ईश्वर को कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
प्यारे लोगो !
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"शरीर , इन्द्रियों और मायिक जड़ - आवरण से चैतन्य आत्मा को अलग कर परमात्मा को पाना केवल ध्यान - साधना से ही हो सकता है । इड़ा अर्थात् बायीं ओर की धारा में तामसी वृत्ति रहती है । पिंगला अर्थात् दायीं ओर की धारा में राजसी वृत्ति रहती है और सुषुम्ना अर्थात् मध्य की धारा में सात्त्विकी वृत्ति रहती है । ध्यान - साधना सुषुम्ना में करने की विधि है ।
गुरु महाराज से जैसा सुना , आपलोगों को वैसा सुना दिया । वैज्ञानिक लोग ऑक्सीजन और हाइड्रोजन - दो वाष्पों द्वारा पानी बनाकर दिखला देते हैं । वैसे ही ध्यान अभ्यास के प्रयोग द्वारा परमात्मा की प्रत्यक्षता होती है ; परन्तु यह आधिभौतिक वैज्ञानिक का बाहरी प्रयोग नहीं है । वह प्रयोग अपने अन्दर में करने का है । ध्यान योग का साधक संशय में नहीं रहता है । वह ध्यानाभ्यास के प्रयोग से जो कुछ पाता है , उसको सत्य मानता है और त्रुटि - विहीन ध्यान - अभ्यास के प्रयोग में जो नहीं पाया जाता है , उसको असत्य मानता है । उसको संशय कैसा ?"
प्रभु प्रेमियों ! सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसी महाराज का यह प्रवचन ग्राम डोभाघाट (जिला पूर्णियाँ) अ० भा० सं० स० विशेषाधिवेशन के अवसर पर दिनांक ५.१२.१६४६ ई० के सत्संग में हुआ था ।जिसमें उन्होंने उपरोक्त बातें कही थी । महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा सागर के सभी प्रवचनों में कहाँ क्या है? किस प्रवचन में किस प्रश्न का उत्तर है? इसे संक्षिप्त रूप में जानने के लिए 👉यहाँ दवाएँ।
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| महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर |
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S01 8. ईश्वर को कैसे प्राप्त किया जा सकता है || Eeshvar praapti ka maarg kya hai
Reviewed by सत्संग ध्यान
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6:47:00 am
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