विश्व शांति और एकता का संदेश: सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज
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| Global Unity message by Maharshi Mehi. |
विश्व शांति और एकता का संदेश
"जिस किसी देश में यह सत्संग होगा , जिस देश में ईश्वर के मानने में हिचक नहीं है , उसके लिए फायदा है । सब राष्ट्र एक हों , जैसे मुंगेर , भागलपुर आदि अलग - अलग जिलों में रहकर भी एक देश के हैं , ऐसा मानते हैं । उसी प्रकार अलग - अलग देश में रहकर भी अगर अपने को एक मानें तो लड़ाई - झगड़ा सब मिट जाय । जबतक अपने को अलग - अलग मानेंगे , तबतक लड़ाई होती रहेगी । नदी के दोनों पार में एक ही देश के लोग हैं इसी तरह से एक देश से दूर तक समुद्र में चलकर जो दूसरा देश कहलाता है , वह भी तो इसी भूमंडल का देश है । दोनों देशों के लोग एक ही भूमंडल में हैं । दोनों को एक ही भाव से रहना चाहिए । हम दोनों देश के सब अपने ही हैं , ऐसा जानें तो सब लड़ाई झगड़ा मिट जाएँ । ०(यह प्रवचन पूर्णियां जिला विशेषाधिवेशन ग्राम मोकमा में दिनांक 24/12/1950 ई. को प्रातः कालीन सत्संग में हुआ था)"
एक भूमंडल, एक परिवार
महाराज जी कहते हैं कि जिस किसी देश में यह सत्संग होगा और जहाँ ईश्वर को मानने में संकोच नहीं है, वहाँ निश्चित ही लाभ होगा। उन्होंने एक बहुत ही सरल लेकिन गहरा उदाहरण दिया कि जैसे मुंगेर और भागलपुर अलग-अलग जिले होते हुए भी स्वयं को एक ही देश का अंग मानते हैं, वैसे ही विश्व के तमाम राष्ट्रों को भी स्वयं को एक ही सूत्र में बंधा हुआ मानना चाहिए।
उनका विचार था कि:
"जबतक अपने को अलग-अलग मानेंगे, तबतक लड़ाई होती रहेगी। यदि अलग-अलग देश में रहकर भी हम अपने को एक मानें, तो संसार से लड़ाई-झगड़ा सदा के लिए मिट सकता है।"
सीमाओं से परे मानवता
नदियों और समुद्रों के पार बसे देशों के बारे में महाराज जी का दृष्टिकोण बहुत व्यापक था। वे कहते थे कि समुद्र पार का देश भले ही दूसरा कहलाता हो, लेकिन वह भी इसी भूमंडल का हिस्सा है। जैसे नदी के दोनों किनारों पर एक ही देश के लोग होते हैं, वैसे ही पूरे भूमंडल के लोग एक ही धरा के निवासी हैं।
यदि हम यह जान लें कि हम सब अपने ही हैं और एक ही भाव से रहना सीख लें, तो घृणा और युद्ध का कोई स्थान नहीं रह जाएगा। शांति केवल संधियों से नहीं, बल्कि "सब अपने हैं" इस आत्मिक भाव से आएगी।
विश्व शांति का महामंत्र: "सब अपने ही हैं" महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज का 1950 का वह ऐतिहासिक प्रवचन, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे दुनिया से लड़ाई-झगड़े खत्म हो सकते हैं। जरूर पढ़ें: [https://www.satsangdhyan.com/2026/02/maharshi-mehi-vishva-shanti-ekta-sandesh.html]
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📚 महर्षि मेँहीँ साहित्य सुमनावली
MS18 . महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1: 1. महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1 एक ऐसा ग्रंथ है जो मानव जीवन के दु:खों से छुटकारा दिलाने के लिए धर्मग्रंथों, साधु-संतों के वचनों और निजी अनुभूतियों से भरा हुआ है। 2. इस ग्रंथ का मनोयोगपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे उसे मनुष्य शरीर का मिलना सुनिश्चित होता है। 3. शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्म को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, अन्यथा बड़ी हानि होती है। 4. प्रवचनों का पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म संबंधी ठोस और प्रमाणिक जानकारी मिलती है, जिससे उपर्युक्त लाभ अनिवार्य होता है। 5. इस ग्रंथ का प्रथम प्रकाशन वर्ष 2004 में हुआ था और इसमें गुरु महाराज के 323 प्रवचनों का संकलन है, जो ईश्वर, जीव ब्रह्म, साधना आदि आध्यात्मिक विषयों का ज्ञान प्रदान करते हैं। ( और जाने )
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जय गुरु महाराज🙏🙏
Reviewed by सत्संग ध्यान
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12:05:00 pm
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