S01, 9. सन्त दादू दयालजी महाराज के वचनों में ध्यान-अभ्यास और शब्द-साधना का रहस्य How to practice meditation?
सन्त दादू दयालजी: ध्यान-अभ्यास और शब्द
प्रभु प्रेमियों ! मनुष्य का मन स्वभाव से ही बहिर्मुख रहता है। वह हर समय संसार के विषयों में भटकता रहता है। सन्त दादू दयालजी महाराज अपने वचनों में समझाते हैं कि इस बिखरे हुए मन को समेटकर अन्तर्मुख कैसे किया जाए और शब्द (नाद) के सहारे परमात्मा से कैसे मिला जाए। आइए, इस सत्य को सन्त दादूजी महाराज की वाणी के माध्यम से गहराई से समझते हैं।
|
मन का बहिर्मुख होना और अन्तर्मुखता का रहस्य
सन्त दादू दयालजी महाराज कहते हैं:
सब काहू को होत है, तन मन पसरै जाइ।
ऐसा कोई एक है, उलटा माहिं समाइ ॥१ ॥
सर्वसाधारण मनुष्यों का मन हमेशा शरीर और संसार के बाहरी विषयों में फैला (पसरा) रहता है। लेकिन कोई विरला ही ऐसा खोजी साधक होता है, जिसका मन बाहरी आकर्षणों से उलटकर भीतर की ओर मुड़ता है और अन्तर्मुख होकर अपने निज स्वरूप में समा जाता है।
भीतर समाने का गहरा अर्थ यह है कि जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति जैसी भौतिक अवस्थाओं को पार करके मन सूक्ष्म और सूक्ष्मातिसूक्ष्म चेतन मंडलों में प्रवेश कर जाए।
सहज डोरी (शब्द) के द्वारा मन को समेटना
जब मन चारों तरफ बिखर चुका हो, तो उसे वापस कैसे लाया जाए? महाराज जी समझाते हैं:
क्यों करि उल्टा आणिये, पसरि गया मन फेरि।
दादू डोरी सहज की, यौं आणे घेरि घेरि ॥२ ॥
मन को सांसारिक वासनाओं से समेटकर भीतर लाने का एकमात्र उपाय 'सहज डोरी' है। यह सहज डोरी और कुछ नहीं, बल्कि वह परम शब्द या नाद है जो सृष्टि के आदि काल से प्रवाहित हो रहा है। शब्द में आकर्षण का स्वाभाविक गुण होता है। जैसे चुंबक लोहे को खींचता है, वैसे ही यह शब्द-रूपी सहज डोरी मन को बाहर से समेटकर भीतर की ओर खींच लेती है।
साधु और शब्द का सम्बन्ध
साध सबद सौं मिलि रहै, मन राखै बिलमाइ।
साध सबद बिन क्यों रहै, तबहीं बीखरि जाइ ॥३ ॥
एक सच्चे साधक को हमेशा उस आंतरिक शब्द से जुड़कर रहना चाहिए। शब्द का आलंबन मिलते ही मन ठहर जाता है। यदि साधक शब्द-साधना से अलग हो जाए, तो मन तुरंत संसार की दसों दिशाओं में बिखर जाता है।
राम नाम: अनाहत नाद का वास्तविक स्वरूप
सन्त दादूदयालजी स्पष्ट करते हैं कि कोटि यत्न करने पर भी जिसे रोका नहीं जा सकता, उसे केवल राम नाम से ही स्थिर किया जा सकता है:
कोटि यतन करि करि मुए, यहुमन दह दिसि जाइ।
राम नाम रोक्या रहै, नाहीं आन उपाइ ॥५ ॥
यहाँ 'राम नाम' का अर्थ कोई साधारण वर्णमाला का नाम नहीं, बल्कि सृष्टि में गूंजने वाली सर्वव्यापिनी अनाहत ध्वनि (अनाहत नाद) है। इस ध्वनि को 'नाम' इसलिए कहा गया है क्योंकि इसी के माध्यम से चेतन आत्मा को अपने परम पिता परमात्मा की वास्तविक पहचान होती है।
बिन्दु और नाद साधना
मन ही सन्मुख नूर है, मन ही सन्मुख तेज।
मन ही सन्मुख जोति है, मन ही सन्मुख सेज ॥६ ॥
जब साधक आज्ञाचक्र (भृकुटी मध्य) में अपनी दृष्टि को एकाग्र करता है, तो उसके सामने दिव्य प्रकाश, तेज और ज्योति प्रकट होती है। यही आत्मा के विश्राम करने का सच्चा स्थान है। इस साधना से मन पूरी तरह स्थिर हो जाता है:
मन ही सौं मन थिर भया, मनहीं सौं मन लाइ।
मन ही सौ मिली रह्या, दादू अनत न जाइ ॥७ ॥
शब्द ही सब कुछ है
सन्त दादू दयालजी महाराज शब्द की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं:
सबर्दै बन्ध्या सब रहै, सबर्दै सबही जाइ।
सबर्दै ही सब ऊपजै, सबर्दै सबै समाइ ॥८ ॥
सबर्दै ही सूषिम भया, सबर्दै सहज समान।
सबर्दै ही निर्गुण मिलै, सबर्दै निर्मल ज्ञान ॥९ ॥
इस सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय शब्द के ही द्वारा होते हैं। इसी आंतरिक शब्द को पकड़कर जीवात्मा सूक्ष्म बनती है, सहज समाधि प्राप्त करती है और अंततः निर्गुण परमात्मा में मिलकर निर्मल ज्ञान को प्राप्त कर लेती है।इन बातों को अच्छी तरह समझने के लिए निम्नलिखित प्रवचन को मनोयोग पूर्वक पूरा पढ़ें-
सब काहू को होत है , तन मन पसरै जाइ ।ऐसा कोई एक है , उलटा माहिं समाइ ॥१ ॥क्यों करि उल्टा आणिये , पसरि गया मन फेरि ।दादू डोरी सहज की , यौं आणे घेरि घेरि ॥२ ॥साध सबद सौं मिलि रहै, मन राखै बिलमाइ ।साध सबद बिन क्यों रहै , तबहीं बीखरि जाइ ॥३ ॥तन में मन आवै नहीं , निसदिन बाहरि जाइ ।दादू मेरा जिव दुखी , रहै नहीं ल्यौ लाइ ॥४ ॥कोटि जतन करि करि मुए, यहुमन दह दिसि जाइ ।राम नाम रोक्या रहै , नाहीं आन उपाइ ॥५ ॥मन ही सन्मुख नूर है , मन ही सन्मुख तेज ।मन ही सन्मुख जोति है , मन ही सन्मुख सेज ॥६ ॥मन ही सौं मन थिर भया, मनहीं सौं मन लाइ ।मन ही सौ मिली रह्या , दादू अनत न जाइ ॥७ ॥सबर्दै बन्ध्या सब रहै , सबर्दै सबही जाइ ।सबर्दै ही सब ऊपजै , सबर्दै सबै समाइ ॥८ ॥सबर्दै ही सूषिम भया , सबर्दै सहज समान।सबर्दै ही निर्गुण मिलै , सबर्दै निर्मल ज्ञान ॥९ ॥एक सबद कुछ किया , ऐसा समरथ सोइ ।आगे पीछे तौ करै , जे बलहीणा होइ ॥१० ॥यन्त्र बजाया साजि करि , कारीगर करतार ।पंचों कारज नाद है , दादू बोलणहार ॥११ ॥पंच ऊपना सबद थैं , सबद पंच सौ होई ।साई मेरे सब किया , बूझै बिरला कोइ ॥१२ ॥सबद जरै सो मिली रहै , एकै रस पूरा ।काइर भाजे जीव ले , पग माँडै सूरा ॥१३ ॥
सन्त दादूदयालजी के इस शब्द से विदित है कि रामनाम से उनका तात्पर्य अनाहत नाद से है । मन के सन्मुख ही प्रकाश है और आराम करने का स्थान - बिछावन है । ( जाग्रत् अवस्था में आज्ञाचक्र के केन्द्र में मन की बैठक है । उसके सम्मुख वृत्ति के सिमटाव और स्थिरता से प्रकाश और चैन का स्थान प्रत्यक्ष होता है ) ।६ ।।"
Reviewed by सत्संग ध्यान
on
7:12:00 am
Rating:


कोई टिप्पणी नहीं:
प्रभु प्रेमियों ! कृपया वही टिप्पणी करें जो आप किसी संतवाणी से प्रूफ कर सके या समझ बनी हो किसी ऐसी बानी का उपयोग न करें जिनसे आपका भी समय खराब हो और हमारा भी जय गुरु महाराज