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R03, Tirth Darshan और संत समाज रूप तीर्थराज की विशेषता -महर्षि मेंहीं

रामचरितमानस का सटीक ज्ञान प्रसंग / 03

       प्रभु प्रेमियों ! भारतीय साहित्य में वेद, उपनिषद, उत्तर गीता, भागवत गीता, रामायण आदि सदग्रंथों का बड़ा महत्व है। इन्हीं सदग्रंथों में से ध्यान योग से संबंधित बातों को रामायण से संग्रहित करके सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज ने 'रामचरितमानस सार सटीक' नामक पुस्तक की रचना की है। जिसका टीका और व्याख्या भी किया गया है ।उन्हीं प्रसंगोों में से आज के प्रसंग में जानेंगे- रामचरितमानस में Tirth Darshan और संत समाज रूप तीर्थराज की विशेषता के बारे में।


व्हील चेयर पर गुरुदेव
व्हील चेयर पर गुरुदेव

संत समाज रूप तीर्थराज की विशेषता


      संतों  का समाज आनंद और कल्याणमय है, जो जगत में चलता-फिरता तीर्थराज है, जहाँ राम भक्तिरूपी गंगा की धारा हैं और विधि निषेध (नहीं करने योग्य कर्म) यमुना हैं और भगवान विष्णु,भगवान शंकर और धर्म शास्त्रों की कथाएँ त्रिवेणी रूप से सुशोभित हैं, जिसे सुनते ही सभी आनंदों और कल्याणों की प्राप्ति होती हैं।

रामायण में संत वंदना
रामायण में संत वंदना


संत समाज रूप तीर्थ वर्णन
संत समाज रूप तीर्थ वर्णन

तीर्थ वर्णन समाप्ति चित्र
तीर्थ वर्णन समाप्ति चित्र

     प्रभु प्रेमियों ! गुरु महाराज के भारती पुस्तक "रामचरितमानस सार सटीक" के इस लेख का पाठ करके आपलोगों ने जाना कि    रामचरितमानस में Tirth Darshan और संत समाज रूप तीर्थराज की विशेषता के बारे में । इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी।


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R03, Tirth Darshan और संत समाज रूप तीर्थराज की विशेषता -महर्षि मेंहीं R03, Tirth Darshan और संत समाज रूप तीर्थराज की विशेषता -महर्षि मेंहीं Reviewed by सत्संग ध्यान on 6/03/2020 Rating: 5

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