15. गुरु महाराज साधना से क्या पाये?
धर्मानुरागिनी प्यारी जनता !
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15. "मैं १९०४ ई० से इस खोज में लग गया। आज तक इस खोज में हूँ। इसकी गंभीरता में जाता हूँ, तो जैसे-जैसे जाता हूँ, बड़ा आनन्द पाता हूँ। अभी और भी पाने को है। मुझे जो आनन्द मिला है, वह आनन्द सबको मिले। इस संसार में सबसे ऊँची बात है- 'आत्मवत् सर्वभूतेषु।' संसार में बेवकूफ बनकर नहीं रहो, विद्या-अर्जन भी करो और संसार की संभाल भी करो।"
प्रभु प्रेमियों ! सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसी महाराज का यह प्रवचन भारत की राजधानी दिल्ली में अ० भा० सन्तमत सत्संग के ६२वें वार्षिक महाधिवेशन के अवसर पर दिनांक ३. ३. १९७० ई० को प्रातः काल में हुआ था। जिसमें उन्होंने उपरोक्त बातें कही थी। 'महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा सागर' के सभी प्रवचनों में कहाँ क्या है? किस प्रवचन में किस प्रश्न का उत्तर है? इसे संक्षिप्त रूप में जानने के लिए 👉यहाँ दवाएँ।
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| महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर |
प्रभु प्रेमियों ! उपरोक्त प्रवचनांश 'महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर"' से ली गई है। अगर आप इस पुस्तक से महान संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज के अन्य प्रवचनों के बारे में जानना चाहते हैं या इस पुस्तक के बारे में विशेष रूप से जानना चाहते हैं तो 👉 यहां दबाएं।
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S315 15. गुरु महाराज साधना से क्या पाये? Benefits of meditation
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