प्रभु प्रेमियों ! शरीर, इन्द्रियों और मायिक जड़-आवरण से चैतन्य आत्मा को अलग कर परमात्मा को पाना केवल ध्यान-साधना से ही हो सकता है। हमारे भीतर प्रवाहित होने वाली प्राण-धाराओं का अपना विशिष्ट स्वभाव है। इड़ा अर्थात् बायीं ओर की धारा में तामसी वृत्ति रहती है, जो अज्ञान और अंधकार की ओर ले जाती है। पिंगला अर्थात् दायीं ओर की धारा में राजसी वृत्ति रहती है, जो चंचलता और सांसारिक कर्मों में आसक्ति पैदा करती है। सुषुम्ना अर्थात् मध्य की धारा में सात्त्विकी वृत्ति रहती है, जो पवित्रता, ज्ञान और स्थिरता प्रदान करती है। ध्यान-साधना सुषुम्ना में करने की विशिष्ट विधि है, जिसके माध्यम से साधक अंतर्मुख होकर परमात्मा की ओर अग्रसर होता है।
ईश्वर प्राप्ति का मार्ग क्या है?
ध्यान-साधना से परमात्मा की प्रत्यक्षता
सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज फरमाते हैं कि गुरु महाराज से जैसा सुना, आपलोगों को वैसा सुना दिया। जिस प्रकार वैज्ञानिक लोग ऑक्सीजन और हाइड्रोजन—दो वाष्पों द्वारा पानी बनाकर प्रत्यक्ष दिखला देते हैं, ठीक वैसे ही ध्यान अभ्यास के प्रयोग द्वारा परमात्मा की प्रत्यक्षता होती है; परन्तु ध्यान रहे कि यह आधिभौतिक वैज्ञानिक का बाहरी प्रयोग नहीं है। यह प्रयोग यहाँ अपने अन्दर में करने का है। ध्यान योग का साधक कभी संशय में नहीं रहता है। वह ध्यानाभ्यास के प्रयोग से अपने अंदर जो कुछ प्रत्यक्ष पाता है, उसको सत्य मानता है और त्रुटि-विहीन ध्यान-अभ्यास के प्रयोग में जो नहीं पाया जाता है, उसको असत्य मानता है। प्रत्यक्ष स्वानुभूति हो जाने के बाद उसको संशय कैसा? इन बातों को अच्छी तरह समझने के लिए निम्नलिखित प्रवचन को मनोयोग पूर्वक पूरा पढ़ें-
"शरीर , इन्द्रियों और मायिक जड़ - आवरण से चैतन्य आत्मा को अलग कर परमात्मा को पाना केवल ध्यान - साधना से ही हो सकता है । इड़ा अर्थात् बायीं ओर की धारा में तामसी वृत्ति रहती है । पिंगला अर्थात् दायीं ओर की धारा में राजसी वृत्ति रहती है और सुषुम्ना अर्थात् मध्य की धारा में सात्त्विकी वृत्ति रहती है । ध्यान - साधना सुषुम्ना में करने की विधि है ।
गुरु महाराज से जैसा सुना , आपलोगों को वैसा सुना दिया । वैज्ञानिक लोग ऑक्सीजन और हाइड्रोजन - दो वाष्पों द्वारा पानी बनाकर दिखला देते हैं । वैसे ही ध्यान अभ्यास के प्रयोग द्वारा परमात्मा की प्रत्यक्षता होती है ; परन्तु यह आधिभौतिक वैज्ञानिक का बाहरी प्रयोग नहीं है । वह प्रयोग अपने अन्दर में करने का है । ध्यान योग का साधक संशय में नहीं रहता है । वह ध्यानाभ्यास के प्रयोग से जो कुछ पाता है , उसको सत्य मानता है और त्रुटि - विहीन ध्यान - अभ्यास के प्रयोग में जो नहीं पाया जाता है , उसको असत्य मानता है । उसको संशय कैसा ?"
प्रभु प्रेमियों ! सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसी महाराज का यह प्रवचन ग्राम डोभाघाट (जिला पूर्णियाँ) अ० भा० सं० स० विशेषाधिवेशन के अवसर पर दिनांक ५.१२.१६४६ ई० के सत्संग में हुआ था ।जिसमें उन्होंने उपरोक्त बातें कही थी । महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा सागर के सभी प्रवचनों में कहाँ क्या है? किस प्रवचन में किस प्रश्न का उत्तर है? इसे संक्षिप्त रूप में जानने के लिए 👉यहाँ दवाएँ।
1. महर्षि मेँहीँ सत्संग-सुधा सागर भाग 1 एक ऐसा ग्रंथ है जो मानव जीवन के दु:खों से छुटकारा दिलाने के लिए धर्मग्रंथों, साधु-संतों के वचनों और निजी अनुभूतियों से भरा हुआ है।
2. इस ग्रंथ का मनोयोगपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे उसे मनुष्य शरीर का मिलना सुनिश्चित होता है।
3. शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्म को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, अन्यथा बड़ी हानि होती है।
4. इन प्रवचनों का पाठ करने से व्यक्ति को ब्रह्म संबंधी ठोस और प्रमाणिक जानकारी मिलती है, जिससे उपर्युक्त लाभ अनिवार्य होता है।
5. इस ग्रंथ का प्रथम प्रकाशन वर्ष 2004 में हुआ था और इसमें गुरु महाराज के 323 प्रवचनों का संकलन है, जो ईश्वर, जीव ब्रह्म, साधना आदि आध्यात्मिक विषयों का ज्ञान प्रदान करते हैं।
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S01, 8. ध्यान-साधना से परमात्मा की प्रत्यक्षता: सुषुम्ना मार्ग और आभ्यंतरिक वैज्ञानिक प्रयोग |
Reviewed by सत्संग ध्यान
on
6:47:00 am
Rating: 5
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प्रभु प्रेमियों ! कृपया वही टिप्पणी करें जो आप किसी संतवाणी से प्रूफ कर सके या समझ बनी हो किसी ऐसी बानी का उपयोग न करें जिनसे आपका भी समय खराब हो और हमारा भी जय गुरु महाराज
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प्रभु प्रेमियों ! कृपया वही टिप्पणी करें जो आप किसी संतवाणी से प्रूफ कर सके या समझ बनी हो किसी ऐसी बानी का उपयोग न करें जिनसे आपका भी समय खराब हो और हमारा भी जय गुरु महाराज