मोक्षपर्यंत ध्यानाभ्यास कार्यक्रम

LS61 शिक्षाप्रद कथाएँ 39 || मनुष्य का लक्ष्य निर्धारण एक उद्देश्य से है लक्ष्य का महत्व समझें नहीं तो मंजिल नहीं

शिक्षाप्रद कथाएँ / कथा नंबर 39

शिक्षाप्रद कथाएँ पुस्तक के इस कथा में बताया गया है कि "मनुष्य अपना लक्ष्य निर्धारण एक उद्देश्य से करता है, अपने लक्ष्य का महत्व समझ कर  उसकी पूर्ति में लग जाना चाहिए दूसरी सब बातों में उलझ कर अपना लक्ष्य को नहीं भूलना चाहिए, प्रस्तुत कहानी में इसी बात की पुष्टि की गई है।जो विचारवान् एवं चतुर व्यक्ति होते हैं , वे उस नवयुवक की भाँति सांसारिक प्रलोभनों का त्याग करते हुए परमात्म - तत्त्व को प्राप्त कर सदा - सदा के लिए दुःखों से छूट जाते हैं 

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बाबा लालदास सद्गुरु की डायरी

 


 ३९ . आये थे हरिभजन को , ओटन लगे कपास 

     एक राजा ने अपने राज्य में एक मेला लगवाया । उस मेले में उसने जीवनोपयोगी सारी वस्तुओं का प्रबंध करवाया । उसमें खाने - पीने की सारी चीजें मौजूद थीं । हर प्रकार के आभूषण , कपड़े , सोने - चाँदी , हीरे - जवाहिरात के अतिरिक्त नाच - गान की भी व्यवस्था की गयी थी । 

     मेले के बीच राजा ने अपना सिंहासन बनवाया और स्वयं उसी सिंहासन पर बैठ गया । सिंहासन पर बैठने के पहले उसने घोषणा की कि जो व्यक्ति दिन में ठीक बारह बजे उससे मिलेगा , उस व्यक्ति को वह अपना सारा राज्य दे देगा । साथ यह भी एलान करवा दिया कि मेले के अंदर सभी प्रकार की सामग्रियाँ हैं । जिसे जितना खाना - पीना हो या अपने घर ले जाना हो , बगैर पैसे दिये खा - पी सकता है तथा मनमाना घर भी ले जा सकता है । राजा की यह घोषणा सभी लोगों ने स्पष्ट रूप से सुनी । 

     मेले में प्रवेश करने के लिए चारो तरफ से दरवाजे खुले हुए । थे तथा किसी भी प्रकार का सामान लेने में कोई रोक - टोक नहीं थी । सभी लोग मेले में प्रवेश करते गये । मगर मेले में प्रवेश करने के उपरांत सभी इस बात को भूलते गये कि बारह बजे राजा मिलकर राज्य का मालिक बनना है ; क्योंकि सभी लोग मेले की सामग्रियों के लालच में पड़कर बीच में ही अटकते गये थे । कोई खाने - पीने की मस्ती लेने लगा , कोई कपड़े , आभूषण , सोने - चाँदी , हीरे - जवाहिरात आदि के लोभ में पड़ गया और कोई तरह - तरह की सामग्रियों को घर ले जाने के लिए गठरी बाँधने लगा । कुछ लोग नाच - गान की मस्ती में अपना उद्देश्य भूल गये अर्थात् सभी लोग मेले के रंग में राजा की घोषणा भूल बैठे ।


राजा का मेला

     अब बारह बजनेवाले ही थे कि एक नवयुवक ने दौड़ते हुए मेले में प्रवेश किया । उसे दौड़ता देखकर उसके मित्रों ने उसे रोककर नाच - गान में फँसाना चाहा । परिवारवालों ने भी उससे सोने - चाँदी आदि कीमती सामानों को घर ले चलने के लिए कहा ; परन्तु उसने किसी की बात नहीं मानी । उसके परिचित लोगों ने हर तरह से उसे रोकने का प्रयत्न किया , मगर वह सबको झटकते हुए ठीक बारह बजे राजा के सिंहासन के पास पहुँच गया । राजा के पास पहुँचकर उसने कहा – ' राजन् ! बारह बज गये । ' राजा भी बड़ा प्रसन्न हुआ , उसने कहा – ' हाँ , बेटा ! बारह बज गये । अब तुम इस गद्दी के हकदार हो , आओ , गद्दी पर बैठो । अब यह राज्य तुम्हारा है , तुम इस राज्य के मालिक हुए । अब तुम जिस प्रकार से इस राज्य को चलाना चाहो , चलाओ । ' इतना कहकर राजा वहाँ से प्रस्थान कर गया । 

     नवयुवक ने गद्दी सँभाली । गद्दी पर बैठते ही उसने सिपाहियों को आदेश दिया - इस मेले के अंदर जितने लोग आये हैं , सबों को बाहर करो और जिन - जिन लोगों ने मुफ्त में यहाँ की चीजें बाँध ली हैं , उन्हें कैद करो तथा उनकी सारी संपत्ति जब्त कर लो । ' 

     नये राजा के आदेशानुसार सिपाहियों ने वैसा ही करना आरंभ किया । जब लोगों को सिपाहियों ने धक्के देकर मेले से बाहर करना तथा उनके सामानों को जब्त कर उन्हें कैद करना आरंभ कर दिया , तो सभी लोग हक्के - बक्के हो गये । 

     लोगों ने सिपाहियों से कहा- ' यह तो राजा का एलान था , फिर इस प्रकार धर - पकड़ क्यों की जा रही है ? ' सिपाहियों ने कहा ' जरा यह तो देखो , कितने बज रहे हैं ? राजा बदल गया है । अब नये राजा के कानून के मुताबिक हमलोग काम कर रहे हैं । ' 

     अब सबकी आँखें खुलीं । जब उनके सामान छीन लिये गये , तब वे अपनी मूर्खता पर पश्चात्ताप करने लगे । काश ! वे पहले ही इस बात को समझ लिये होते । जिन - जिन चीजों के लालच में वे पड़े थे , राजा बन जाने पर तो वे सारी चीजें उनकी ही हो जातीं ।

लालदास जी महाराज बाबा
निरूपण

     इसी प्रकार भगवानरूपी राजा ने संसाररूपी मेल लगाया है । उनकी घोषणा है कि मानव चाहे तो मुझसे मिलकर संपूर्ण ब्रह्मांड का मालिक बन सकता है ; मगर आदमी संसार में आकर यहाँ के विषय - भोगों में उलझकर भगवान् को भूल बैठता है , अपने उद्देश्य को भूल बैठता है । आखिर कालरूपी सिपाही उससे यहाँ की सारी सामग्रियाँ छीनकर उसे कैदी बना लेता है । जो विचारवान् एवं चतुर व्यक्ति होते हैं , वे उस नवयुवक की भाँति सांसारिक प्रलोभनों का त्याग करते हुए परमात्म - तत्त्व को प्राप्त कर सदा - सदा के लिए दुःखों से छूट जाते हैं ।∆


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     प्रभु प्रेमियों ! लालदास साहित्य सीरीज में आपने 'शिक्षाप्रद कथाएँ' नामक पुस्तक के इस कहानी में सभ्यता युक्त व्यवहारिक आचरणीय ज्ञान का महत्व भारती भाषा में (हिंदीं) में जाना. आशा करता हूं कि आप इसके सदुपयोग से इससे समुचित लाभ उठाएंगे. इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार  का कोई शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले हर पोस्ट की सूचना नि:शुल्क आपके ईमेल पर मिलती रहेगी। . ऐसा विश्वास है.जय गुरु महाराज.


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