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मोक्ष दर्शन (36-44) शब्द विचार/srishti ki rachna

सत्संग योग भाग 4 मोक्ष दर्शन/03

      प्रभु प्रेमियों ! भारतीय साहित्य में वेद, उपनिषद, उत्तर गीता, भागवत गीता, रामायण आदि सदग्रंथों का बड़ा महत्व है। इन्हीं सदग्रंथों में से ध्यान योग से संबंधित बातों को संग्रहित करके सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज ने 'सत्संग योग भाग 4 (मोक्ष दर्शन)' नामक पुस्तक की रचना की है। इसमें जो बातें व्यक्त की गई है उसे पारा संख्या देकर अभिव्यक्त किया गया है। उन्हीं प्रसंगोों में से आज के प्रसंग में जानेंगे-पारा संख्या 36 से 44 के बारे में-

मोक्ष दर्शन (36-44) शब्द विचार/srishti ki rachna । सद्गुरु महर्षि मेहीं
सद्गुरु महर्षि मेंहीं



शब्द के गुण और सृष्टि रचना

      इन पैराग्राफोंं में बताया गया हैं- मोक्ष दर्शन (36-44) शब्द विचार/srishti ki rachna, सृष्टि की रचना कैसे हुई और सृष्टि कितने मंडलों में विभाजित है।

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शब्द विचार

मोक्ष दर्शन (36-44) शब्द विचार/srishti ki rachna। सृष्टि रचना
सृष्टि की रचना

      मोक्ष दर्शन के पारा संख्या 36 से 44 तक में हम लोगों ने जाना कि  शब्द के गुण, सृष्टि की रचना कैसे हुई और सृष्टि कितने मंडलों में विभाजित है।। इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस प्रवचन के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले प्रवचन या पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। 



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मोक्ष दर्शन (36-44) शब्द विचार/srishti ki rachna मोक्ष दर्शन (36-44) शब्द विचार/srishti ki rachna Reviewed by सत्संग ध्यान on नवंबर 01, 2018 Rating: 5

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