतन प्रकृति । 

अखंड ( सं ०, वि ० ) = अंश रहित , अवयव रहित , जिसका खंडन ( नाश ) नहीं किया जा सके , अविनाशी । 

अखिल ( सं ० , वि ० ) = समस्त , सब , पूरा । 

अगम ( सं ० वि ० ) = जहाँ तक किसी भी इन्द्रिय की पहुँच नहीं हो , जहाँ जाना कठिन हो । ( पुं ० )  परमात्मा । 

अगुण ( सं ० वि ० ) = गुण - रहित , निर्गुण ; सत्त्व , रज तथा तम- प्रकृति के इन तीनों गुणों से रहित । ( पुं ० ) परमात्मा , चेतन प्रकृति , आदिनाद । 

अगुण ब्रह्म ( सं ० , पुं ० ) = निर्गुण ब्रह्म , परमात्मा , त्रय गुण - रहित चेतन प्रकृति में या त्रय गुण - रहित आदिनाद में व्यापक परमात्मा का अंश । 

अगोचर ( सं ० , वि ० ) = निर्विषय , जो किसी इन्द्रिय का विषय नहीं हो , किसी इन्द्रिय से नहीं जाननेयोग्य । 

अगोचर नाम ( सं ० , पुं ० ) = जिस शब्द का सुनना कान के द्वारा नहीं हो , अनहद नाद , ध्वन्यात्मक सारशब्द । 

अचित् ( सं ० , वि ० ) = चेतना-विहीन , जड़ ( पुं ० ) जड़ पदार्थ ।

अचिन्त्य ( सं ० , वि ० ) = चिन्तन नहीं करने के योग्य , जो मन बुद्धि आदि भीतरी इन्द्रियों की पकड़ में नहीं आ सके । ( पँ ० ) परमात्मा । 

अज ( सं ० , वि ० ) = अजन्मा , जन्म रहित , उत्पत्ति - रहित , जो किसी से उत्पन्न नहीं हुआ हो । 

अजर नाम ( सं ० , पुं ० ) = परमात्मा का वह ध्वन्यात्मक नाम जिसमें कभी परिवर्त्तन या बदलाव नहीं होता , ध्वन्यात्मक सारशब्द । 

अजीत ( सं ० अजित , वि ० ) = अजेय , जो किसी के द्वारा जीता नहीं जा सके । 

अटूट ( हिं ० वि ० )  = जो टूटा हुआ नहीं हो , जो अलग नहीं हो , जुड़ा हुआ , सटा हुआ , मिला हुआ । 

अणु से अणु रूप ( पुं ० )= परमात्मा का छोटे - से - छोटा रूप , शरीर के अन्दर दृष्टियोग के साधक को दिखलायी पड़नेवाले ज्योतिर्मय विन्दु । 

अणुता ( सं ० , स्त्री ० )= अणु होने का भाव , छोटा होने का भाव , छोटाई । 

अतएव ( सं ० , अव्य ० ) = इसीलिए , इसी कारण से , इसी से ।

अति ( सं ० , वि ० ) = अत्यन्त ,  बहुत , बहुत अधिक । 

अतिरिक्त ( सं ० , वि ० ) = बचा हुआ, शेष, अलग । ( क्रि० वि० ) छोड़कर, शिवा, अलावा ।∆


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     प्रभु प्रेमियों ! संतमत की बातें बड़ी गंभीर हैं । सामान्य लोग इसके विचारों को पूरी तरह समझ नहीं पाते । इन पोस्टों  में संत , संतमत , संतमत की उपयोगिता , जड़ प्रकृति , चेतन प्रकृति , आदिनाद , सृष्टि - क्रम , सृष्टि के मंडल , जीव , ब्रह्म , ईश्वर , परमेश्वर , ईश्वर की भक्ति , परम मुक्ति , संतमत की साधना - पद्धतियों ( मानस जप , मानस ध्यान , दृष्टियोग तथा शब्द - साधना ) , साधना - पद्धतियों के अभ्यास से उत्पन्न अनुभूतियों , सद्गुरु की महत्ता , यम - नियम , साधकों के आहार - विहार , सत्संग आदि से संबंधित बातों पर चर्चा की गई हैं । '



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शब्दकोष-02 अक्षर - अतिरिक्त तक के शब्दों के शब्दार्थादि || संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष शब्दकोष-02   अक्षर - अतिरिक्त    तक के शब्दों के शब्दार्थादि  ||  संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोष   Reviewed by सत्संग ध्यान on 12/06/2021 Rating: 5

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