11. चौथी भक्ति कैसे करना चाहिए?
धर्मानुरागिनी प्यारी जनता !
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"चौथी भक्ति है-कपट छोड़कर ईश्वर का गुणगान करना। कपट यह कि 'लोक दिखावे के लिए करता है, सो नहीं करे। संतों का संग, कथा-प्रसंग, गुरु-सेवा, कपट छोड़कर गुणगान करना; ये सभी क्रम से हैं।
पूजाकोटि समं स्तोत्रं, स्तोत्र कोटि समं जपः ।
जप कोटि समं ध्यानं, ध्यान कोटि समो लयः ।।
इसके बाद है पाँचवीं भक्ति-दृढ़ विश्वास से मंत्र जप करना, जो मंत्र गुरु बता दे। लेकिन ऐसा नहीं हो कि-
माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख माहिं।
मनुवाँ तो दह दिसि फिरै, यह जो सुमिरन नाहिं ।।
सुमिरण कैसा होना चाहिए तो कहा-
तन थिर मन थिर वचन थिर, सुरत निरत थिर होय।
कह कबीर इस पलक को, कलप न पावै कोय ।। "
प्रभु प्रेमियों ! सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसी महाराज का यह प्रवचन मुरादाबाद स्थित श्रीसंतमत सत्संग मंदिर कानून गोयान मुहल्ले में दिनांक १२.४.१९६५ ई० को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। जिसमें उन्होंने उपरोक्त बातें कहा था। महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा सागर के सभी प्रवचनों में कहाँ क्या है? किस प्रवचन में किस प्रश्न का उत्तर है? इसे संक्षिप्त रूप में जानने के लिए 👉यहाँ दवाएँ।
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| महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर |
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S209(ख) 11. चौथी भक्ति कैसे करना चाहिए? 4 प्रकार के भक्त कौन से हैं? 12. मंत्र जप कैसे करना चाहिए?
Reviewed by सत्संग ध्यान
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3:52:00 pm
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