आंतरिक और बाहरी इन्द्रियाँ और ईश्वर का वास्तविक स्वरूप
मनुष्य के पास दो प्रकार की इन्द्रियाँ होती हैं, जो बाहरी जगत और आंतरिक जगत का अनुभव कराती हैं:
- बाहरी इन्द्रियाँ (10 इन्द्रियाँ): नेत्र (आँख), कर्ण (कान), नासिका (नाक), जिह्वा (जीभ), त्वचा, मुख, हाथ, पैर, गुदा और लिंग।
- आंतरिक इन्द्रियाँ (अन्तःकरण): मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।
ये सब-की-सब इन्द्रियाँ उस दर्जे की सूक्ष्म नहीं हैं जो परमात्म-स्वरूप को ग्रहण कर सकें। ये तो परमात्मा की परम सूक्ष्मता के सम्मुख अत्यंत स्थूल हैं। भला ये स्थूल इन्द्रियाँ उस सूक्ष्म ईश्वर को कैसे ग्रहण कर सकती हैं?
वेद का दिव्य संदेश
सामवेद (अ० 8, मं० 3) के एक मन्त्र में कहा गया है:
ओsम्संयोजत उरुगायस्य जूतिंवृथाक्रीडन्तं मिमितेनगावः । परीणसं कृणुते तिग्म शृंगो दिवा हरिर्ददृशे नक्तमृज्र: ॥
इस मन्त्र के द्वारा वेद भगवान उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यो! हाथ, पैर, गुदा, लिंग, रसना, कान, त्वचा, आँख, नाक और मन-बुद्धि आदि इन्द्रियों के द्वारा ईश्वर को प्रत्यक्ष करने की चेष्टा करना झूठ ही एक खेल करने के समान है; क्योंकि इनसे वह ईश्वर नहीं जाना जा सकता है। वह तो पूर्णतः इन्द्रियातीत (इन्द्रियों से परे) है।
केनोपनिषद् का प्रमाण: असली ईश्वर कौन है?
केनोपनिषद् (खण्ड १, श्लोक ५) में स्पष्ट रूप से वर्णित है:
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
अर्थात्: जो मन से मनन नहीं किया जाता, बल्कि जिससे मन मनन किया हुआ कहा जाता है, उसी को तू ब्रह्म (ईश्वर) जान। जिस दृश्यमान (देशकाल से बंधे हुए सांसारिक) वस्तु की लोक उपासना करते हैं, वह वास्तविक ब्रह्म नहीं है।
कठोपनिषद्: आत्मा और परमात्मा की प्राप्ति का साधन
कठोपनिषद् (अ० १, वल्ली २, श्लोक २३) में कहा गया है:
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैषवृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुंस्वाम् ॥
अर्थात्: यह आत्मा या परमात्मा केवल बड़े-बड़े व्याख्यानों या वेदाध्ययन द्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है, और न ही तीव्र तीक्ष्ण धारणा-शक्ति (बुद्धि) अथवा बहुत अधिक शास्त्र श्रवण से ही प्राप्त हो सकता है। यह साधक जिस शुद्ध भाव से उस परमात्मा का वरण करता है, उस अनन्य भक्ति और आत्म-समर्पण से ही वह प्राप्त किया जा सकता है। उसके प्रति यह परमात्मा अपने वास्तविक स्वरूप को स्वयं अभिव्यक्त कर देता है। इन बातों को अच्छी तरह समझने के लिए निम्नलिखित प्रवचन को मनोयोग पूर्वक पूरा पढ़ें-
हमारी भीतरी और बाहरी सब इन्द्रियाँ - नेत्र , कर्ण ,
इस मन्त्र के द्वारा वेद भगवान उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यो ! हाथ , पैर गुदा , लिंग , रसना , कान , त्वचा , आँख , नाक और मन - बुद्धि आदि इन्द्रियों के द्वारा ईश्वर को प्रत्यक्ष करने की चेष्टा करना झूठ ही एक खेल करना है ; क्योंकि इनसे वह नहीं जाना जा सकता है । वह तो इन्द्रियातीत है ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
-कनोपनिषद् ( खण्ड १ , श्लोक ५ )
अर्थात् जो मन से मनन नहीं किया जाता , बल्कि जिससे
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैषवृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुंस्वाम् ॥ -कठोपनिषद् अ०१ , वल्ली २, श्लोक २३ )

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