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मोक्ष दर्शन (106-107) ब्रह्म के निर्गुण निराकार की भक्ति से परम कल्याण ।। सद्गुरु महर्षि मेंहीं

सत्संग योग भाग 4 (मोक्ष दर्शन) / 13

प्रभु प्रेमियों ! भारतीय साहित्य में वेद, उपनिषद, उत्तर गीता, भागवत गीता, रामायण आदि सदग्रंथों का बड़ा महत्व है। इन्हीं सदग्रंथों, प्राचीन और आधुनिक संतो के विचारों को संग्रहित करकेे 'सत्संग योग' नामक पुस्तक की रचना हुई है। इसमें सभी पहुंचे हुए संत-महात्माओं के विचारों में एकता है, इसे प्रमाणित किया है और चौथे भाग में इन विचारों के आधार पर और सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की अपनी साधनात्मक अनुभूतियों से जो अनुभव ज्ञान हुआ है, उसके आधार पर मनुष्यों के सभी दुखों से छूटने के उपायों का वर्णन किया गया है। इसे मोक्ष दर्शन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें ध्यान योग से संबंधित बातों को अभिव्यक्त् करने के लिए पाराग्राफ नंंबर दिया गया हैैैै । इन्हीं पैराग्राफों में से  कुुछ पैराग्राफों  के बारे  में  जानेंगेेेे ।


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गुरुदेव महर्षि मेंहीं के विविध रूप

ब्रह्म के निर्गुण निराकार की भक्ति से परम कल्याण

     प्रभु प्रेमियों  ! संतमत के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज इसमें ओम् के संबंध में उपनिषद, स्वामी विवेकानंद, श्रीभूमानन्दजी आदि संतों के विचार, भक्त दो प्रकार होते हैं, निर्गुण और सगुण भक्ति में पहले सगुण भक्ति, फिर निर्गुण निराकार की भक्ति है, गोस्वामी तुलसीदास और संत सूरदास जी महाराज केवल सगुन उपासक ही नहीं थे, कुछ संतो के भक्ति संबंधी महत्वपूर्ण पद,om ke sambandh mein upanishad, svaamee vivekaanand, shreebhoomaanandajee aadi santon ke vichaar, bhakt do prakaar hote hain, nirgun aur sagun bhakti mein pahale sagun bhakti, phir nirgun niraakaar kee bhakti hai, gosvaamee tulaseedaas aur sant sooradaas jee mahaaraaj keval sagun upaasak hee nahin the, kuchh santo ke bhakti sambandhee mahatvapoorn pad. इत्यादि बातों के बारे में बताते हुए कहते हैं कि-


मोक्ष दर्शन (106-107) 


( १०६ ) ॐ के बारे में विशेष जानकारी के लिए भाग पहले  में श्वेताश्वतरोपनिषद् अध्याय १ , श्लोक ७ के अर्थ के नीचे लिखित टिप्पणी में पढ़िये तथा भाग २ , पृष्ठ २६१ में स्वामी विवेकानन्दजी महाराज का वर्णन पढ़िए और ॐ को आदि सारशब्द नहीं मानना , इसे केवल त्रिकुटी का ही शब्द मानना , किस तरह अयुक्त है , सो इसी भाग , पृ ० ३१२ , पारा ७१ में पढ़िये तथा भाग ३ , पृष्ठ २९३ में स्वामी श्रीभूमानन्दजी महाराज का वर्णन पढ़िये । 

( १०७ ) यह बात युक्तियुक्त नहीं है कि कोई भक्त केवल निर्गुण ब्रह्म के , कोई केवल सगुण बह्म के और कोई केवल सगुण - निर्गुण के परे अनामी पुरुष के उपासक होते हैं । निर्गुण, अनामी , मायातीत , अव्यक्त , अगोचर , अलख , अगम और अचिन्त्य अर्थात् इन्द्रिय , मन और बुद्धि के परे है । उपासना का आरम्भ मन से ही होगा । अतएव आरम्भ में ही निर्गुण की उपासना नहीं हो सकेगी और अनामी तो साध्य वा प्राप्य है , साधन नहीं है , निर्गुण - उपासना से यह प्राप्त होता है ( देखिये - भाग ४ , पृष्ठ ३१० , पारा ६२-६३ ) । उपासना का आरम्भ होगा सगुण से ही , पर उपासक पारा संख्या ५ ९ , ६० , ६१ , ६२ में किये गये वर्णनों के अनुसार बढ़ते - बढ़ते निर्गुण- उपासक होकर अन्त में अनामी ( शब्दातीत ) पुरुषोत्तम को प्राप्त कर कृत - कृत्य हो जाएगा । इसके लिए भाग २ में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक महोदय के वचन भी पृष्ठ २४२ से २४५ तक पढ़ने योग्य है । सन्त कबीर साहब और गुरु नानक साहब और इनके ऐसे सन्तों को केवल निर्गुण - उपासक और गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराज तथा श्रीसूरदासजी महाराज को केवल सगुण - उपासक जानना भूल है ; क्योंकि कबीर साहब और गुरु नानक साहब गुरु - मूर्ति का ध्यान भी बतलाते हैं , जो स्थूल सगुण - उपासना ही हुई । ( देखिये भाग २ , पृष्ठ १२० , स्थूल - ध्यान और पृष्ठ १५२ ) और गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज जहाँ सगुण राम की प्रेममयी कथा और भव्य माहात्म्य को बहुत सुन्दर विस्तार - पूर्वक अपने ' रामचरितमानस ' में गाते हैं , वहाँ उसी में , दोहावली में और विनय - पत्रिका में वे राम के निम्नलिखित स्वरूप का भी वर्णन करते हैं । वे राम को तुरीयावस्था में पहुँचकर भजने के लिए कहते हैं , पुनः देशकालातीत और अतिशय द्वैत - वियोगी पद का तथा उसके महत्त्व का वर्णन कर , भक्त को अन्तर - मार्गी बन , वहाँ तक पहुँचकर संशयों को निर्मूल कर नष्ट कर देने के लिए कहते हैं । वे रामनाम को अकथ तथा निर्गुण भी कहते हैं ; यथा
एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानन्द पर धामा
 सोरठा- राम स्वरूप तुम्हार , वचन अगोचर बुद्धि पर । अविगत अकथ अपार , नेति नेति नित निगम कह ॥ 

॥ चौपाई ॥ 

जग पेखन तुम देखनिहारे । विधि - हरि सम्भु नचावनिहारे ।। तेउ न जानहिं मरम तुम्हारा । और तुमहिं को जाननहारा ।। सोइ जानहि जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहिं तुम्हइ होइ जाई । चिदानन्दमय देह तुम्हारी । विगत विकार जान अधिकारी ॥ नर तनु धरेउ सन्त सुर काजा । करहु कहहु जस प्राकृत राजा ।। 

॥चौपाई ॥ 

जो माया सब जगहिं नचावा । जासु चरित लखि काहु न पावा ॥ सो प्रभु भ्रू विलास खगराजा । नाच नटी इव सहित समाजा ॥ सोइ सच्चिदानन्द घन रामा । अज विज्ञान रूप बल धामा । व्यापक व्याप्य अखण्ड अनन्ता । अखिल अमोघ सक्ति भगवन्ता ॥ अगुन अदभ्र गिरा गोतीता । सबदरसी अनवद्य अजीता । निर्मल निराकार निर्मोहा । नित्य निरंजन सुख सन्दोहा ।। प्रकृति पार प्रभु सब उर वासी । ब्रह्म निरीह विरज अविनासी ॥ इहाँ मोह कर कारन नाहीं । रवि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ॥ 

दो०- भगत हेतु भगवान प्रभु , राम धरेउ तनु भूप । किये चरित पावन परम , प्राकृत नर अनुरूप ॥ यथा अनेकन भेष धरि , नृत्य करै नट कोइ । सोइ सोइ भाव देखावइ , आपुन होड़ न सोइ ॥ 

दो०- निर्गुन रूप सुलभ अति , सगुन जान नहिं कोइ । सुगम अगम नाना चरित , सुनि मुनि मन भ्रम होइ -रामचरितमानस 

दो०- हिय निर्गुन नयनन्हि सगुन , रसना राम सुनाम । मनहु पुरट सम्पुट लसत , तुलसी ललित ललाम || -दोहावली 

राम - नाम निर्गुण और अकथ है , इसके वर्णन की चौपाइयों को पृष्ठ २ ९९ , पारा ४ में देखिये और नाम के विशेष वर्णन को जानने के लिए इसी चौथे भाग के पृष्ठ ३०२ , पारा ३५ और पृष्ठ ३०८ , पारा ५८ को पढ़िये । इन बातों से प्रकट है कि गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज आन्तरिक आदि निर्गुण नाद के भी ज्ञाता और उपासक थे । इस अन्तिम उपासना के बिना कोई अद्वैत , देश - कालातीत , अनाम पद तक पहुँचे , सम्भव नहीं है । यदि इस उपासना के बिना ही कथित अद्वैत पद तक किसी अन्य उपासना से भी पहुँच हो , तो नादानुसंधान वा सुरत शब्द - योग की विशेषता नहीं मानने योग्य है और नादानुसंधान की विशेषता मिटते ही सन्तमत की भी विशेषता मिट जायगी ; परन्तु ऐसा होना युक्तिवाद के अनुकूल नहीं है , इसलिए यह सम्भव नहीं । गो ० तुलसीदासजी महाराज तुरीयावस्था प्राप्त कर राम का भजन करने और अपने अन्तर में ही राम को प्राप्त करने के लिए भी बतलाते हैं । इसके लिए भाग २ , पृष्ठ २०८ से २१० तक में लिखित उनकी विनय - पत्रिका के इन पद्यों को पूरा - पूरा पढ़िये- 
( १ ) रघुपति भगति करत कठिनाई सकल दृस्य निज उदर मेलि सोवइ निद्रा तजि योगी । सोइ हरिपद अनुभवइ परम सुख अतिसय द्वैत वियोगी । देस काल तहँ नाहीं । तुलसिदास यहि दसा हीन संसय निर्मूल न जाहीं ॥ 
( २ ) श्री हरि गुरु - पद कमल भजहिं मन तजि अभिमान ।----- तेरसि तीन अवस्था तजहु भजहु भगवन्त । मन क्रम वचन अगोचर व्यापक व्याप्य अनन्त । -तुलसीदास प्रयास बिनु , मिलहिं राम दुखहरन । 
( ३ ) एहि तें मैं हरि ज्ञान गँवायो । परिहरि हृदय कमल रघुनाथहिं बाहर फिरत विकल भय धायो उचित मन भयो ।

जबकि गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज श्रीराम के नर - शरीर का भी और चिदानन्दमय शरीर का भी वर्णन करते हैं , तब शरीर से शरीरी को फुटाकर समझने से शरीरी शरीर से अवश्य ही तत्त्व - रूप में भिन्न , उच्च , उत्कृष्ट और विशेष होता है । इसलिए यह अवश्य मानना पड़ता है कि गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज ने श्रीराम के स्वरूप को सच्चिदानन्द रूप से भी उत्कृष्ट और उच्च शुद्ध आत्मस्वरूप का वर्णन किया है । ऐसे ही सूरदासजी महाराज के भी इन पद्यों को भाग २ के पृष्ठ २१० से २१३ तक में पढ़िये- 

( १ ) अपुनपौ आपुन ही में पायो । शब्दहि शब्द भयो उजियारो सतगुरु भेद बतायो ॥---- ज्यों गूंगो गुड़ खायो । ( २ ) जौं लौं सत्य स्वरूप न सूझत अन्ध नयन बिनु देखे ॥
( ३ ) अपने जान मैं बहुत करी । छमो सूर तें सब बिगरी

इन सन्तों के एसे वर्णनों को पढ़कर इनको केवल कवि ही जानना , इन्हें सन्त नहीं मानना , मेरे जानते इनका अकारण ही अनादर करना है और जो लोग इनको केवल स्थूल - सगुण - उपासक ही मानते हैं , वे इनके परम उच्च गम्भीर ज्ञान और इनके ध्यान की पूर्णता को विदित नहीं करके इनके परम उच्च पद को न्यून करके दरसाते हैं । इति।।

(इसके बाद  महर्षि मेंही पदावली से गुरु महाराज के कई पद्य संकलित हैं। जिसे आप सत्संग ध्यान संतवाणी ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं। वे पद्य नंबर निम्नलिखित हैं -

१ सब क्षेत्र क्षर अपरा परा पर,  १३ सर्वेश्वरं सत्य शान्तिं स्वरूप १४ नमामी अमित ज्ञान रूपं कृपालं१५ सद्गुरु नमो सत्य ज्ञानं स्वरूपं ,  ९९ सत्य ज्ञान दायक गुरु पूरा,  ११४ सम दम और नियम यम ,   ३ मंगल मूरति सतगुरू ,   ४ जय जय परम प्रचण्ड तेज तम मोह विनाशन,   १०० सतगुरु सत परमारथ रूपा,    १६ जय जयति सद्गुरु जयति जय जय,  १७ सतगुरु सुख के सागर,    ३५ प्रभु अकथ अनामी सब पर स्वामी ,   ४२ नहीं थल नहीं जल,   ३८ है जिसका नहीं रंग नहिं रूप,  ४६ सृष्टि के पाँच हैं केन्द्रन,  ४५ पाँच नौबत बिरतन्त कहौं,    ५१ ( क ) खोंजो पंथी पंथ , तेरे घट भीतरे,   १३४ नित प्रति सत्संग कर ले प्यारा,    १२४ यहि मानुष देह समैया में ,   १३३ अद्भुत अन्तर की डगरिया,    ४७ सुनिये सकल जगत के वासी,     ४४ सन्तमते को बात कहूँ,    ७६ योगहृदयवृत्तकेन्द्रविन्दु सुख - सिन्धु की,    ११५ योगहृदय में वास ना,   ११६ एकबिन्दुता दुर्बान हो,   ५३ योगहृदयकेन्द्रविन्दु में युग दृष्टियों को जोड़कर,    १३६ गुरु हरि चरण में प्रीति हो,     १३१ प्रभु मिलने जो पथ धरि जाते,   ६३ सुष्मनियाँ में नजरिया थिर होइ,   १३५ जीवो ! परम पिता निज चीन्हो,   ६९ सुरति दरस करन को जाती,     ७० भाई योगह्रदयवृत्तकेन्द्रविन्दु जो चमचम,    ७४ मन तुम बसो तीसरो नैना ,  ७५ जहाँ सूक्ष्म नाद् ध्वनि आज्ञा,   १४२ अज अद्वैत पूरन ब्रह्मपर की,      १४० आरति परम पुरुष की कीजै    और   १४१ आरति अगम अपार पुरुष की . 

                      ।। मोक्ष दर्शन समाप्त ।


इस पुस्तक के शुरू वाले पोस्ट मोक्ष दर्शन (01-11) को  पढ़ने के लिए    यहां दबाएं ।


     प्रभु प्रेमियों ! मोक्ष दर्शन के उपर्युक्त पैराग्राफों से हमलोगों ने जाना कि Thoughts of sages like Upanishad, Swami Vivekananda, Sreebhumanandji etc. regarding the Aum, devotees are of two types, nirguna and saguna bhakti first have saguna bhakti, then nirguna is devotion to formless, Goswami Tulsidas and Sant Surdas ji Maharaj were not only sagun worshipers.  , Important posts related to the devotion of some saints,, इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस पोस्ट के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने इससे आपको आने वाले पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। निम्न वीडियो में उपर्युक्त वचनों का पाठ किया गया है। इसे भी अवश्य देखें, सुनें।



महर्षि मेंहीं साहित्य "मोक्ष-दर्शन" का परिचय

मोक्ष-दर्शन
  'मोक्ष-दर्शन' सत्संग-योग चारों भाग  पुस्तक का चौथा भाग ही है. इसके बारे में विशेष रूप से जानने के लिए  👉 यहां दवाएं


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मोक्ष दर्शन (106-107) ब्रह्म के निर्गुण निराकार की भक्ति से परम कल्याण ।। सद्गुरु महर्षि मेंहीं मोक्ष दर्शन (106-107)  ब्रह्म के निर्गुण निराकार की भक्ति से परम कल्याण  ।। सद्गुरु महर्षि मेंहीं Reviewed by सत्संग ध्यान on 1/01/2021 Rating: 5

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