हम कौन हैं? हमारा जीवन कितने समय तक है?
आपलोग अपने अपने जीवनकाल में बरत रहे हैं । यह जीवनकाल कबतक रहेगा, कोई ठिकाना नहीं । सम्भव है कोई ५० वर्ष, कोई ८० वर्ष , कोई १०० वर्ष और कोई ज्यादे भी रहे । किंतु इस जीवन काल के पहले भी समय समाप्त हो जाय, संभव है । यह जीवनकाल एक शरीर का है । आप शरीर नहीं हैं । बाहर की इन्द्रियाँ नहीं , भीतर की इन्द्रियाँ भी नहीं हैं समस्त इन्द्रियों और शरीर के परे आप हैं ।

गुरु महाराज का हाथ पकड़े हुए भगीरथ बाबा
आपलोग अपने अपने जीवनकाल में बरत रहे हैं । यह जीवनकाल कबतक रहेगा, कोई ठिकाना नहीं । सम्भव है कोई ५० वर्ष, कोई ८० वर्ष , कोई १०० वर्ष और कोई ज्यादे भी रहे । किंतु इस जीवन काल के पहले भी समय समाप्त हो जाय, संभव है । यह जीवनकाल एक शरीर का है । आप शरीर नहीं हैं । बाहर की इन्द्रियाँ नहीं , भीतर की इन्द्रियाँ भी नहीं हैं समस्त इन्द्रियों और शरीर के परे आप हैं ।
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इन्द्रियाँ सह शरीर जड़ हैं किसी भी मृत शरीर में ज्ञान नहीं रहता है । जीवित शरीर में ज्ञान रहता है यह ज्ञानमय पदार्थ चेतन आत्मा है । गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लिखा है-
आप ईश्वर - अंश हैं , अविनाशी हैं , चेतन हैं । एक शरीर का जीवन बहुत थोड़ा है । आप अजर, अमर, अविनाशी हैं । इस मरणशील शरीर में आपका रहना है, यह रहना कबसे है, ठिकाना नहीं । आपने एक ही शरीर को नहीं, अनेक शरीरों को भोगा है । प्रत्येक शरीर का जीवनकाल कुछ-न-कुछ रहा है । आपने अनेकों शरीर को भोगा है और फिर इस शरीर को भोग रहे हैं । एक शरीर का जीवन सौ , सवा सौ वर्ष का है और आपका जीवन अनंत है ।
( महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा सागर, प्रवचन नंबर 118, पुरैनियाँ, २८.६.१९५५ ई० )
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| महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर |
Reviewed by सत्संग ध्यान
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4:58:00 am
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