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S01, 2. ईश्वर है इसका विश्वास कैसे करें? ईश्वर का वास्तविक स्वरूप: एक तार्किक और आध्यात्मिक विश्लेषण

2. ईश्वर है इसका विश्वास कैसे करें? 

   प्रभु  प्रेमियों ! किसी अनादि और अनंत पदार्थ का होना बुद्धि-संगत प्रतीत होता है। मूल आदि तत्त्व कुछ अवश्य है। वह मूल और आदि तत्त्व परिमित हो, ससीम हो, तो सहज ही यह प्रश्न होगा कि उसके पार में क्या है? ससीम को आदि तत्त्व मानना और असीम को आदि तत्त्व न मानना हास्यास्पद होगा।



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ईश्वर है इसका विश्वास कैसे करें?    

सूक्ष्मातिसूक्ष्म और असीम परमात्मा

​संतों का यह विचार है कि जो सबसे महान है, जो सीमाबद्ध नहीं है, उससे कोई विशेष व्यापक हो, सम्भव नहीं है। जो व्यापक-व्याप्य को भर कर उससे बाहर इतना विशेष है कि जिसका पारावार नहीं है, वही सबसे विशेष व्यापक तथा सबसे सूक्ष्म होगा। यहाँ सूक्ष्म का अर्थ 'छोटा टुकड़ा' नहीं है, बल्कि 'आकाशवत् सूक्ष्म' है। जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म है, उसको स्थूल या सूक्ष्म इन्द्रियों से जानना असम्भव है। आईये इन्हीं बातों की चर्चा को सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की वाणी में पढ़ें -


"2. प्यारे लोगो ! किसी अनादि और अनंत पदार्थ का होना बुद्धि - संगत प्रतीत होता है । मूल आदि तत्त्व कुछ अवश्य है । वह मूल और आदि तत्त्व परिमित हो ससीम हो , तो सहज ही यह प्रश्न होगा कि उसके पार में क्या है ? ससीम को आदि तत्त्व मानना और असीम को आदि तत्त्व न मानना हास्यास्पद होगा । 

व्यापक व्याप्य अखण्ड अनंता ।
                              अखिल   अमोघ  सक्ति  भगवन्ता ॥ 
अगुन   अदभ्र   गिरा   गोतीता । 
                              सब   दरसी    अनवय     अजीता । 
निर्मल     निराकार      निर्मोहा । 
                                नित्य    निरंजन  सुख   संदोहा ॥ 
प्रकृति पार  प्रभु  सब उरवासी । 
                                ब्रह्म   निरीह विरज  अविनासी ॥

     उपर्युक्त चौपाइयों में मूल आदि तत्त्व का वर्णन गोस्वामी तुलसीदासजी ने किया है । संतों ने उसे ही परमात्मा माना है । गुरु नानकदेवजी ने कहा है-

अलख अपार अगम  अगोचरि, 
                                  ना   तिसु    काल    न   करमा । 
जाति अजाति अजोनी सम्भउ, 
                                 ना    तिसु   भाउ     न    भरमा ॥ 
साचे सचिआर विटहु कुरवाणु, 
                                  ना तिसु रूप बरनु नहि रेखिआ । 
साचे      सबदि        नीसाणु ॥ 

      संतों का यह विचार है कि जो सबसे महान है , जो सीमाबद्ध नहीं है , उससे कोई विशेष व्यापक हो , सम्भव नहीं है । जो व्यापक - व्याप्य को भर कर उससे बाहर इतना विशेष है कि जिसका पारावार नहीं है , वही सबसे विशेष व्यापक तथा सबसे सूक्ष्म होगा । यहाँ सूक्ष्म का अर्थ ' छोटा टुकड़ा ' नहीं है , बल्कि ' आकाशवत् सूक्ष्म ' है । जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म है , उसको स्थूल या सूक्ष्म इन्द्रियों से जानना असम्भव है ।"




 
     सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसी महाराज का यह प्रवचन ग्राम डोभाघाट (जिला पूर्णियाँ) अ० भा० सं० स० विशेषाधिवेशन के अवसर पर दिनांक ५.१२.१६४६ ई० के सत्संग में हुआ था ।जिसमें उन्होंने उपरोक्त बातें कही थी । महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा सागर के सभी प्रवचनों में कहाँ क्या है? किस प्रवचन में किस प्रश्न का उत्तर है? इसे संक्षिप्त रूप में जानने के लिए  👉यहाँ दवाएँ। 



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1. महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1 एक ऐसा ग्रंथ है जो मानव जीवन के दु:खों से छुटकारा दिलाने के लिए धर्मग्रंथों, साधु-संतों के वचनों और निजी अनुभूतियों से भरा हुआ है।
2. इस ग्रंथ का मनोयोगपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे उसे मनुष्य शरीर का मिलना सुनिश्चित होता है।
3. शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्म को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, अन्यथा बड़ी हानि होती है।
4. इन प्रवचनों का पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म संबंधी ठोस और प्रमाणिक जानकारी मिलती है, जिससे उपर्युक्त लाभ अनिवार्य होता है।
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