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S01, 7. संतमत का मूल सिद्धांत: अवर्णनीय परमात्मा और संतों की वाणी || What is the real name of god?

मेँहीँ सत्संग सुधा: परमात्मा का वास्तविक स्वरूप

​    प्रभु प्रेमियों ! परम पूज्य महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज फरमाते हैं कि मैं तो इस अनादि आदि परमतत्त्व को परमात्मा कहता हूँ और कहता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी रुचि के अनुसार इस मूल अनादि परमतत्त्व को जिस नाम से पुकारना चाहे, पुकारे। परन्तु यथार्थ में यह अवर्णनीय अनिर्वचनीय है। यहाँ संतों ने उस अगम अगोचर सत्ता को अपनी वाणियों में इस प्रकार व्यक्त किया है:

Santmat teachings on Supreme Lord by Maharshi Mehi Paramhans and Kabir Saheb.
Santmat teachings on Supreme Lord by Maharshi Mehi Paramhans

 

गोस्वामी तुलसीदासजी के विचार

​राम स्वरूप तुम्हार, वचन अगोचर बुद्धि पर।

अविगत अकय अपार, नेति नेति नित निगमकह॥


​भक्त सूरदासजी की अनुभूति

​अविगत गति कछु कहत न आवै।

ज्यो गूंगहि मीठे फल को रस, अन्तरगत ही भावै॥

परम स्वाद सबही जु निरन्तर, अमित तोष उपजावै॥

मन बानी को अगम अगोचर, सो जानै जो पावै॥


​कबीर साहब की साखी

​नैना बैन अगोचरी, श्रवणा करनी सार।

बोलन के सुख कारने, कहिये सिरजनहार॥

​आदि अन्त ताहि नहिं मधे।

कय्यौ न जाई आहि अकये॥

अपरंपार उपजै नहिं विनसै।

जुगति न जानिय कथये कैसे॥

​जस कथिये तस होत नहिं, जस है तैसा सोइ।

कहत सुनत सुख ऊपजै, अरु परमारथ होइ॥

इन बातों को अच्छी तरह समझने के लिए निम्नलिखित प्रवचन को मनोयोग पूर्वक पूरा पढ़ें-

     7. " मैं तो इस अनादि आदि परमतत्त्व को परमात्मा कहता हूँ और कहता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी - अपनी रुचि के अनुसार इस मूल अनादि परमतत्त्व को जिस नाम से पुकारना चाहे , पुकारे । परन्तु यथार्थ में यह अवर्णनीय अनिर्वचनीय है । 

        राम    स्वरूप   तुम्हार , वचन अगोचर  बुद्धि  पर । 
        अविगत अकय अपार , नेति नेति नित निगमकह ॥
                                                    -गोस्वामी तुलसीदासजी ।
    अविगत गति कछु कहत न आवै । 
    ज्यो गूंगहि मीठे फल को रस, अन्तरगत   ही  भावै ॥ 
    परम स्वाद सबही जु निरन्तर, अमित तोष उपजावै ॥ 
    मन  बानी को अगम  अगोचर, सो   जानै  जो  पावै ॥
                                                               -भक्त सूरदासजी

नैना बैन अगोचरी , श्रवणा करनी सार । 
बोलन के सुख कारने , कहिये सिरजनहार ॥ 
             आदि अन्त    ताहि नहिं मधे । 
             कय्यौ न जाई आहि अकये ।। 
             अपरंपार  उपजै नहिं विनसै । 
             जुगति न जानिय कथये कैसे ॥
जस कथिये तस होत नहिं , जस है तैसा सोइ । 
कहत सुनत सुख ऊपजै , अरु परमारथ होइ ।। 
                                                                  --कबीर साहब"

 
    प्रभु प्रेमियों ! सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसी महाराज का यह प्रवचन ग्राम डोभाघाट (जिला पूर्णियाँ) अ० भा० सं० स० विशेषाधिवेशन के अवसर पर दिनांक ५.१२.१६४६ ई० के सत्संग में हुआ था ।जिसमें उन्होंने उपरोक्त बातें कही थी । महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा सागर के सभी प्रवचनों में कहाँ क्या है? किस प्रवचन में किस प्रश्न का उत्तर है? इसे संक्षिप्त रूप में जानने के लिए  👉यहाँ दवाएँ। 


महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर
1. महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1 एक ऐसा ग्रंथ है जो मानव जीवन के दु:खों से छुटकारा दिलाने के लिए धर्मग्रंथों, साधु-संतों के वचनों और निजी अनुभूतियों से भरा हुआ है।
2. इस ग्रंथ का मनोयोगपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे उसे मनुष्य शरीर का मिलना सुनिश्चित होता है।
3. शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्म को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, अन्यथा बड़ी हानि होती है।
4. इन प्रवचनों का पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म संबंधी ठोस और प्रमाणिक जानकारी मिलती है, जिससे उपर्युक्त लाभ अनिवार्य होता है।
5. इस ग्रंथ का प्रथम प्रकाशन वर्ष 2004 में हुआ था और इसमें गुरु महाराज के 323 प्रवचनों का संकलन है, जो ईश्वर, जीव ब्रह्म, साधना आदि  आध्यात्मिक विषयों का ज्ञान प्रदान करते हैं।

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S01, 7. संतमत का मूल सिद्धांत: अवर्णनीय परमात्मा और संतों की वाणी || What is the real name of god? S01,  7. संतमत का मूल सिद्धांत: अवर्णनीय परमात्मा और संतों की वाणी || What is the real name of god? Reviewed by सत्संग ध्यान on 8:47:00 am Rating: 5

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