MMS: अंगत्राण का मतलब क्या है? महर्षि मेँहीँ साहित्य एवं संतमत में अंगत्राण का प्रयोग || अंग / अंग-प्रत्यंग
अंगत्राण का मतलब क्या है? महर्षि मेँहीँ साहित्य एवं संतमत में अंगत्राण का प्रयोग
प्रभु प्रेमियों ! शरीर की रक्षा करने वाला बस्तर या कवच को अंगत्राण कहते हैं। यह भारती भाषा का विशेषण शब्द है और संज्ञा वाचक पुलिंग है। इस शब्द का प्रयोग और संत साहित्य में इसका क्या महत्व है। इसी बिषय पर यहाँ चर्चा करेंगे।
प्रभु प्रेमियों ! शरीर की रक्षा करने वाला बस्तर या कवच को अंगत्राण कहते हैं। यह भारती भाषा का विशेषण शब्द है और संज्ञा वाचक पुलिंग है। इस शब्द का प्रयोग और संत साहित्य में इसका क्या महत्व है। इसी बिषय पर यहाँ चर्चा करेंगे।
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| अंगत्राण का मतलब |
अंगत्राण का अर्थ
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अंगत्राण (सं०, वि०) = शरीर की रक्षा करने वाला। बस्तर , पुं० कवच।
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अंगत्राण (सं०, वि०) = शरीर की रक्षा करने वाला। बस्तर , पुं० कवच।
नमस्ते! आध्यात्मिक शब्दावली में 'अंगत्राण' (Angatran) एक अत्यंत गहरा शब्द है। साधारण भाषा में लोग इसे केवल वस्त्र या कवच समझते हैं, लेकिन संतमत और महर्षि मेँहीँ की शिक्षाओं में इसका संबंध साधक की आंतरिक सुरक्षा से भी है।
अंगत्राण: अर्थ, व्याकरण और पर्यायवाची
अंगत्राण संस्कृत मूल का शब्द है जिसका प्रयोग विशेषण और संज्ञा दोनों रूपों में होता है।
- शाब्दिक अर्थ: अंगों की रक्षा करने वाला आवरण।
- हिंदी पर्यायवाची: कवच, बख़्तर, वर्म, जिरह, तनुत्राण। [7]
- अन्य संदर्भ: इसे अंगरखा, कुर्ता या सुरक्षा प्रदान करने वाला वस्त्र भी कहा जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता और आध्यात्मिक सुरक्षा
रक्षा और परित्राण का सिद्धांत सनातन धर्म का मूल है। गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं:
"परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥"
अर्थ: सज्जनों की रक्षा (अंगत्राण/परित्राण) के लिए और धर्म की स्थापना हेतु मैं हर युग में प्रकट होता हूँ। [4]
रक्षा और परित्राण का सिद्धांत सनातन धर्म का मूल है। गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं:
"परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥"
अर्थ: सज्जनों की रक्षा (अंगत्राण/परित्राण) के लिए और धर्म की स्थापना हेतु मैं हर युग में प्रकट होता हूँ। [4]
रामचरितमानस में सर्वोपरि सुरक्षा चर्चा
रामचरितमानस के अनुसार सुरक्षा का अचूक साधन
"कवच अभेद विप्र, गुरु पूजा ।
यहि सम विजय उपाय न दूजा॥"
अर्थ: ब्राह्मणों और गुरुओं की पूजा करने से अभेद्य कवच मिलता है यानी निर्मल और अचल मन तरकस के समान होता है, इस पूजा के समान विजय का कोई दूसरा उपाय नहीं है, यह कथन श्री रामचरितमानस के लंकाकांड में मिलता है
रामचरितमानस के अनुसार सुरक्षा का अचूक साधन
"कवच अभेद विप्र, गुरु पूजा ।
यहि सम विजय उपाय न दूजा॥"
अर्थ: ब्राह्मणों और गुरुओं की पूजा करने से अभेद्य कवच मिलता है यानी निर्मल और अचल मन तरकस के समान होता है, इस पूजा के समान विजय का कोई दूसरा उपाय नहीं है, यह कथन श्री रामचरितमानस के लंकाकांड में मिलता है
निष्कर्ष और निवेदन
प्रभु प्रेमियों ! मोक्ष मार्ग पर चलते हुए साधक गुरु की सेवा रूपी अंगत्राण को धारण करें । तो वह अपने लक्ष्य पर निर्विघ्न पहुंच सकता है। यदि आप संतमत और सद्गुरु महर्षि मेँहीँ जी के साहित्य के बारे में अधिक विस्तार से जानना चाहते हैं, तो हमारे अन्य लेख भी अवश्य पढ़ें। हमारे व्हाट्सएप चैनल को सब्सक्राइब कर ले, वहाँ पर हर अपडेट आपको मिलता रहेगा। जिसमें सत्संग ध्यान का न्यूज़ और सत्संग ध्यान से संबंधित हर तरह का जो भी अपडेट है। तुरंत शेयर किया जाता है। व्हाट्सएप चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए 👉 यहाँ दवाएँ।
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Reviewed by सत्संग ध्यान
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7:16:00 pm
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