चैतन्य आत्मा ही परमात्मा को पहचानने का एकमात्र साधन है
प्रभु प्रेमियों ! अनादि आदि परम तत्त्व परमात्मा को किसी भौतिक साधन, बाहरी चश्मे या शारीरिक इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता। परमात्मा केवल चैतन्य आत्मा से ही ग्रहण होने और पहचाने जाने योग्य है। जब तक हमारी चैतन्य आत्मा शरीर और इन्द्रियों के बन्धन में बंधी रहेगी, तब तक परमात्मा की वास्तविक पहचान असम्भव है।
संतमत में ईश्वर के अनादि और अनंत स्वरूप पर महर्षि मेँहीँ के प्रवचन करते हुए
पट्टी और चश्मे का दृष्टान्त: यथार्थ को देखने में बाधा
मानव जीवन की वर्तमान स्थिति को एक बहुत ही सरल और सटीक उदाहरण से समझा जा सकता है:
आँख पर पट्टी बंधना: यदि आँख पर पट्टी बँधी हो, तो आँख में देखने की भीतरी शक्ति रहने पर भी हम बाहर का कोई दृश्य नहीं देख सकते। इसी प्रकार, अज्ञान और मायिक आवरणों की पट्टी के कारण हम भीतर बैठे परमात्मा को नहीं देख पाते।
रंगीन चश्मे का प्रभाव: यदि आँख पर रंगीन चश्मा लगा हो, तो बाहर का यथार्थ रंग दिखाई नहीं देता। चश्मे का जो रंग होगा, बाहर की हर वस्तु उसी रंग की दिखाई देगी। हमारी इन्द्रियाँ और मन भी इसी रंगीन चश्मे की तरह हैं, जो सत्य को विकृत करके दिखाती हैं।
समाधान: जैसे ही आँख पर से पट्टी और चश्मा उतार दिया जाता है, बाहर का यथार्थ रंग स्वतः दिखाई देने लगता है। ठीक वैसे ही, जब चैतन्य आत्मा के ऊपर से शरीर और इन्द्रियों रूपी पट्टी और चश्मे उतर जाते हैं, तब उसे तत्काल परमात्म-स्वरूप की पहचान हो जाती है।
आवरणों से मुक्ति ही वास्तविक चैतन्य आत्मा है
सृष्टि के जितने भी भौतिक और अभौतिक आवरण हैं—चाहे वे शरीर हों, इन्द्रियाँ हों, या फिर स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण आदि मायिक जगत के परदे हों—इन सबके उतर जाने पर जो इस पिण्ड में शेष बच जाता है, वही हमारी वास्तविक चैतन्य आत्मा है।
जब यह आत्मा समस्त आवरणों से पूर्णतः मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप में आती है, तभी उस अनादि आदि परम तत्त्व परमात्मा को पहचाना जा सकता है। इसके बिना परमात्मा की प्राप्ति या पहचान का अन्य कोई मार्ग नहीं है। इन बातों को अच्छी तरह समझने के लिए निम्नलिखित प्रवचन को मनोयोग पूर्वक पूरा पढ़ें-
6. प्यारे लोगो ! "अब यह साफ से जना देता हूँ कि अनादि आदि परम तत्त्व परमात्मा केवल चैतन्य आत्मा से ही ग्रहण होने , पहचाने जाने योग्य है जबतक शरीर और इन्द्रियों के सहित चैतन्य आत्मा रहेगी , तबतक परमात्मा को नहीं पहचान सकेगी । आँख पर पट्टी बँधी हो , तो आँख में देखने की शक्ति रहने पर भी बाहरी दृश्य नहीं देखा जाता और आँख पर रंगीन चश्मा लगा रहने पर बाहर का यथार्थ रंग नहीं देखने में आता है , चश्मे के रंग के अनुरूप ही रंग बाहर में देखने में आता है । आँख पर से पट्टी और चश्मा उतार दो , बाहर के यथार्थ रंग देखने में आएंगे । शरीर और इन्द्रियों के आवरण से छूटते ही या यों कहो कि चैतन्य आत्मा पर से शरीर और इन्द्रियों की पट्टी और चश्मे उतरते ही चैतन्य आत्मा को परमात्म - स्वरूप की पहचान हो जाएगी । शरीर , इन्द्रिय और स्थूल , सूक्ष्म आदि मायिक सब आवरणों के उतर जाने पर , जो इस पिण्ड में बच जाता है , वही चेतन - आत्मा है और इनसे जो पहचाना जाता है , वही अनादि आदि तत्त्व परमात्मा है । "
प्रभु प्रेमियों ! सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसी महाराज का यह प्रवचन ग्राम डोभाघाट (जिला पूर्णियाँ) अ० भा० सं० स० विशेषाधिवेशन के अवसर पर दिनांक ५.१२.१६४६ ई० के सत्संग में हुआ था ।जिसमें उन्होंने उपरोक्त बातें कही थी । महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा सागर के सभी प्रवचनों में कहाँ क्या है? किस प्रवचन में किस प्रश्न का उत्तर है? इसे संक्षिप्त रूप में जानने के लिए 👉यहाँ दवाएँ।
1. महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1 एक ऐसा ग्रंथ है जो मानव जीवन के दु:खों से छुटकारा दिलाने के लिए धर्मग्रंथों, साधु-संतों के वचनों और निजी अनुभूतियों से भरा हुआ है।
2. इस ग्रंथ का मनोयोगपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे उसे मनुष्य शरीर का मिलना सुनिश्चित होता है।
3. शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्म को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, अन्यथा बड़ी हानि होती है।
4. इन प्रवचनों का पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म संबंधी ठोस और प्रमाणिक जानकारी मिलती है, जिससे उपर्युक्त लाभ अनिवार्य होता है।
5. इस ग्रंथ का प्रथम प्रकाशन वर्ष 2004 में हुआ था और इसमें गुरु महाराज के 323 प्रवचनों का संकलन है, जो ईश्वर, जीव ब्रह्म, साधना आदि आध्यात्मिक विषयों का ज्ञान प्रदान करते हैं।
सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की पुस्तकें मुफ्त में पाने के लिए शर्तों के बारे में जानने के लिए 👉 यहाँ दवाएँ ।
--×--
S01, 6. चैतन्य आत्मा और परमात्मा का यथार्थ स्वरूप: आवरणों से मुक्ति ही ईश्वर दर्शन है.
Reviewed by सत्संग ध्यान
on
8:09:00 am
Rating: 5
कोई टिप्पणी नहीं:
प्रभु प्रेमियों ! कृपया वही टिप्पणी करें जो आप किसी संतवाणी से प्रूफ कर सके या समझ बनी हो किसी ऐसी बानी का उपयोग न करें जिनसे आपका भी समय खराब हो और हमारा भी जय गुरु महाराज
कोई टिप्पणी नहीं:
प्रभु प्रेमियों ! कृपया वही टिप्पणी करें जो आप किसी संतवाणी से प्रूफ कर सके या समझ बनी हो किसी ऐसी बानी का उपयोग न करें जिनसे आपका भी समय खराब हो और हमारा भी जय गुरु महाराज