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LS14 छंद-योजना 07 || छंद में यति और गति का महत्व, प्रयोग, परिभाषा, प्रकार और उदाहरण सहित वर्णन

महर्षि मँहीँ-पदावली' की छंद-योजना / 07

     प्रभु प्रेमियों ! 'महर्षि मँहीँ पदावली की छंद योजना' पुस्तक के इस भाग में हम लोग जानेंगे कि छंद शास्त्र में यति किसे कहते हैं ? यति का कितने तरह का होता है? एक छंद में कितनी यतियां हो सकती हैं? विभिन्न यति होने के क्या कारण हो सकते हैं? पद्य में यति होना क्यों जरूरी है? यति को क्या-क्या कहते हैं? यति का सूचित करने वाला चिन्ह कौन-कौन है? विभिन्न पद्यों में विभिन्न प्रकार के यति चिन्हों का प्रयोग किस तरह होता है, उसकाे उदाहरण सहित बताएं ! छंद में यति भंग करने के क्या परिणाम हो सकते हैं? इत्यादि बातें.  आदि बातें.


इस पोस्ट के पहले बाले भाग में छंद के बारे में बताया गया है उसे पढ़ने के लिए   👉 यहां दबाएं.


छंद-योजना पर चर्चा करते गुरुदेव और लेखक


छंद में यति और गति का महत्व, प्रयोग, परिभाषा, प्रकार और उदाहरण सहित वर्णन--


यति

     छन्द के चरण का पाठ करते समय थोड़े समय के लिए जहाँ ठहरते हैं , उसे यति , विराम या विश्राम ( Pause ) कहते हैं । चरण के मध्य में आनेवाली यति को पादान्तर्गत यति और अंत में आनेवाली यति को पादान्त यति या प्रधान यति भी कहते हैं । छोटे चरण में केवल पादान्त यति होती है , पादान्तर्गत यति नहीं । बड़े - बड़े चरणों में एक , दो , तीन और चार तक पादान्तर्गत यतियाँ देखी जाती हैं । 

     जब हम मौन रहते हैं , तब हम नाक से साँस लेते और छोड़ते हैं ; परन्तु बोलने के समय मुँह से साँस लेनी और छोड़नी पड़ती है । यदि मुँह से साँस नहीं ली जाए और नहीं छोड़ी जाए , तो बोलने का काम हो ही नहीं सकता । बहुत लंबे वाक्य को हम एक ही साँस में नहीं बोल पाते ; यदि बोलने की कोशिश करते हैं , तो साँस टूट जाती है और बोलने में दिक्कत भी होती है । छन्द के चरणों का सुख और आसानी के साथ पाठ कर सकें तथा चरण की लय भी बिगड़ने न पाए - इसी उद्देश्य से चरण में कई यतियाँ होती हैं । 

     छंद के प्रत्येक चरण में निश्चित मात्राओं या वर्णों के बाद यति होती है । चरण का पाठ करते समय मनमाने ढंग से जहाँ - तहाँ रुक जाने पर लय बिगड़ जाती है । यति पर हमें साँस लेने और विश्राम करने का अवसर प्राप्त होता है ।

     कवि लोग बड़ी सावधानी के साथ चरण के शब्दों की योजना करते हैं , जिससे कि यति के पूर्व आनेवाला वाक्य या वाक्यांश पूरा अर्थ देनेवाला हो और अर्थ समझने में बाधा भी उपस्थित न हो ।

      यति से छन्द की लय प्रभावित होती है और लय छन्द की आत्मा है , इसीलिए यति छन्द का आवश्यक अंग मानी जाती है ।

ध्यान में चंद ज्ञान का उदय
ध्यान में छंद ज्ञानानुभूति

     यदि छन्द के चरण की यति बदल दी जाय , तो चरण की लय बिगड़ जाएगी या भिन्न हो जाएगी । यदि ऐसा नहीं हुआ , तो छन्द अवश्य बदल सकता है ; जैसे -२६ मात्राओंवाले गीतिका छंद के चरण में १४-१२ मात्राओं पर यति होती है , यदि उसके चरण में १६-१० मात्राओं पर यति दे दी जाए , तो चरण विष्णुपद का हो जाएगा । 

    ठहरने का स्थान ( यति, विराम या विश्राम ) सूचित करने के लिए कॉमा ( , )  पूर्ण विराम ( I ) और दो पूर्ण विरामों ( II ) का प्रयोग किया जाता है । पादान्तर्गत यतियाँ प्राय: कॉमा ( , ) के द्वारा सूचित की जाती हैं । छन्द के पहले - तीसरे चरणों के अंत में प्रायः एक पूर्ण विराम और दूसरे - चौथे चरणों के अंत में दो पूर्ण विराम दिये जाते हैं । कोई-कोई कवि पहले - तीसरे चरणों के अंत में भी कॉमा देते हैं और दूसरे चरण के अंत में एक पूर्ण विराम तथा चौथे के अंत में दो पूर्ण विराम।

     दोहा , सोरठा , बरवै आदि छन्दों के पहले तीसरे चरणों के बाद कॉमा , दूसरे चरण के बाद एक पूर्ण विराम और चौथे के अंत में दो पूर्ण विराम दिये जाते हैं । 

    ' महर्षि मँहीँ - पदावली ' के कुछ पद्यों के चरणों में यतियों के उदाहरण देखिए--

सत्य पुरुष की आरति कीजै । हृदय अधर को थाल सजीजै ।। 

( ये चौपाई के दो चरण हैं । चौपाई का चरण छोटा होता है , इसीलिए इसमें पादान्तर्गत यति नहीं होती है , पादान्त यति होती है । ) 

प्रेम भक्ति गुरु दीजिए , विनवौं कर जोड़ी । 

( इस चरण में पादान्तर्गत यति एक ही है । ) 

सतगुरु सुख के सागर , शुभ गुण आगर , ज्ञान उजागर हैं । 

( इस चरण में पादान्तर्गत यतियाँ दो हैं । ) 

अनादि अनन्त प्रभु , निर अवयव विभु , अछय अजय अति , सघन रहाहीं । 

( इस लंबे चरण में तीन पादान्तर्गत यतियाँ हैं । ) 

राम आदि अवतार , देव मुनि संत आर , गुरुपद भजते , अहमति तजते , करते गुरुपद ध्यान रे । 

( इस चरण के मध्य चार यतियाँ हैं । ) 

गुरु को सुमिरो मीत , क्यों अवसर खोवहू । भव में बहुतक दुक्ख , युगन युग रोवहू ॥ 

( इस छन्द के प्रथम चरण के अंत में एक पूर्ण विराम और दूसरे चरण के अंत में दो पूर्ण विराम हैं । ) 

धन्य धन्य सतगुरु सुखद , महिमा कही न जाय । जो कछु कहुँ तुम्हरी कृपा , मोतें कछु न बसाय ॥ 

( इस दोहा छन्द में जहाँ जिस प्रकार का यति चिह्न दिया जाना चाहिए , वहाँ वैसा ही दिया गया है । ) 

गंभीर चिंतन, ज्ञान के बारे में, लेखक का गंभीर चिंतन छंद ज्ञान के बारे में
 संत लालदास  

    यदि किसी छन्द के किसी चरण में उचित स्थान पर यति ( ठहराव ) नहीं हो ; कम या अधिक मात्राओं या वर्गों पर यति हो , तो वहाँ यतिभंग दोष ( यति संबंधी नियम के भंग का दोष ) माना जाता है । यति उचित मात्राओं या वर्णों पर ही हो ; परन्तु यदि उसके चलते कोई शब्द खंडित हो जाता हो , तो विद्वान् वहाँ भी यतिभंग दोष मानते हैं । इसी तरह उचित मात्राओं या वर्णों पर यति के रहने पर भी यदि यति के चलते अर्थ - बोध में बाधा पहुँचती हो , तो वहाँ भी यतिभंग - संबंधी ही दोष माना जाता है । 

     यतिभंग - संबंधी दोषों के उदाहरण नीचे दिये जाते हैं--

सेवक सेव्य भाव बिनु , भव न तरिय उरगारि । भजहु रामपद पंकज , अस सिद्धान्त विचारि ॥ ( रामचरितमानस , उत्तरकाण्ड ) 

     [ उपरिलिखित छन्द दोहा है । दोहे के पहले - तीसरे चरण में १३ मात्राओं के बाद यति होती है ; परन्तु इस दोहे के तीसरे चरण में १२ मात्राओं के ही बाद यति है । गुनागार संसार दुख , रहित विगत संदेह । तजि मम चरन सरोज प्रिय , जिन्ह कहँ देह न गेह | ( रामचरितमानस , उत्तरकाण्ड ) [ ऊपर के दोहे में यति के चलते ' दुख - रहित ' शब्द खंडित ( अलग - अलग ) हो गया है और तीसरा - चौथा चरण अलग - अलग रहकर समुचित अर्थ नहीं दे पाते हैं । स्पष्ट अर्थ - ज्ञान के लिए ' सरोज ' के बाद यति चिह्न ( , ) लगाना पड़ेगा ; लेकिन वहाँ यति पड़ने पर पुनः यतिभंग - संबंधी दोष आ जाएगा । ऊपर दिये गये दो दोहे ' रामचरितमानस ' से लिये गये हैं । कहते हैं , ' रामचरितमानस ' सर्वथा निर्दोष काव्य - ग्रंथ है । उसमें जो काव्य - दोष दिखाई पड़ता है , उसके द्वारा कोई विशेष भाव या अभिप्राय प्रकट किया गया है । ] 

    यति पर कारक की विभक्ति का अलग हो जाना भी यतिभंग दोष है , जैसा कि नीचे के चरण में देखने को मिलता है मान- बड़ाई कनक - कामिनी , की ममता ने घेरा । ∆


इस पोस्ट के बाद छंद की गति का बर्णन हुआ है उसे पढ़ने के लिए   👉 यहां दबाएं.


प्रभु प्रेमियों ! इस लेख में  छंद मे यति शब्द का अर्थ क्या है? काव्य में यति गति से क्या आशय है? यति के कितने भेद होते हैं उदाहरण सहित? पारंपरिक छंद यति से आप क्या समझते है सोदाहरण विस्तृत परिचय दीजिये? छंद के प्रसंग में 'यति और गति' से क्या तात्पर्य है? इत्यादि बातों को  जाना. आशा करता हूं कि आप इसके सदुपयोग से इससे समुचित लाभ उठाएंगे. इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार  का कोई शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले हर पोस्ट की सूचना नि:शुल्क आपके ईमेल पर मिलती रहेगी। . ऐसा विश्वास है. जय गुरु महाराज.



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