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MMS: अंग-प्रत्यंग का अर्थ और आध्यात्मिक रहस्य: संतमतानुसार अंगों का शास्त्रीय वर्णन || अंगत्राण / अंगीकरण

 अंग-प्रत्यंग का अर्थ और आध्यात्मिक रहस्य: महर्षि मेँहीँ एवं संतमत के अनुसार अंगों का शास्त्रीय वर्गीकरण 

     प्रभु प्रेमियों !  क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे शास्त्रों में अंग-प्रत्यंग (Ang-Pratyang) शब्द का इतनी बार उल्लेख क्यों किया गया है? साधारण अर्थ में इसका मतलब शरीर का प्रत्येक हिस्सा होता है, लेकिन जब हम संतमत और महर्षि मेँहीँ की शिक्षाओं की गहराई में उतरते हैं, तो इसका अर्थ बहुत व्यापक हो जाता है। यह लेख आपको अंग, प्रत्यंग और उपांग के बीच के शास्त्रीय अंतर और उनके आध्यात्मिक महत्व को समझाएगा।

 
अंग-प्रत्यंग किसे कहते हैं?  अंग प्रत्यंग का मतलब क्या होता है ? अंग प्रत्यंग क्या है?
अंग-प्रत्यंग किसे कहते हैं? 


 अंग-प्रत्यंग का अर्थ 

MMS  अ

अंग-प्रत्यंग : ( सं०, पुं० ) शरीर के छोटे बड़े अवयव, किसी पदार्थ का बड़ा और छोटा अंश, अवयव या टुकड़ा। 

 नमस्ते! अंग-प्रधान का विषय संतमत और आध्यात्मिक साधना में अत्यंत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण है। यहाँ इसका संक्षिप्त विस्तार दिया गया है:


अंग-प्रधान का आध्यात्मिक अर्थ :  

संतमत की शब्दावली में 'अंग' का अर्थ केवल शरीर के हिस्से नहीं, बल्कि साधना के सोपान और लक्षण होते हैं। जब हम 'अंग-प्रधान' की बात करते हैं, तो इसका तात्पर्य उन मुख्य गुणों या अंगों से है जो एक साधक के भीतर प्रधान (मुख्य) होने चाहिए।

गुरुदेव के प्रवचन में अंग प्रत्यंग की चर्चा का वह कोटेशन वाला चित्र
गुरुदेव के प्रवचन में अंग प्रत्यंग


 .  मुख्य अंग (प्रधान तत्व)

​साधना के मार्ग में निम्नलिखित अंगों को प्रधान माना गया है:

  • गुरु-भक्ति अंग: समस्त साधना का मूल गुरु की आज्ञा और उनके प्रति समर्पण है। बिना गुरु-भक्ति के अन्य सभी अंग निष्प्राण हैं।
  • विरह अंग: परमात्मा से मिलने की तीव्र व्याकुलता। जब साधक के हृदय में विरह प्रधान होता है, तभी वह संसार से विरक्त होकर अंतर्मुखी होता है।
  • साधु-सेवा अंग: अहंकार को गलाने के लिए सत्संग और सेवा को प्रधानता दी जाती है।
  • शब्द-सुरत अंग: यह सबसे प्रधान क्रियात्मक अंग है, जहाँ सुरत (चेतना) को आंतरिक शब्द (नाद) में लीन किया जाता है।


अंगों का सामंजस्य

​अंग-प्रधान होने का अर्थ यह भी है कि साधक अपनी प्रकृति के अनुसार किसी एक विशेष गुण को आधार बनाकर अपनी यात्रा शुरू करता है। जैसे:

  • ​कोई ज्ञान-प्रधान होता है (विवेक और विचार के माध्यम से)।
  • ​कोई भक्ति-प्रधान होता है (प्रेम और विरह के माध्यम से)।
  • ​कोई योग-प्रधान होता है (प्राण और मन के निरोध के माध्यम से)।

अंग, प्रत्यंग और उपांग: शास्त्रीय वर्गीकरण

भरत मुनि के नाट्यशास्त्र और प्राचीन भारतीय आयुर्वेद के अनुसार, हमारे शरीर की संरचना को तीन मुख्य भागों में विभाजित किया गया है:

श्रेणीपरिभाषामुख्य अवयव
अंग (Ang)शरीर के मुख्य भाग जिनका संचालन स्वतंत्र होता है।सिर, हाथ, वक्ष, बगल, कमर और पैर।
प्रत्यंग (Pratyang)वे भाग जो मुख्य अंगों को जोड़ने में सहायता करते हैं।कंधा, भुजा, पीठ, पेट और जांघें।
उपांग (Upang)प्रत्येक अंग के भीतर स्थित अत्यंत सूक्ष्म अवयव।आंखें, नाक, होंठ, जीभ और उंगलियां।

अंगत्राण और अंगीकरण का आध्यात्मिक महत्व

साधना के पथ पर 'अंगत्राण' और 'अंगीकरण' की अवधारणाएं हमें सुरक्षा और स्वीकृति का बोध कराती हैं:

  • अंगत्राण: इसका अर्थ है वह आध्यात्मिक कवच (Varm/Kavach) जो साधक के अंतःकरण की रक्षा करता है।
  • अंगीकरण: इसका अर्थ है गुरु की शिक्षाओं और सत्य के मार्ग को पूर्णतः हृदय से स्वीकार कर लेना।

विशेष ध्यान देने योग्य बात और निवेदन

     प्रभु प्रेमियों !  ​सद्गुरु मेँहीँ परमहंस जी महाराज के उपदेशों के अनुसार, 'सुरत-शब्द योग' ही वह प्रधान अंग है जो जीव को भवसागर से पार ले जाता है। इसमें दृष्टि-साधन (बिन्दु ध्यान) और शब्द-साधन (नाद ध्यान) की प्रधानता होती है।। यदि आप संतमत और महर्षि मेँहीँ जी के साहित्य के बारे में अधिक विस्तार से जानना चाहते हैं, तो हमारे अन्य लेख भी अवश्य पढ़ें। हमारे व्हाट्सएप चैनल को सब्सक्राइब कर ले, वहाँ पर हर अपडेट आपको मिलता रहेगा। जिसमें सत्संग ध्यान का न्यूज़ और सत्संग ध्यान से संबंधित हर तरह का जो भी अपडेट है। तुरंत शेयर किया जाता है। व्हाट्सएप चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए  👉 यहाँ दवाएँ।




महर्षि मेँहीँ शब्दकोश

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MMS: अंग-प्रत्यंग का अर्थ और आध्यात्मिक रहस्य: संतमतानुसार अंगों का शास्त्रीय वर्णन || अंगत्राण / अंगीकरण MMS: अंग-प्रत्यंग का अर्थ और आध्यात्मिक रहस्य: संतमतानुसार अंगों का शास्त्रीय वर्णन || अंगत्राण / अंगीकरण Reviewed by सत्संग ध्यान on 7:23:00 pm Rating: 5

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